युवा कलाकारों में दम है- रजा मुराद

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रजा मुराद। अभिनेता। इनका कहना है कि जिस प्रकार से आज देश में युवा उद्यमी आगे आए हैं तय है कि न्यू इंडिया बन रहा है। यहां तक कि कई नए युवा कलाकारों ने फिल्म जगत में भी धुम मचाई है। हां आवाज पर कम ध्यान दिया जा रहा है इसमें सुधार की जरूरत है। रजा मुराद से संवाददाता मानवेंद्र की खास बातचीत

-आप यंग इंटरप्रेनर रिक्की कौशल की कंपनी मैजिकसूक के साथ जुड़े हैं इसके ब्रांड एंबेस्डर बने हैं क्या संदेश देंगे।

रिक्की कौशल युवा उद्यमी हैं। बेहतर इंसान हैं। मेहनती हैं। जिस प्रकार से इन्होंने कंपनी शुरू की है और लगातार आज स्थानीय बाजार के दुकानदारों को जोड़ रहे हैं। इनका काम बोल रहा है। हम इनके काम से प्रभावित होकर ही इनसे जुड़े हैं। निश्चिततौर पर रिक्की कौशल अपनी कंपनी को ऊचांईयों तक लेकर जाएंगें।

-क्या आपकी आवाज की भी कंपनी उपयोग कर रही हैं।

निश्चिततौर पर इन्होंने एक एड भी शूट किया है। जिसमें अभिषेक जैसे यंग कलाकार हैं। बहुत अच्छा एड भी बना है जो आपके सामने होगा। युवा कलाकारों को हमने कई चीजें सीखाया है जिसमें निश्चितौर पर आवाज के बारे में बताया है। यह भी बताया है कि क्या खाना है और क्या नहीं खाना है।

-आज बॉलीवुड में काफी कुछ बदलाव आ गया है। खासतौर से बॉलीवुड में काम कर रही युवा पीढ़ी की उच्चारण विधि में वह मजबूती व शब्दों में उतनी पकड़ नहीं जितनी पुराने जमाने के कलाकारों में होती थी।

समय के साथ कई चीजें बदल जाती हैं। अब लोगों को सब कुछ शॉर्टकट चाहिए। आजकल युवा पीढ़ी ने किसी भाषा के लिखने-बोलने का अंदाज ही बदल दिया है। यदि आज शब्दों को ज्यादा मजबूती से बोला गया तो युवा दर्शक सिनेमा पसंद नहीं करेगा, जैसे गलती शब्द की उच्चारण विधि बहुत सुंदर तरीके से की जा सकती है लेकिन लोग इस शब्द को गलती बोलते हैं। वे बेहद दुर्भाग्यपूर्ण बात है। शॉर्टकट मैसेज लिखते-लिखते अब युवाओं ने बोलने में भी यह प्रक्रिया अपने ऊपर लागू कर ली। भाषा को लेकर इससे होने वाले नुकसान आगे और भी ज्यादा हो सकते हैं।

-पहले की फिल्में दर्शकों के दिलोदिमाग में छा जाती थी। करैक्टर को दर्शक सालों तक जीते थे। अब ऐसा नहीं है।

करीब तीन दशक पूर्व एक अलग ही दुनिया थी लेकिन अब टेक्नोलॉजी ने सिनेमा की क्या पूरे देश की ही तस्वीर बदल दी है। एक तो पहले फिल्में कम बनती थीं व दूसरा लोगों के पास मनोरंजन का सबसे बड़ा साधन सिनेमा ही था। लोग इतने व्यस्त भी नहीं होते थे। लेकिन अब लोगों के पास मनोरंजन के कई साधन हैं। इस वजह से लोगों के उस दिमाग पर सिनेमा इतना असर नहीं छोड़ पाता। यह थोड़े समय के मनोरंजन तक सीमित हो गया है।

-भारी आवाज केवल आपकी पीढ़ी तक सीमित होकर रह गई। आपका भी अपना एक्टिंग का इंस्टीट्यूट है। क्या आवाज को दमदार करने के लिए भी कोई क्लॉस दी जाती है।

यह प्रश्न मुझे बहुत अच्छा लगा। कभी कभी मैं भी सोचता हूं कि भारी आवाज अमिताभ बच्चन, अमरीश पुरी, सुरेश ओवरॉय व मेरे सिवाय कुछ कलाकारों तक ही सीमित रह गई। यह बात सौ फीसदी सच है कि अब भारी आवाज वाले कलाकाल दूर दूर तक दिखाई नहीं देते, जैसे हम आज डायनासोर की चर्चा करते हैं, वैसे आने वाले समय में भारी आवाज की चर्चा हुआ करेगी। मैं अपनी इंस्टीट्यूट में लोगों को भारी आवाज के टिप्स देता हूं। सिगरेट पीने से भी मना करता हूं, ताकि आवाज में कोई परेशानी न आए।

-सिनेमा की रुपरेखा पूरी तरह बदल चुकी है। बड़े समय बाद कोई एक अच्छी फिल्म आती है। क्या कारण है।

इसके दो कारण हैं। पहला-अब बिना अनुभव के लोग फिल्में बनाते हैं। दूसरा, फिल्में ज्यादा बनने लगीं हैं। कई बार कहानियां रिपीट भी हो जाती है। फिल्मकारों की संख्या अधिक होने से स्क्रिप्ट में ठहराव की कमी आ गई। हम सब इस बात से भलीभांति परिचित हैं, किसी भी चीज की अति बुरी होती है।

-क्या आप आज के कलाकारों की एक्टिंग में कुछ नयापन देखते हैं। क्या परिवर्तन महसूस करते हैं।

फिल्मों में काम करने वाले हर कलाकार को बहुत मेहनत करनी पड़ती है। एक्टिंग में जरा सी चक्र कलाकार का करियर खत्म कर देती है। अब विकल्प बहुत ज्यादा है। यदि किसी कलाकार की एक्टिंग की वजह से फिल्म पिट जाती हैं। तो डायरेक्टर व प्रोडयसर उसको दोबारा मौका नहीं देते। किसी भी फिल्म का दारोमदार कलाकारों के कंधों पर होता है।

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