रोज जन्म लेती है निर्भया और तिल-तिल, पल-पल मरती है उसकी अस्मिता…

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तेरह साल की बच्ची घेरे वाली फ्रॉक जिद करके ले आई थी और पूरे दो दिन तक उसे पहन कर गांवभर में घूम रही थी. एक-एक राहगीर को दिखा रही थी- ‘देखो चाचा मेरी नई फ्रॉक’, ‘देखो काकी, देखो न…’ हर कोई उसकी इस नादानी पर हंस देता और उसे पुचकार कर आगे निकल जाता. खुशी से झूमती उसकी नजर दूर लगे होर्डिंग पर पड़ी. सिनेमा की एक बड़ी ही खूबसूरत अदाकारा वहां से उसे देख मुस्कुरा रही थी, जैसे कह रही हो ‘अरे तुम कितनी खूबसूरत हो, मुझसे भी ज्यादा…’  उस नन्हीं सी बच्ची ने आंखें मींच लीं और फ्रॉक के घेर को मुट्ठी में दबा कर घूमने लगी. उसे लग रहा था कि वह भी उस अदाकारा की तरह सुंदर है और जब बड़ी होगी, तो ऐसे ही अखबारों में, होर्डिंग्स पर, टीवी और रेडियो पर उसकी भी तस्वीरें छपेंगी, चर्चा होगी, उसका नाम हर जुबान पर होगा, पापा को उसके नाम से जाना जाएगा… उसकी आंखें भर आईं. अनायास ही मुंह से निकला- ‘पापा, पापा के तो आंसू ही बह पड़ेंगे न, इतनी खुशी कहां बरदाश्त होती है उनसे. ओह, पापा भी न…’

ऐसा ही कुछ होता है न नादान सी इस उम्र में. ये उम्र कहां जानती है कि इस देश में सपने हौसलों की उड़ान कम ही भर पाते हैं. उन्हें तो एक लिंग (जेंडर) की कमजोरी और दूसरे की भूख निगल लेती है. कहां जानती थी कि उसके इन रुपहले, रंगीन और हवा के परों पर सवार सपनों को टूट कर गिरने के लिए कहीं दो गज जगह न मिलेगी. उन्हें बेरहमी से कुचला जाएगा.

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