मानवता हुई शर्मसार: दर्द से कराहती गर्भवती महिला को छोड़ भागी 102 एंबुलेंस!, सड़क किनारे हुआ प्रसव, 2 हजार खर्च कर निजी वाहन से अस्पताल पहुंचा परिवार

Humanity Shamed: '102' ambulance abandons pregnant woman writhing in pain; mother forced to give birth by the roadside due to the service's negligence.

मानवता हुई शर्मसार: दर्द से कराहती गर्भवती महिला को छोड़ भागी 102 एंबुलेंस!, सड़क किनारे हुआ प्रसव, 2 हजार खर्च कर निजी वाहन से अस्पताल पहुंचा परिवार

पसान/कोरबा : सरकार दूरस्थ और ग्रामीण इलाकों में गर्भवती महिलाओं को समय पर अस्पताल पहुंचाने के लिए 102 एंबुलेंस सेवा संचालित करती है. दावा है कि यह सेवा प्रसव पीड़ा के समय गर्भवती महिला के लिए किसी जीवनरक्षक व्यवस्था से कम नहीं है. लेकिन कोरबा जिले के पसान क्षेत्र के बाघिनडांड़ गांव से सामने आया मामला सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है.
यहां प्रसव पीड़ा से तड़प रही गर्भवती महिला के लिए 102 एंबुलेंस बुलाई गई. एंबुलेंस मौके तक पहुंची. लेकिन महिला का घर मुख्य सड़क से करीब 400 मीटर अंदर दुर्गम रास्ते पर होने की वजह से वाहन घर तक नहीं पहुंच सका. इसके बाद जो हुआ, उसने पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए.
एंबुलेंस तक पहुंचने से पहले रास्ते में पेड़ के नीचे हुआ प्रसव
परिजनों के मुताबिक महिला को एंबुलेंस तक पहुंचाने के लिए मुख्य सड़क की तरफ ले जाया जा रहा था. इसी दौरान रास्ते में उसकी प्रसव पीड़ा अचानक इतनी बढ़ गई कि उसे पेड़ के नीचे ही प्रसव कराना पड़ा.
यानी जिस महिला को सरकारी एंबुलेंस के जरिए सुरक्षित अस्पताल पहुंचना था. वह अस्पताल पहुंचने से पहले ही रास्ते में पेड़ के नीचे बच्चे को जन्म देने को मजबूर हो गई.
यह सवाल अब सिर्फ एक एंबुलेंस के आने-जाने का नहीं है
सवाल यह है कि आखिर ऐसी स्थिति क्यों बनी कि प्रसव पीड़ा से जूझ रही महिला को अस्पताल के बजाय रास्ते में पेड़ के नीचे प्रसव कराना पड़ा?
5-10 मिनट का इंतजार नहीं या डेढ़ घंटे तक इंतजार?
मामले में सबसे बड़ा पेंच यहीं है.
गांव की मितानिन के मुताबिक महिला को मुख्य सड़क तक लाने में करीब 5 से 10 मिनट का समय लग रहा था. मितानिन का दावा है कि प्रसव पीड़ा को देखते हुए एंबुलेंस कर्मचारियों से कुछ देर इंतजार करने का आग्रह किया गया. लेकिन एंबुलेंस वहां से चली गई. जब महिला की स्थिति बिगड़ी तो दोबारा 102 से संपर्क करने का प्रयास किया गया.
दूसरी तरफ 102 एंबुलेंस कर्मचारी अमर श्रीवास्तव ने इन आरोपों से अलग पक्ष रखा. उनका कहना है कि एंबुलेंस ने लापरवाही नहीं की और मरीज के लिए करीब डेढ़ घंटे तक इंतजार किया गया. उनका कहना है कि मितानिन के समय पर नहीं पहुंचने की वजह से एंबुलेंस को लंबे समय तक मौके पर रुकना पड़ा.
अब सवाल यह है कि 5-10 मिनट या डेढ़ घंटा? आखिर उस दिन बाघिनडांड़ में 102 एंबुलेंस वास्तव में कितनी देर खड़ी रही?
₹2 हजार खर्च कर निजी वाहन से अस्पताल पहुंचा परिवार
एंबुलेंस को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं होने के बाद परिजनों ने निजी वाहन की व्यवस्था की. इसके लिए परिवार को अपनी जेब से करीब ₹2 हजार खर्च करने पड़े और महिला को अस्पताल पहुंचाया गया. ग्रामीण परिवार के लिए ₹2 हजार की रकम छोटी नहीं होती है. लेकिन इस पूरे मामले में पैसे से भी बड़ा सवाल समय और सुरक्षा का है.
अगर निजी वाहन समय पर नहीं मिलता तो?
अगर रास्ते में प्रसव के दौरान मां या नवजात की हालत बिगड़ जाती तो?
अगर किसी तरह की गंभीर जटिलता पैदा हो जाती तो?
तब जिम्मेदारी किसकी होती?
प्रशासन से तीखे सवाल—जवाब कौन देगा?
यह मामला अब सिर्फ मितानिन और एंबुलेंस कर्मचारी के अलग-अलग बयानों तक सीमित नहीं रहना चाहिए. जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग को सामने आकर जवाब देना चाहिए-
102 पर कॉल कितने बजे की गई थी?
एंबुलेंस मौके पर कितने बजे पहुंची?
GPS रिकॉर्ड के मुताबिक एंबुलेंस वहां कितनी देर रुकी?
क्या एंबुलेंस डेढ़ घंटे तक खड़ी रही या कुछ ही मिनट में वहां से चली गई?
क्या महिला को मुख्य सड़क तक लाने के लिए एंबुलेंस और मितानिन के बीच पर्याप्त समन्वय किया गया था?
अगर महिला प्रसव पीड़ा में थी तो उसके लिए वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की गई?
और सबसे महत्वपूर्ण- अगर सरकारी एंबुलेंस मौके पर थी. तो गर्भवती महिला को रास्ते में पेड़ के नीचे प्रसव कराने की नौबत आखिर क्यों आई?
400 मीटर ने खोल दी ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल?
बाघिनडांड़ में महिला का घर मुख्य सड़क से करीब 400 मीटर अंदर है और रास्ता दुर्गम बताया जा रहा है. लेकिन यही तो ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की असली परीक्षा है. सरकार से सवाल है कि जिन गांवों में एंबुलेंस सीधे घर तक नहीं पहुंच सकती. वहां गर्भवती महिलाओं के लिए पहले से वैकल्पिक आपातकालीन व्यवस्था क्यों नहीं है?
क्या स्वास्थ्य विभाग के पास ऐसे दुर्गम गांवों की लिस्ट है?
क्या गर्भवती महिलाओं को समय रहते मुख्य सड़क तक पहुंचाने की व्यवस्था बनाई गई है?
क्या मितानिन, एएनएम और 102 कर्मचारियों के बीच आपात स्थिति के लिए स्पष्ट प्रोटोकॉल है?
अगर नहीं है, तो कागजों पर चल रही व्यवस्था और जमीन पर झेल रहे ग्रामीणों के बीच की दूरी कौन खत्म करेगा?
जांच हुई तो साफ हो जाएगा—लापरवाही किसकी थी?
इस मामले में किसी एक पक्ष को बिना जांच दोषी ठहराना उचित नहीं होगा. लेकिन जांच से बचना भी सवालों को और बड़ा करेगा. 102 कॉल रिकॉर्ड, GPS लोकेशन, एंबुलेंस लॉगबुक, मौके पर रुकने की अवधि, मितानिन की मौजूदगी और अस्पताल पहुंचने का समय—इन सभी की जांच की जानी चाहिए.
अगर जांच में एंबुलेंस कर्मचारी की लापरवाही सामने आती है तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए. अगर जांच में सामने आता है कि एंबुलेंस लंबे समय तक मौके पर मौजूद थी और मरीज को समय पर मुख्य सड़क तक नहीं लाया गया. तो संबंधित स्वास्थ्यकर्मियों और परिजनों की भूमिका भी स्पष्ट होनी चाहिए.
लेकिन हर स्थिति में एक सवाल अनुत्तरित नहीं रहना चाहिए—
आखिर प्रसव पीड़ा से तड़प रही महिला को सुरक्षित अस्पताल पहुंचाने में सरकारी व्यवस्था क्यों नाकाम नजर आई?
यह सिर्फ बाघिनडांड़ की महिला का सवाल नहीं
आज बाघिनडांड़ में यह घटना सामने आई है. कल यही हालत किसी दूसरे दुर्गम गांव में भी बन सकती है. अगर 400 मीटर का रास्ता एक गर्भवती महिला को सरकारी स्वास्थ्य सुविधा से सुरक्षित रूप से जोड़ने में बाधा बन रहा है. तो जिले के दूसरे दूरस्थ गांवों में स्वास्थ्य व्यवस्था की स्थिति क्या होगी?
क्या प्रशासन किसी गंभीर हादसे का इंतजार कर रहा है?
क्या किसी मां या नवजात की जान जाने के बाद ही व्यवस्था जागेगी?
या फिर इस घटना से सबक लेकर अभी से व्यवस्था में सुधार किया जाएगा?
₹2 हजार से बड़ा सवाल—मां और बच्चे की सुरक्षा
बाघिनडांड़ की घटना में परिवार ने किसी तरह निजी वाहन का इंतजाम कर महिला को अस्पताल पहुंचाया. करीब ₹2 हजार खर्च हुए..
लेकिन इस घटना का सबसे बड़ा खर्च पैसा नहीं है. सबसे बड़ी कीमत उस डर और जोखिम की है. जिसे प्रसव पीड़ा में महिला और उसके परिवार ने झेला. सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को गांव-गांव तक पहुंचाने का दावा करती है. ऐसे में प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि दुर्गम रास्तों के कारण किसी गर्भवती महिला को एंबुलेंस तक पहुंचने के लिए संघर्ष न करना पड़े और न ही अस्पताल पहुंचने से पहले पेड़ के नीचे प्रसव कराने की नौबत आए.
अब देखना यह है कि प्रशासन इस मामले को महज मितानिन और एंबुलेंस कर्मचारी के बयान का विवाद मानकर छोड़ देता है या 102 का पूरा रिकॉर्ड खंगालकर सच सामने लाता है.
क्योंकि सवाल ₹2 हजार का नहीं है… सवाल उस मां और नवजात की जिंदगी का है.
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