अभनपुर के स्वास्थ्य तानाशाहों का पतन, डॉ. शारदा और डॉ. विश्वास की विदाई से जनता में खुशी की लहर, हटाई गई गरियाबंद CMHO गार्गी यदु
The fall of health dictators of Aabhanpur, the departure of Dr. Sharda and Dr. Vishwas brought a wave of happiness among the public, Gariaband CMHO Gargi Yadu was removed
हटाई गई गरियाबंद CMHO गार्गी यदु
गरियाबंद : गरियाबंद जिला अस्पताल की लगातार गिरती छवि, कर्मचारियों में असंतोष और अधिकारियों के मनमाने रवैये के बीच आखिरकार सरकार को सख्त एक्शन लेना ही पड़ा. CMHO गार्गी यदु के कार्यकाल के दौरान जिला अस्पताल में गुटबाजी, बहनवाद और कुप्रबंधन का बोलबाला रहा. उनको देर रात जारी तबादला आदेश में हटा दिया गया.
पिछले दो महीनों से गरियाबंद स्वास्थ्य विभाग किसी अस्पताल की बजाय विवादों का अखाड़ा बन गया था. CMHO गार्गी यदु पर गंभीर आरोप लगे कि उन्होंने अपनी बहन सृष्टि को कंसल्टेंट बनाकर सिस्टम में सीधे दखल देना शुरु कर दिया. कर्मचारियों ने विरोध किया. मीडिया में आवाज उठी तो स्वास्थ्य विभाग ने गार्गी की बहन को राजधानी रायपुर वापस बुला लिया. लेकिन तब तक भरोसे की जमीन हिल चुकी थी.
24 जून की रात जब पूरा प्रदेश गहरी नींद में था स्वास्थ्य मंत्रालय ने 58 मेडिकल अफसरों के तबादले का आदेश जारी कर दिया. इस लिस्ट में गरियाबंद की सबसे बड़ी कार्रवाई सामने आई. गार्गी यदु को CMHO पद से हटाकर धमतरी में मेडिकल ऑफिसर पदस्थ किया गया. उनकी जगह यूएस नवरत्न को गरियाबंद का नया मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) बनाया गया है. नवरत्न इससे पहले सिविल अस्पताल कुरुद में तैनात थे.
डॉ. केके सहारे, जो गरियाबंद जिला अस्पताल में पदस्थ थे, अब रायपुर में संचालनालय में प्रभारी संचालक बनाए गए हैं. एक महिला डॉक्टर, जो हमेशा रजिस्टर में ड्यूटी दिखा रही थीं लेकिन मरीजों से नदारद रहती थीं, ने राजनांदगांव स्थानांतरण स्वेच्छा से करवाया है. दो नए मेडिकल ऑफिसर गरियाबंद भेजे गए हैं ताकि स्वास्थ्य सेवाओं की रिकवरी की जा सके.
स्वास्थ्य सेवाओं की निगरानी अब नए CMHO यूएस नवरत्न के हाथ में होगी. उम्मीद है कि वे गार्गी यदु द्वारा छोड़े गए अनुशासनहीनता, पक्षपात और कर्मचारियों में अविश्वास की स्थिति को संभाल पाएंगे.
गरियाबंद के लोगों ने अराजकता और अफसरशाही का सामना किया. अब वह खत्म होने की उम्मीद है. CMHO गार्गी यदु को हटाया जाना प्रशासनिक ईमानदारी की दिशा में एक सख्त कदम है. स्वास्थ्य विभाग को अब जनता की सेवा और जवाबदेही के नए मानदंड पर चलना होगा.
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डॉ. शारदा और डॉ. विश्वास की विदाई से जनता में खुशी की लहर
रायपुर/अभनपुर : छत्तीसगढ़ के अभनपुर विकासखंड से एक बड़ी और बहुप्रतीक्षित खबर सामने आई है, जिसने न केवल स्वास्थ्य विभाग में हलचल मचा दी है बल्कि ग्रामीण जनता में भी राहत और उम्मीद की नई किरण जगा दी है. सालों से अभनपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में अपनी मनमानी, लापरवाही और केंद्र सरकार की आयुष्मान भारत इंसेंटिव घोटालेबाज दोषी खंड चिकित्सा अधिकारी डॉ. शारदा साहू और कनिष्ठ चिकित्सा अधिकारी डॉ. उमेश विश्वास को आखिरकार उनके पदों से हटा दिया गया.
अभनपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में सालों से जमे बैठे और जनसेवा की जगह निजी लाभ को प्राथमिकता देने वाले दो चर्चित चिकित्सा अधिकारियों डॉ. शारदा साहू और डॉ. उमेश विश्वास को आखिरकार उनके पद से हटाकर ऐसे स्थानों पर भेज दिया गया है जिसे लोग ‘सरकारी सेवा का काला पानी’ कहते हैं.
डॉ. शारदा साहू को बीजापुर और डॉ. उमेश विश्वास को सुकमा में पदस्थ किया गया है. यह दोनों जिले नक्सल प्रभावित और सुविधाओं से कोसों दूर माने जाते हैं. सालों से जनता की जान से खिलवाड़ करने वाले इन अधिकारियों के लिए यह स्थानांतरण किसी सजा से कम नहीं है.
यह वह दो चेहरे थे. जिनकी मौजूदगी ने अभनपुर जैसे संवेदनशील और स्वास्थ्य सुविधा से वंचित इलाके को कई ग्रामीण गरीब घरों की प्रसव से पीड़ित महिलाओं का खेल का अखाड़ा बना रखा था. ग्रामीणों की शिकायतें, जनप्रतिनिधियों की चेतावनी और लगातार हो रही मातृ-मृत्यु की घटनाएं भी लंबे समय तक इस व्यवस्था को नहीं हिला पाईं थीं. लेकिन आख़िरकार इंसाफ की जीत हुई है.
डॉ. शारदा साहू की नियुक्ति खुद में एक सवालिया निशान रही. नियमों को ताक पर रखकर खंड चिकित्सा अधिकारी जैसे अहम पद पर उनकी पदस्थापना न सिर्फ स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली पर सवाल उठाती रही. बल्कि इस बात का भी प्रमाण बनी कि किस तरह एक पूरे ब्लॉक की स्वास्थ्य व्यवस्था को व्यक्तिगत लाभ के लिए गिरवी रखा गया. नियमों को ताक पर रखकर की गई यह पदस्थापना खुद स्वास्थ्य विभाग के नियमों की धज्जियाँ उड़ाने वाली थी. अनुभव और पात्रता की कसौटी पर डॉ. साहू कहीं नहीं ठहरती थीं. फिर भी उन्हें सालों तक इसी कुर्सी पर बनाए रखा गया.
वहीं, डॉ. उमेश विश्वास का नाम ‘विश्वास’ होते हुए भी ग्रामीणों के लिए ‘अविश्वास’ और डर का प्रतीक बन गया था. अस्पताल में प्रसव से जूझ रही महिलाओं को सरकारी सुविधा देने के बजाय उन्हें जानबूझकर निजी अस्पतालों की ओर धकेला जाता रहा. जहां से मोटी दलाली की रकम वसूली जाती थी. डॉ. विश्वास का मोह अभनपुर अस्पताल से खत्म नहीं हो रहा था. क्योंकि वहीं से चलता था उनका कथित “दलाली का नेटवर्क” उमेश विश्वास को अभनपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र से इतना मोह था कि यहां तक कि पूर्व में भी उनका ट्रांसफर हुआ था. लेकिन उनके द्वारा वित्तीय प्रभार नहीं दिया गया था. वह मामला भी काफी विवादित रहा.
सबसे शर्मनाक पहलू इस पूरे मामले का यह रहा कि गर्भवती महिलाओं की पीड़ा, जिनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी इस स्वास्थ्य केंद्र की थी. उन्हें ही मौत की ओर धकेला गया. कई मामलों में समय पर इलाज न मिलने की वजह से प्रसव पीड़िताएं दम तोड़ती रहीं. उनके परिवारों की चीख-पुकार अस्पताल की दीवारों से टकराकर रह गईं. लेकिन डॉ. साहू और डॉ. विश्वास के कानों तक नहीं पहुंचीं.
सूत्रों की माने इन अधिकारियों के कार्यकाल में सरकारी सुविधा की उपेक्षा कर, निजी अस्पतालों के लिए “रेफर माफिया” जैसा खेल चलता रहा. इसकी भनक मिलते ही स्वास्थ्य विभाग के उच्च अधिकारियों ने जांच बैठाई और शिकायतों की पुष्टि के बाद बड़ी कार्रवाई को अंजाम दिया गया
अभनपुर सामुदायिक केंद्र के सरकार ने इन दोनों अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से हटाते हुए नई पदस्थापनाएं की हैं. सूत्रों के अनुसार, डॉ. शारदा साहू को बस्तर के दूरस्थ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में भेजा गया है. जहाँ उनकी प्रशासनिक शक्ति सीमित रहेगी. वहीं, डॉ. उमेश विश्वास को भी विभागीय जांच की सिफारिश के साथ एक नॉन-क्लिनिकल पद पर स्थानांतरित किया गया है.
यह कोई साधारण फेरबदल नहीं था. यह जनता के आक्रोश, माताओं के आंसुओं और ग्रामीणों की पीड़ा की परिणति थी. सालों से इस कार्रवाई की मांग हो रही थी. लेकिन अब जाकर आवाज़ें सुनी गईं
पूरे अभनपुर ब्लॉक में इस खबर के बाद खुशी की लहर दौड़ गई है. स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए कहा कि यह सिर्फ दो व्यक्तियों का स्थानांतरण नहीं, यह ग्रामीणों के स्वास्थ्य और विश्वास की बहाली है.
स्वास्थ्य विभाग के नए निर्देशों के तहत अब सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र अभनपुर में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की बात कही जा रही है. इसके लिए निगरानी समितियों के गठन और हर प्रसव की वीडियोग्राफी तक के प्रस्ताव पर विचार चल रहा है.
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हालांकि सवाल अब भी उठते हैं क्या सिर्फ स्थानांतरण से ही न्याय होगा? क्या उन महिलाओं को न्याय मिलेगा जो इलाज के अभाव में दम तोड़ चुकी हैं? क्या उन गरीब परिवारों को मुआवजा मिलेगा जो निजी अस्पतालों में लूटे गए?
स्वास्थ्य विभाग ने संकेत दिए हैं कि अब हर स्वास्थ्य केंद्र में जनता की भागीदारी बढ़ाई जाएगी. ग्राम पंचायत स्तर पर शिकायत पेटी, हेल्पलाइन नंबर और मोबाइल निरीक्षण दलों की व्यवस्था की जाएगी. उम्मीद है कि अभनपुर अब पुराने भयावह दौर को पीछे छोड़कर नए स्वास्थ्य युग में प्रवेश करेगा.
डॉ. शारदा साहू और डॉ. उमेश विश्वास की विदाई एक मिसाल है कि अगर जनता एकजुट होकर अन्याय के खिलाफ आवाज उठाए. तो सबसे मजबूत कुर्सी भी हिल सकती है. अभनपुर ने यह कर दिखाया है. अब जरुरत है निगरानी की, न्याय की, और एक ऐसी व्यवस्था की जिसमें डॉक्टर फिर से “भगवान का रूप” बन सकें—ना कि “दलाल का चेहरा”



