बेटी पैदा होते ही पिता ने अपनाने से किया इंकार, पत्नी को तलाक की धमकी, बच्चों की पहचान के लिए सुशासन तिहार में प्रशासन के दरवाजे पहुंची मां

Father refuses to adopt daughter after birth, threatens divorce; mother approaches administration on Good Governance Day to identify children

बेटी पैदा होते ही पिता ने अपनाने से किया इंकार, पत्नी को तलाक की धमकी, बच्चों की पहचान के लिए सुशासन तिहार में प्रशासन के दरवाजे पहुंची मां

गरियाबंद : समाज आधुनिकता की तरफ बढ़ रहा है. बेटियों को बराबरी का हक देने की बातें हो रही हैं. लेकिन आज भी कुछ जगहों पर पुरानी सोच जिंदा दिखाई देती है. ऐसा ही एक संवेदनशील मामला गरियाबंद जिला में देवभोग विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत निष्ठीगुड़ा के आश्रित ग्राम फुलीमुड़ा से सामने आया है. जहां माडागांव में आयोजित समाधान शिविर में एक महिला खुशबू कश्य ने अपनी नवजात बेटी को पिता का नाम दिलाने और खुद को प्रताड़ना से बचाने के लिए सुशासन तिहार शिविर का सहारा लिया है.
मिली जानकारी के मुताबिक ग्राम फुलीमुड़ा निवासी खुशबू कश्यप ने माडागांव में आयोजित सुशासन तिहार शिविर में आवेदन देकर शिकायत किया कि बेटी [ऐडा होने के बाद उसके पति ईश्वर लाल कश्यप का व्यवहार पूरी तरह बदल गया. पीड़िता का आरोप है कि पति बेटे की चाह रखता था और बेटी होने से नाराज होकर नवजात बच्ची को अपना नाम देने से इंकार कर दिया. इतना ही नहीं, पत्नी को मानसिक रूप से प्रताड़ित करते हुए तलाक देने की धमकी भी दी जा रही है.
पीड़िता ने आवेदन में बताया कि लगातार हो रही प्रताड़ना से परेशान होकर उसे इंसाफ के लिए प्रशासन की शरण लेनी पड़ी. शिकायत मिलते ही मामले को संबंधित पुलिस विभाग को भेज दिया गया है. हालांकि अब तक किसी तरहर की कार्रवाई सामने नहीं आई है. लेकिन मामले की गंभीरता को देखते हुए जल्द निराकरण की उम्मीद जताई जा रही है.
इस मामले ने एक बार फिर समाज के सामने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सच में लोगों की सोच बदली है. या फिर आधुनिकता के पीछे आज भी वही पुरानी मानसिकता छिपी हुई है. जहां बेटियों को बोझ समझा जाता है.
समाजसेवियों का कहना है कि सुशासन शिविरों में बड़ी तादाद में शिकायतें पहुंचती हैं. जिनका नियमानुसार निराकरण किया जाता है. लेकिन महिला और बच्चियों से जुड़े ऐसे संवेदनशील मामलों में प्रशासन को प्राथमिकता के आधार पर त्वरित कार्रवाई करनी चाहिए. ताकि पीड़ितों को इंसाफ के लिए भटकना न पड़े.
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