जंतर-मंतर: महिला पत्रकारों ने पुलिस पर लगाया यौन हमले का आरोप, फिर चर्चा में इंजीनियर की आत्महत्या से जुड़ा मामला, ज्ञानेश कुमार की बढ़ेंगी मुश्किलें?
Jantar Mantar: Female journalists accuse police of sexual assault; case linked to an engineer's suicide back in the spotlight; will Gyanesh Kumar face mounting trouble?
दिल्ली : दिल्ली के जंतर-मंतर पर शनिवार को केंद्रीय चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन के दौरान दो महिला पत्रकारों और एक प्रदर्शनकारी युवती ने एक पुलिस अधिकारी और पुलिस कर्मियों पर यौन हमले के आरोप लगाए हैं.
एक महिला पत्रकार का आरोप है कि आइसा की अध्यक्ष नेहा बोरा को हिरासत में लिए जाने के दौरान एसीपी विवेक भगत ने उनके सीने पर हाथ मारा और उन्हें धक्का देकर वहां से चले गए.
वहीं एक वरिष्ठ महिला पत्रकार और एक प्रदर्शनकारी युवती ने दिल्ली पुलिस के कर्मियों पर यौन हमले के आरोप लगाए हैं.
बीबीसी के पास तीनों महिलाओं की शिकायतों की कॉपी हैं जो उन्होंने पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने में दी हैं. वहीं, दिल्ली पुलिस के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि इस संबंध में शिकायतें ले ली गई हैं. सबूतों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी.
वहीं, जब हमने एक महिला पत्रकार के आरोपों पर एसीपी विवेक भगत से सवाल किया तो उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया.
दूसरी ओर दिल्ली पुलिस ने एक्स पर बयान जारी करके कहा है कि इस मामले की जांच दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच को दे दी गई है.
दिल्ली पुलिस ने एक्स पर लिखा, "तीन अक्तूबर 2026 को नई दिल्ली इलाके में विरोध-प्रदर्शन के दौरान, कानून-व्यवस्था बनाए रखने की स्थिति में, तीन महिला पत्रकारों ने पुलिस अधिकारियों पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए."
"नई दिल्ली ज़िले को उनकी शिकायतें मिली हैं और निष्पक्ष जांच के लिए इन्हें क्राइम ब्रांच को भेज दिया गया है."
कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संस्थापक अभिजीत दीपके ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो साझा किया है, जिसमें एक महिला पत्रकार अपनी बात कह रही हैं.
वीडियो में महिला पत्रकार ने दावा किया कि वह शिकायत दर्ज कराने के लिए दिल्ली के पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस थाने पहुंचीं, लेकिन क़रीब साढ़े तीन घंटे इंतज़ार करने के बाद भी उनकी शिकायत पर एफ़आईआर दर्ज नहीं की गई.
एक महिला पत्रकार ने कहा कि उनके समर्थन में कई पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता थाने के बाहर बैठे हैं, लेकिन पुलिस की ओर से अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है.
इस मामले में सीजेपी ने पत्रकारों से रविवार सुबह 11 बजे पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस थाने पहुंचने का आह्वान किया है.
एक वरिष्ठ महिला पत्रकार ने अपनी शिकायत में कहा कि वो प्रदर्शन के दौरान जब योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को हिरासत में लिया जा रहा था तो वो उनकी बाइट लेने की कोशिश कर रही थीं, ठीक उसी समय उन्हें महसूस हुआ कि कोई पीछे से उनकी पीठ को छू रहा है. इसके बाद उन्हें लगा कोई उनके शरीर के पिछले हिस्से को अपने प्राइवेट पार्ट से छू रहा है. वो जैसे ही पीछे मुड़ीं तो देखा कि एक पुलिसकर्मी उनके बेहद क़रीब खड़ा है.
उन्होंने शिकायत में लिखा है कि इस घटना का वीडियो उनके पास है.
अभिजीत दीपके ने सोशल मीडिया पर जिस महिला पत्रकार का वीडियो साझा किया है, उन्होंने अपनी शिकायत में लिखा है कि जब पुलिस नेहा बोरा को हिरासत में लेने की कोशिश कर रही थी तो वो इसका वीडियो बना रही थीं.
उन्होंने लिखा है कि "मैंने देखा कि उन्हें हिरासत में लेने के लिए पुरुष पुलिस अफ़सर हैं. महिला पुलिसकर्मी नहीं हैं."
उन्होंने लिखा है, ''मैंने इस पर सवाल किया तो एक अफ़सर विवेक भगत ने मेरे सीने पर हाथ मारा और धक्का दे दिया. उन्होंने मुझे वहां से चले जाने को कहा. दोबारा सवाल करने पर उन्होंने उन्हें महिला कॉन्स्टेबल से यह कर घेरने के लिए कहा कि मेरे पास वीडियो है.''
एक और महिला प्रदर्शनकारी ने लिखा है कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान जब प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया जा रहा था तो एक पुरुष पुलिसर्मी ने उनके साथ कथित तौर पर अनुचित, आपत्तिजनक और अमर्यादित तरीके से शारीरिक व्यवहार किया. उन्हें पुरुष पुलिसकर्मी ने पीटा और उनकी छाती पर हमला किया.
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सीजेपी ने पूछा- क्या दिल्ली पुलिस अधिकारी को बचा रही?
सीजेपी की लीगल अफ़ेयर्स हेड रत्ना सिंह ने पूछा है कि क्या दिल्ली पुलिस गंभीर शिकायत पर कार्रवाई करने के बजाय एसीपी को बचा रही है?.
रत्ना सिंह सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर लिखा, "दिल्ली पुलिस ने यौन उत्पीड़न के मामले में एफ़आईआर दर्ज करने से मना कर दिया है."
"इसके बजाय, पुलिस का कहना है कि वे एफ़आईआर दर्ज करने से पहले शुरुआती जांच करना चाहते हैं और सीसीटीवी फ़ुटेज देखना चाहते हैं. इससे ललिता कुमारी जजमेंट में दिए गए नियमों का पालन करने को लेकर गंभीर सवाल उठते हैं."
उन्होंने कहा, "कल, सभी (स्वतंत्र) पत्रकार और जवाबदेही में विश्वास रखने वाले लोग सुबह 11 बजे पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस स्टेशन के बाहर इकट्ठा हों. यौन उत्पीड़न की शिकायत को पुलिस के इस फ़ैसले का इंतज़ार नहीं करना चाहिए कि एफ़आईआर दर्ज करनी है या नहीं."
रत्ना सिंह ने कहा कि जब तक हर महिला सुरक्षित नहीं है, तब तक कोई भी महिला सुरक्षित नहीं है.
सीजेपी के सह-संयोजक सौरव दास ने भी कहा कि कई पत्रकार और अन्य प्रदर्शनकारी 5 अक्तूबर को मामले में समर्थन के लिए सामने आएंगे और यह सुनिश्चित करने की कोशिश करेंगे कि संबंधित पुलिसकर्मी के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज हो.
सौरव दास ने एक्स पर लिखा, "पुलिस ने हमसे लिखित शिकायत और वीडियो की जांच करने के लिए कुछ समय मांगा है. हम इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे."
सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव ने कहा कि इस मामले पर तुरंत एफ़आईआर होनी चाहिए.
उन्होंने एक्स पर लिखा, "क़ानून के अनुसार तुरंत एफ़आईआर होनी चाहिए! इन अफ़सरों पर दिल्ली की महिलाएं भरोसा करेंगी अपनी सुरक्षा के लिए?"
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राहुल गांधी ने क्या कहा
राहुल गांधी ने दिल्ली महिला पत्रकार के आरोपों के बाद इस मामले में पुलिस अधिकारियों की कार्यशैली पर सवाल उठाया है.
राहुल गांधी ने शनिवार देर रात एक्स पर लिखा, "जंतर-मंतर पर एक महिला पत्रकार ने एक पुलिस अधिकारी पर बदसलूकी का आरोप लगाया है. घंटों से सैकड़ों पत्रकार सिर्फ़ इतनी माँग लेकर बैठे हैं कि एफ़आईआर दर्ज कर ली जाए. ये तो पुलिस का बुनियादी काम है न? वो भी नहीं किया."
उन्होंने कहा, "आज ही जंतर-मंतर पर सैकड़ों लोग हिरासत में लिए गए. महिला प्रदर्शनकारियों के साथ बदसलूकी के आरोप हैं. कैमरे छीने गए, पत्रकार घसीटे गए. और ये पहली बार नहीं है. इससे पहले भी हमने वीडियो सबूतों के साथ देखा है कि पुलिस के अफ़सर महिलाओं के साथ घिनौनी बदसलूकी करते हैं."
राहुल गांधी ने सवाल उठाते हुए कहा कि जिस पुलिस पर महिलाओं की हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी है, वही महिलाओं पर हाथ उठा रही है.
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प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया ने जारी किया बयान
दिल्ली पुलिस के कथित व्यवहार को लेकर प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया ने नाराज़गी जताई है. प्रेस क्लब ने पुलिस की कार्रवाई और पत्रकारों के साथ किए गए व्यवहार को लेकर चिंता व्यक्त करते हुए इसे लोकतंत्र के लिए गंभीर मामला बताया है.
प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया की ओर से जारी बयान में कहा गया है, "एक महिला पत्रकार ने आरोप लगाया है कि एक एसीपी ने उनके साथ कथित तौर पर बदसलूकी और यौन हमला किया. पत्रकार के मुताबिक़, वह शनिवार रात कई घंटे संसद मार्ग थाने में एफ़आईआर दर्ज कराने के लिए प्रयास करती रहीं, लेकिन पुलिस ने अब तक उनकी शिकायत पर कार्रवाई नहीं की है."
"कई स्वतंत्र संस्थानों और पोर्टलों के पत्रकारों ने बताया है कि उनके पास प्रेस कार्ड थे और उन्होंने बार-बार बताया कि वे मीडिया से हैं. इसके बावजूद पुलिस ने उनके साथ हिंसक और आक्रामक व्यवहार किया. कुछ पत्रकारों को प्रदर्शनकारियों के साथ हिरासत में भी लिया गया."
प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया ने कहा कि दिल्ली पुलिस को महिला पत्रकार की शिकायत पर तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए.
साथ ही कहा कि यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पत्रकारों को अपना काम करने के लिए ज़रूरी जगह मिले, उन्हें पुलिस की आक्रामकता और धमकियों का सामना न करना पड़े.
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फिर चर्चा में इंजीनियर की आत्महत्या से जुड़ा मामला, ज्ञानेश कुमार की बढ़ेंगी मुश्किलें?
नई दिल्ली : केरल में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जुड़े एक पुराने मामले को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है. मिली जानकारी के मुताबिक, केरल के गृह मंत्री रमेश चेन्निथला ने रविवार को साल 2006 के एक मामले की दोबारा विजिलेंस जांच कराने के आदेश दिए हैं. यह मामला एक मलेशियाई सिविल इंजीनियर ली सी बीन की आत्महत्या से जुड़ा बताया जा रहा है.
शिकायत में आरोप लगाया गया था कि सड़क परियोजना का भुगतान जारी करने के बदले तत्कालीन लोक निर्माण विभाग (PWD) के सचिव ज्ञानेश कुमार ने रिश्वत मांगी थी. हालांकि, ये आरोप हैं और जांच के आदेश दिए जाने का मतलब यह नहीं है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोप साबित हो गए हैं.
क्या था 215 करोड़ रुपये की सड़क परियोजना का मामला?
यह मामला केरल में अंगमाली से तिरुवनंतपुरम तक जाने वाले एमसी रोड के उन्नयन से जुड़ा है. साल 2006 के दौरान इस सड़क को बेहतर बनाने का काम चल रहा था. उपलब्ध जानकारी के मुताबिक परियोजना की लागत करीब 215 करोड़ रुपये थी और इसके लिए विश्व बैंक से आर्थिक सहायता मिली थी.
इस परियोजना को केरल स्टेट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट (KSTP) के तहत आगे बढ़ाया जा रहा था. मलेशियाई सिविल इंजीनियर ली सी बीन भी इससे जुड़े कंसोर्टियम PATI-BEL के साथ काम कर रहे थे. इसी दौरान उनकी आत्महत्या का मामला सामने आया. जिसके बाद परियोजना और भुगतान से संबंधित आरोपों की चर्चा हुई.
रिश्वत मांगने की शिकायत में क्या कहा गया था?
शिकायत के मुताबिक, ली सी बीन ने आरोप लगाया था कि सड़क निर्माण के काम का भुगतान जारी करने के बदले उनसे रिश्वत मांगी गई थी. उस समय ज्ञानेश कुमार केरल के लोक निर्माण विभाग में सचिव के पद पर कार्यरत थे। इसी वजह से उनका नाम इस पुराने मामले से जुड़ा बताया गया.
मामले में उस समय केरल के विजिलेंस एंड एंटी-करप्शन ब्यूरो (VACB) ने शुरुआती जांच की थी. अब गृह मंत्री ने कथित तौर पर जांच में बाहरी दबाव की शिकायत मिलने के बाद पुरानी फाइलों की दोबारा जांच कराने का फैसला किया है. नई जांच में आरोपों, पुराने रिकॉर्ड और संबंधित परिस्थितियों की पड़ताल की जाएगी.
गृह मंत्री ने जांच को लेकर क्या कहा?
रमेश चेन्निथला के मुताबिक उन्हें शिकायत मिली थी कि साल 2006 में हुई विजिलेंस जांच बाहरी दबाव से प्रभावित हुई थी. इसी शिकायत के आधार पर उन्होंने मामले को फिर से देखने के निर्देश दिए. अब विजिलेंस विभाग पूरे मामले की जांच करेगा और जरूरत पड़ने पर कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई की जा सकती है.
इस मामले में जांच के नतीजे सामने आने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा कि पुरानी शिकायत में कितनी सच्चाई है और पहले की जांच में कोई अनियमितता हुई थी या नहीं. फिलहाल आरोपों और जांच के आदेशों के बीच अंतर समझना जरूरी है.
SIR विवाद के बीच फिर चर्चा में चुनाव आयोग
ज्ञानेश कुमार का नाम मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर चल रही राजनीतिक बहस में भी सामने आ रहा है. विपक्षी दल इस प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची में किए जा रहे बदलावों पर सवाल उठा रहे हैं और चुनाव आयोग से पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं.
इसके अलावा, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की SIR से जुड़े कुछ फैसलों पर कथित आपत्तियों को लेकर भी रिपोर्ट सामने आई है. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी चुनावी प्रक्रिया और वोटर लिस्ट को लेकर चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए हैं.
हालांकि, केरल के पुराने मामले और SIR विवाद को अलग-अलग मुद्दों के रूप में देखना चाहिए. फिलहाल सबकी नजर विजिलेंस जांच पर रहेगी. जांच में सामने आने वाले तथ्यों से ही पता चलेगा कि 2006 के इस मामले में आगे क्या कार्रवाई होती है.
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