सेंट्रल जेल में मर्डर, सजायाफ्ता बंदी ने विचाराधीन बंदी की सीमेंट स्लैब से कुचलकर उतारा मौत के घात, 9 घंटे बाद खबर, सुरक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल
Murder in Central Jail: Convict kills an undertrial prisoner by crushing him with a cement slab; incident reported after nine hours, raising questions about security arrangements.
बिलासपुर : सोमवार सुबह बिलासपुर सेंट्रल जेल के ई-1 बैरक में जो हुआ, उसने जेल प्रशासन के तमाम दावों की पोल खोल दी. विचाराधीन बंदी नीलू जगत पर एक ऐसे कैदी राजेश ने हमला किया. जो पहले से तीन हत्याओं और दो हत्या के प्रयास के मामलों में सजा काट रहा है. घटना बैरक के अंदर हुई है.
मिली जानकारी के मुताबिक सेंट्रल जेल की बैरक E-1 में यह हत्याकांड सुबह करीब साढ़े नौ बजे हुआ. यह दावा है कि बुरी तरह घायल नीलू जगत को अस्पताल ले जाया गया जहां करीब साढ़े बारह बजे उसे मृत घोषित किया गया. लेकिन इस बारे में यहखबर है कि नीलू जगत की मौत घटना के समय ही बैरक में हो चुकी थी. बताया गया है कि,बैरक E-1 में मानसिक रूप से बीमार क़ैदियों को रखा गया था. इससवाल का जवाब नहीं है कि मानसिक रोगियों को एक साथ एक ही जगह पर क्यों रखा गया था. जबकि वे हिंसक हो रहे थे. यह भी साफ नहीं है कि मनोरोगियों के लिए प्रदेश का सबसे बेहतर अस्पताल बिलासपुर में ही है. वहां से कोई इलाज हो रहा था या नहीं.
बताया गया है कि घटना सुबह 9 बजकर 32 मिनट पर हुई. अस्पताल में चिकित्सकों ने उसे साढ़े बारह पर मृत घोषित किया. लेकिन समीपस्थ थाने को इसकी पहली औपचारिक खबर 9 घंटे बाद दी गई है याने शाम करीब सवा पांच बजे...
मृतक नीलू रजक पर नाबालिग से अनाचार का आरोप था और वह विचाराधीन क़ैदी था. नीलू कोटा के दबनपुर का निवासी था. जबकि हत्यारोपी राजेश मुंगेली के चमारी गांव का निवासी है और तीन लोगों की हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा काटते हुए उसे सत्रह साल जेल में हो चुके हैं.
बिलासपुर सेंट्रल जेल में विचाराधीन बंदी नीलू जगत की हत्या ने कई ऐसे सवाल खड़े कर दिए हैं. जिनका जवाब सिर्फ पुलिस जांच से नहीं, बल्कि पूरे जेल तंत्र को देना होगा.
जेल… वह जगह जहां अपराधियों को कानून के दायरे में रखकर सुधारने की बात की जाती है. लेकिन अगर उसी जेल के भीतर किसी बंदी का सिर कुचलकर कत्ल कर दिया जाए. तो यह सिर्फ एक हत्या नहीं बल्कि सुरक्षा व्यवस्था की भयावह विफलता बन जाती है.
जेल प्रशासन अक्सर सुरक्षा, निगरानी और बंदियों के वर्गीकरण की बात करता है. लेकिन नीलू जगत की मौत बता रही है कि कागजों में मौजूद व्यवस्थाएं जमीन पर कितनी कमजोर हैं. अगर एक हाई-रिस्क कैदी बैरक के भीतर खुलेआम हमला कर सकता है. तो फिर जेल के भीतर मौजूद सीसीटीवी, प्रहरी और निगरानी तंत्र किस काम के हैं?
सवाल यह है कि आखिर इतना खतरनाक अपराधी सामान्य बंदियों के बीच कैसे रखा गया था? और उससे भी बड़ा सवाल यह कि उसके हाथ में ऐसा भारी सीमेंट का ढक्कन पहुंचा कैसे?. जो किसी की जान लेने के लिए पर्याप्त हथियार बन गया?
इस मामले का दूसरा चिंताजनक पहलू यह है कि मृतक नीलू जगत कोई सजायाफ्ता अपराधी नहीं था। वह विचाराधीन बंदी था. यानी कानून की नजर में तब तक दोषी नहीं माना जा सकता था जब तक अदालत उसे दोषी साबित न कर दे. ऐसे व्यक्ति की सुरक्षा की जिम्मेदारी पूरी तरह राज्य और जेल प्रशासन की थी. लेकिन वह जिम्मेदारी उसकी जान के साथ खत्म हो गई.
यह भी जांच का विषय है कि क्या दोनों बंदियों के बीच पहले से कोई विवाद था? क्या जेल प्रशासन को किसी संभावित तनाव की जानकारी थी? अगर थी, तो उसे रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए? और अगर नहीं थी, तो यह खुफिया निगरानी की विफलता है.
देश की जेलों में अक्सर क्षमता से ज्यादा कैदी, स्टाफ की कमी और निगरानी में लापरवाही की शिकायतें सामने आती रही हैं. लेकिन हर घटना के बाद जांच और रिपोर्ट की औपचारिकता पूरी कर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है. नतीजा यह होता है कि कुछ समय बाद फिर किसी जेल से हिंसा, हत्या या आत्महत्या की खबर सामने आ जाती है.
बिलासपुर सेंट्रल जेल की यह घटना भी सिर्फ एक आपराधिक मामला नहीं है. यह उस व्यवस्था का आईना है. जो सलाखों के भीतर बंद लोगों की सुरक्षा तक सुनिश्चित नहीं कर पा रही है. अगर जेल के अंदर एक विचाराधीन बंदी की जान सुरक्षित नहीं है. तो फिर सुधार गृह और सुरक्षा के तमाम दावे खोखले नजर आते हैं.
अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि नीलू जगत की हत्या किसने की। असली सवाल यह है कि उसकी हत्या होने कैसे दी गई?
जब तक इस प्रश्न का जवाब तय नहीं होगा और जिम्मेदारी तय कर कार्रवाई नहीं होगी. तब तक यह माना जाएगा कि नीलू जगत की मौत सिर्फ एक कैदी की हत्या नहीं, बल्कि जेल प्रशासन की चूक से हुई एक संस्थागत हत्या है.
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