महिला आरक्षण से जुड़ा बिल मतदान के दौरान 54 वोट से गिरा, मोदी सरकार बिल पास कराने में पहली बार नाकाम, चाहिए थे 352 वोट, मिले 298
The bill on women's reservation was defeated by 54 votes. The Modi government failed to pass the bill for the first time. It needed 352 votes but received only 298.
नई दिल्ली : संविधान संशोधन से जुड़े तीनों विधेयकों पर लोकसभा में हुई वोटिंग में सरकार को अपेक्षित समर्थन नहीं मिल पाया. जरूरी दो-तिहाई बहुमत न जुटा पाने की वजह से संशोधन विधेयक पारित नहीं हो सके.
लोकसभा की कुल 543 सदस्यीय तादाद के हिसाब से किसी भी संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए कम से कम 362 वोट की जरुरत होती है. लेकिन मतदान के दौरान यह संख्या सरकार के पक्ष में नहीं पहुंच सकी.
मतविभाजन में कुल 528 सांसदों ने मतदान किया। बहुमत के लिए 352 वोटों की जरूरत थी. इनमें से 298 सांसदों ने विधेयक के पक्ष में वोट दिया. जबकि 230 सांसदों ने इसके खिलाफ मतदान किया. इस तरह साधारण बहुमत मिलने के बावजूद संविधान संशोधन के लिए जरुरी दो-तिहाई समर्थन सरकार को नहीं मिल पाया.
वोटिंग से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर सांसदों से ‘अंतरात्मा की आवाज’ सुनकर मतदान करने की अपील की थी. सरकार ने महिला आरक्षण से जुड़े संशोधन को इस विधेयक का प्रमुख आधार बताया था.
गृह मंत्री अमित शाह ने चर्चा के दौरान कहा कि यह संशोधन महिलाओं के प्रतिनिधित्व और लोकतांत्रिक भागीदारी को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है. उन्होंने सभी दलों से राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर बिल का समर्थन करने की अपील की.
वहीं कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि संविधान से जुड़े किसी भी संशोधन को व्यापक सहमति और पारदर्शिता के साथ लाया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि विपक्ष को भरोसे में लिए बिना ऐसे अहम बदलाव लाने की कोशिश लोकतांत्रिक प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है.
आख़िरकार मतविभाजन में सरकार जरुरी समर्थन जुटाने में नाकाम रही और संविधान संशोधन से जुड़े प्रस्ताव लोकसभा में पारित नहीं हो सके.
संविधान विधेयक गिरने के बाद नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने एक्स पर लिखा, ‘संशोधन विधेयक गिर गया. उन्होंने महिलाओं के नाम पर, संविधान को तोड़ने के लिए, असंवैधानिक तरकीब का इस्तेमाल किया. भारत ने देख लिया. INDIA ने रोक दिया. जय संविधान.
इस बिल का सदन के भीतर जो हस्र हुआ है. उसने सरकार की नीयत और उसकी कमजोर रणनीति, दोनों को उजागर कर दिया है. दरअसल सरकार महिला आरक्षण संशोधन बिल की आड़ में लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों में प्रस्तावित परिसीमन को लागू करवाना चाहती थी. जिसे विपक्ष ने एकजुट होकर खारिज कर दिया.
2014 में सत्ता में आने के बाद पिछले 12 सालों में यह पहला मौका है. जब मोदी सरकार को सदन के भीतर अपनी कमजोरी का एहसास हुआ होगा. वरना 2023 में जब महिलाओं को विधायिका में 33 फीसदी आरक्षण देने से संबंधित बिल लगाया गया था. तो सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने पूरी सहमति से उसे पारित कर दिया था.
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी, समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव, तृणमूल कांग्रेस के नेता कल्याण बनर्जी और द्रमुक सांसद लगातार जोर दे रहे थे कि सरकार 2023 के बिल को तुरंत लागू कर दे. लेकिन सरकार इसे परिसीमन के साथ जोड़कर ही लागू करना चाहती थी. मगर उसकी यह बाजीगरी काम नहीं आई.
दरअसल मुश्किल यह है कि मोदी सरकार ने 2021 में प्रस्तावित जनगणना को टाल रखा था और अब जबकि 2026 में जनगणना होनी है. तो पूरी तस्वीर साफ नहीं है. सरकार ने जाति जनगणना की घोषणा कर रखी है. लेकिन अंतिम आंकड़े 2027 में ही आएंगे. मगर सरकार जनगणना से पहले ही राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में सीटों में बढ़ोतरी करना चाहती थी. जिसका द्रमुक सहित तमाम विपक्षी दल विरोध कर रहे हैं.
मोदी सरकार इन तीनों बिलों को बकायदा पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में होने वाले विधानसभा चुनाव से ठीक ऐन पहले संसद का विशेष सत्र बुलाकर पारित करवाना चाहती थी. जिसके राजनीतिक निहितार्थ स्पष्ट हैं. सरकार की मंशा पर सवाल इसलिए भी उठते हैं. क्योंकि उसने महिला आरक्षण संशोधन विधेयक को सदन के भीतर दो तिहाई बहुमत नहीं मिलने पर बाकी के दो विधेयकों पर मतदान के लिए रखा ही नहीं. क्या इसकी वजह यह भी है कि परिसीमन विधेयक पर मोदी सरकार में शामिल तेलुगू देशम पार्टी के कुछ सांसद टूट सकते थे? आखिर इस विधेयक के खिलाफ दक्षिण भारत से ही ज्यादा आवाजें उठ रही हैं.
लोकसभा में आज जो कुछ हुआ, उसके दो संदेश साफ हैं. पहला यह कि 2024 के लोकसभा चुनाव में 240 सीटों पर सिमट जाने वाली भाजपा तेलुगू देशम पार्टी और जनता दल (यू) के सहयोग से सरकार में है. लेकिन प्रधानमंत्री मोदी की छवि कमजोर पड़ चुकी है और उनकी अंतरात्मा की अपील भी सरकार के काम नहीं आई है. दूसरा यह कि अपने तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद सदन के भीतर विपक्ष एकजुट है. इसका यह भी मतलब है कि मोदी सरकार के लिए संसद में आगे आने वाले दिनों में मुश्किलें बढ़ेंगी, कम नहीं होंगी.
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मोदी सरकार इन तीनों बिलों को बकायदा पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में होने वाले विधानसभा चुनाव से ठीक ऐन पहले संसद का विशेष सत्र बुलाकर पारित करवाना चाहती थी. जिसके राजनीतिक निहितार्थ स्पष्ट हैं. सरकार की मंशा पर सवाल इसलिए भी उठते हैं. क्योंकि उसने महिला आरक्षण संशोधन विधेयक को सदन के भीतर दो तिहाई बहुमत नहीं मिलने पर बाकी के दो विधेयकों पर मतदान के लिए रखा ही नहीं. क्या इसकी वजह यह भी है कि परिसीमन विधेयक पर मोदी सरकार में शामिल तेलुगू देशम पार्टी के कुछ सांसद टूट सकते थे? आखिर इस विधेयक के खिलाफ दक्षिण भारत से ही ज्यादा आवाजें उठ रही हैं.
लोकसभा में आज जो कुछ हुआ, उसके दो संदेश साफ हैं. पहला यह कि 2024 के लोकसभा चुनाव में 240 सीटों पर सिमट जाने वाली भाजपा तेलुगू देशम पार्टी और जनता दल (यू) के सहयोग से सरकार में है. लेकिन प्रधानमंत्री मोदी की छवि कमजोर पड़ चुकी है और उनकी अंतरात्मा की अपील भी सरकार के काम नहीं आई है. दूसरा यह कि अपने तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद सदन के भीतर विपक्ष एकजुट है. इसका यह भी मतलब है कि मोदी सरकार के लिए संसद में आगे आने वाले दिनों में मुश्किलें बढ़ेंगी, कम नहीं होंगी.
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