कमार विकास प्राधिकरण की राशि के बंदरबांट का आरोप, जांच की मांग राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कलेक्टर को सौंपा आवेदन, अफसरों की कार्यशैली पर उठाए सवाल

Allegations of misappropriation of funds from the Kamar Development Authority have surfaced, prompting a demand for an investigation; the National President submitted a memorandum to the District Collector and raised questions regarding the functioning of the officials.

कमार विकास प्राधिकरण की राशि के बंदरबांट का आरोप, जांच की मांग राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कलेक्टर को सौंपा आवेदन, अफसरों की कार्यशैली पर उठाए सवाल

गरियाबंद : गरियाबंद।जिले में विकास योजनाओं और सरकारी व्यवस्थाओं को लेकर उठ रहे सवालों के बीच अब कमार विकास प्राधिकरण की विकास राशि के कथित दुरुपयोग का मामला सामने आया है. राष्ट्रीय विशेष पिछड़ी जनजाति कमार समाज भारत के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनसिंग सोरी ने कलेक्टर गरियाबंद को आवेदन सौंपकर प्राधिकरण की राशि से किए गए पूर्व व्यय की जांच कराने की मांग की है.
कमार समाज के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने आरोप लगाया कि कमार जनजाति के विकास के लिए स्वीकृत राशि का वास्तविक जरूरतमंदों तक अपेक्षित लाभ नहीं पहुंच रहा है. उनका कहना है कि विकास के नाम पर ऐसी योजनाओं में राशि खर्च किए जाने के आरोप हैं. जिनका सीधा लाभ समाज के लोगों को नहीं मिल पा रहा है. उन्होंने पूरे मामले की जांच कर जिम्मेदारी तय करने की मांग की है.
फर्जी नौकरी से विकास राशि तक—क्या अब खुलेंगी फाइलें?
गरियाबंद जिले में पहले से ही कथित फर्जी शिक्षाकर्मी प्रकरण को लेकर सवाल उठ चुके हैं. वहीं जिला पंचायत स्तर पर कथित फर्जी नौकरी और दस्तावेजों में अदला-बदली से जुड़े आरोपों ने भी सरकारी भर्ती व्यवस्था और दस्तावेजी प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए हैं.
अब कमार विकास प्राधिकरण की राशि के कथित बंदरबांट का आरोप सामने आने के बाद सवाल यह है कि क्या जिले में सरकारी योजनाओं और विकास मद की पुरानी फाइलों की भी निष्पक्ष जांच होगी?
एक के बाद एक सामने आ रहे आरोपों ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि क्या गरियाबंद जिले में विकास कार्यों और सरकारी योजनाओं से जुड़ी ऐसी और भी फाइलें हैं. जिनकी निष्पक्ष जांच होने पर वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है?
1982 में बना था कमार विकास प्राधिकरण
कमार जनजाति के समुचित विकास के उद्देश्य से वर्ष 1982 में गरियाबंद में कमार विकास प्राधिकरण का गठन किया गया था. इसका मकसद कमार समुदाय के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक विकास के लिए योजनाएं तैयार करना और उनका प्रभावी क्रियान्वयन करना था.
लेकिन दशकों बाद भी यदि समाज के प्रतिनिधि विकास राशि के उपयोग पर सवाल उठाते हुए जांच की मांग कर रहे हैं. तो यह प्रशासन के लिए गंभीर विषय है. खासकर तब, जब मामला सीधे विशेष पिछड़ी जनजाति के विकास से जुड़ा हो.
नए कलेक्टर के सामने पहली बड़ी परीक्षा?
अब निगाहें जिला प्रशासन पर हैं। कमार समाज की ओर से लगाए गए आरोपों और जांच की मांग पर प्रशासन क्या कदम उठाता है. यह देखने वाली बात होगी.
सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि राशि कहां खर्च हुई. बड़ा सवाल यह है कि स्वीकृत राशि से कौन-से काम हुए, किसे लाभ मिला. कितनी राशि किस मद में खर्च हुई. कार्यों की गुणवत्ता क्या रही और क्या भुगतान नियमानुसार हुआ?
अगर पूर्व में खर्च की गई राशि का रिकॉर्ड, स्वीकृति आदेश, कार्यादेश, बिल-वाउचर, माप पुस्तिका और लाभार्थियों का सत्यापन कराया जाए, तो तस्वीर काफी हद तक साफ हो सकती है.
अब सवाल कलेक्टर से…
गरियाबंद में लगातार अलग-अलग मामलों को लेकर जांच और कार्रवाई की मांग उठ रही है. ऐसे में नए कलेक्टर के सामने चुनौती सिर्फ नई योजनाओं को आगे बढ़ाने की नहीं, बल्कि पुरानी शिकायतों और विवादित मामलों की फाइलों को भी निष्पक्षता से देखने की है.
क्या कमार विकास प्राधिकरण की पूर्व में खर्च की गई राशि का स्वतंत्र और निष्पक्ष ऑडिट कराया जाएगा?
क्या योजनावार यह सार्वजनिक किया जाएगा कि कितनी राशि स्वीकृत हुई और कितनी खर्च हुई?
क्या मौके पर जाकर विकास कार्यों का भौतिक सत्यापन कराया जाएगा?
और सबसे अहम—अगर जांच में अनियमितता सामने आती है, तो जिम्मेदार अधिकारियों और संबंधित लोगों पर कार्रवाई होगी?
गरियाबंद में उठते ये सवाल अब प्रशासन के जवाब का इंतजार कर रहे हैं। कमार समाज की तरफ से की गई शिकायत पर जांच शुरू होती है या मामला भी अन्य शिकायतों की तरह फाइलों में दबकर रह जाता है. आने वाला समय इसका जवाब देगा.
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