नीतीश सबके हैं, अब 'इण्डिया' गठबंधन के साथ मिलकर देश के लोकतंत्र, संविधान और देश की अखंडता को बचाने की ज़िम्मेदारी उन पर है : एम.डब्ल्यू अंसारी
Article : जनता की उम्मीदें, गरीबों की आस, किसानों की आशा और देश के करोड़ों लोगों की मेहनत, संसदीय चुनाव के नतीजे आ गए, चुनाव लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव है। एग्जिट पोल ने एग्जिट पोल की हवा निकाल दी है और सत्ताधारी पार्टी के पैरों तले जमीन खिसका दी है।
Article : जनता की उम्मीदें, गरीबों की आस, किसानों की आशा और देश के करोड़ों लोगों की मेहनत, संसदीय चुनाव के नतीजे आ गए, चुनाव लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव है। एग्जिट पोल ने एग्जिट पोल की हवा निकाल दी है और सत्ताधारी पार्टी के पैरों तले जमीन खिसका दी है। अब मन की बात मन में ही रह गई है और ढंग की बात करने का वक्त आ गया है। सत्ता पक्ष ने जो शोर मचाया था या जो सपने सजाए थे 'अब की बार चार सौ पार' वो तो चकनाचूर हो गए हैं। लेकिन जो भी हो, अब सही मायने में देश के संविधान को बचाने की बारी है । अब मौका है देश की जनता द्वारा दिखाई गई एकता का फल पाने का ।
जैसे-जैसे अलग-अलग प्रांतों से खबरें मिलीं, तस्वीर साफ हो गई कि देश के करोड़ों लोग अब बीजेपी और मोदी को नहीं चाहते। अब लोगों में राजनीतिक और सामाजिक चेतना आ गई है और जनता समझ गई है कि पिछले 10 वर्षों में सत्ता में रहने वाली पार्टी ने धर्म की राजनीति करने, मस्जिद - मंदिर के लिए लोगों को लड़ाने और इस देश के सरमाए को भगोड़ों को सौंपने के अलावा कुछ नहीं किया है। इस चुनाव में लड़ाई थी बेरोजगार युवाओं की, पहलवानों की, किसानों की आम लोगों की नौकरी और एमएसपी की, पुरानी पेंशन योजना और अग्नि वीर सेवा की। हालांकि बीजेपी राम मंदिर के नाम पर वोट पाना चाहती थी, लेकिन देश की जनता ने उन्हें बता दिया कि वे अब जाग चुके हैं और उनकी गंदी राजनीति का हिस्सा नहीं बनने वाले हैं। यही वजह है कि अयोध्या से बीजेपी उम्मीदवार साकेत मिश्रा की निर्णायक हार हुई है, इतना ही नहीं बीजेपी के सबसे बड़े चेहरे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी महज डेढ़ लाख वोटों से जीते हैं, जो कोई बहुत बड़ी बात नहीं है वोटों की संख्या के हिसाब से । इससे साफ पता चलता है कि जनता ने उन्हें खारिज कर दिया है ।
जब राजा अपनी सफलता को छोड़ कर विपक्ष में खामिया ढूंढने लगे तो समझ लें कि उसके पास कहने को कुछ नहीं है । प्रधानमंत्री मोदी, उनके सभी मंत्रियों और भाजपा का आलम यह है कि अब उनके पास कहने को कुछ नहीं बचा है। चुनाव प्रचार के दौरान और उससे पहले भी बीजेपी ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। राम मंदिर, धारा 370, तीन तलाक,
सीएए-एनआरसी और न जाने क्या- क्या मुददे लेकर आए लेकिन कोई भी हथकंडा काम नहीं आया और जनता ने अपनी राजनीतिक और सामाजिक चेतना का परिचय देते हुए भाजपा को अर्श से फर्श पर फेंक दिया और उन्हें औकात याद दिला दी।
अब जब परिणाम सामने आ गए हैं, तो अब देश के संविधान की रक्षा करने, लोकतंत्र को बचाने और एक शांतिपूर्ण सरकार बनाने का समय आ गया है। राहुल गांधी, मलकाअर्जुन खड़गे और अन्य 'इडिया' कार्यकर्ता इसमें अहम भूमिका निभा सकते हैं ताकि नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू को अपने पक्ष में लाया जा सके और इस देश में अपनी सरकार बनाने के लिए इस गठबंधन का और विस्तार किया जा सके।
इसके लिए ‘इण्डया' गठबंधन को तुरंत कुछ अहम फैसले लेने होंगे। सबसे पहले, ‘इण्डया' गठबंधन को यह तय करना चाहिए कि यदि सरकार बनती है, तो प्रधानमंत्री मलकाअर्जुन खड़गे होंगे, और नीतीश कुमार को उप प्रधानमंत्री के रूप में उसी तरह चंद्रबाबू नायडू को उचित पद देना चाहिए। बल्कि नायडू जी की पार्टी को स्पीकर के साथ-साथ कैबिनेट में उचित स्थान दिया जाना चाहिए और बिहार प्रदेश और आंध्र को भी विशेष दर्जा और आर्थिक पैकेज दिया जाना चाहिए क्योंकि आंध्र प्रदेश और बिहार दोनों प्रांत सबसे पिछड़े और गरीब प्रांत हैं ।
चूंकि इस चुनाव में प्रत्येक प्रांत के लोगों ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, इसलिए 'इण्डिया' गठबंधन को प्रत्येक प्रांत के लोगों को जिम्मेदारी देनी चाहिए, इससे लोगों का विश्वास बढ़ेगा। हर पार्टी ने मुसलमानों से वोट लेने की बात तो की, लेकिन प्रतिनिधित्व देने की बात किसी ने नहीं की, अब 'इण्डिया' को जनसंख्या के अनुपात में मुस्लिम उम्मीदवारों की जिम्मेदारी तय करनी चाहिए।
यह भी ध्यान रखना चाहिए कि नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू दोनों नेताओं की विचारधारा बीजेपी और आरएसएस से मेल नहीं खाती है। ये दोनों नेता मनुवाद और पुंजीवाद के सख्त खिलाफ हैं और इन दोनों ने जातिगत जनगणना और सभी राजनीतिक दलों में जनसंख्या आनुपातिक प्रतिनिधित्व की बात कही है, इसलिए अगर बीजेपी किसी तरह इन्हें एक साथ ले आती है तो भी इनका गठबंधन ज्यादा दिनों तक नहीं चल सकता। इसलिए उम्मीद है कि नीतीश कुमार सही का समर्थन करेंगे और चंद्रबाबू नायडू भी आंध्र के भविष्य को ध्यान में रखते हुए सही कदम उठाना चाहेंगे।
गौरतलब है कि नीतीश कुमार सबके हैं लेकिन अब उन्हें देश की सेवा करनी है। लोकतंत्र को बचाना है और इस भारत देश में शांति व अमन कायम रहे इसके लिए खुद को पेश करना है। यह भी संभव है कि सत्ता में बैठी पार्टी उन्हें खरीदने के लिए धन-दौलत का लालच दे या उन्हें परेशान किया जाए, लेकिन उन्हें डटे रहना है और बाबा साहब के संविधान को बचाना है। जनता की उम्मीदों को पूरा करना है और 'नीतीश सबके हैं' बात को सच साबित करना है। इस देश की जनता एक नई सुबह का इंतजार कर रही है, अब देखना है कि राजनीति की दिशा किधर जाती है ।



