मरार पटेल समाज की परंपरा ने छेरछेरा पर्व को दिया नया रंग, सब्जियों से सजी आस्था की यात्रा, मां शाकंभरी के जयकारों से गूंजा गांव

The traditions of the Marar Patel community have given a new dimension to the Cherchera festival; a procession of faith adorned with vegetables, and the village resonated with chants of "Jai Maa Shakambhari" (Hail Mother Shakambhari).

मरार पटेल समाज की परंपरा ने छेरछेरा पर्व को दिया नया रंग, सब्जियों से सजी आस्था की यात्रा, मां शाकंभरी के जयकारों से गूंजा गांव

रायपुर : छत्तीसगढ़ में धान और अन्न के दान का सबसे बड़ा पर्व लोकपर्व छेरछेरा पुन्नी आज मनाया जा रहा है. मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध लोकपर्व छेरछेरा के पावन अवसर पर प्रदेशवासियों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ दी. उन्होंने इस अवसर पर प्रदेश की सुख-समृद्धि, खुशहाली और निरंतर प्रगति की मंगलकामना की.
मुख्यमंत्री साय ने कहा कि छेरछेरा महादान, सामाजिक समरसता और दानशीलता का प्रतीक पर्व है. जो छत्तीसगढ़ की समृद्ध, गौरवशाली और मानवीय मूल्यों से ओत-प्रोत परंपरा को सजीव रूप में अभिव्यक्त करता है. नई फसल घर आने की खुशी में यह पर्व पौष मास की पूर्णिमा को बड़े हर्ष और उत्साह के साथ मनाया जाता है.

गरियाबंद/कोपरा : आमतौर पर कलश में जल, नारियल और आम के पत्ते होते हैं. लेकिन गरियाबंद जिले के ग्राम तर्रा में इस बार कलशों में आस्था के साथ-साथ हरी-भरी सब्जियां भी सजीं। मौका था मरार पटेल समाज द्वारा आयोजित मां शाकंभरी जयंती और छेरछेरा पर्व का.. जहां शुद्ध शाकाहारी सब्जियों से सजी कलश यात्रा ने हर किसी का ध्यान खींच लिया.
मूली, गोभी, भाटा (बैंगन), मिर्चा और टमाटर से सुसज्जित कलशों के साथ जब यात्रा गांव की गलियों से निकली तो पूरा माहौल भक्तिमय हो उठा. मां शाकंभरी के जयकारे, ढोल-नगाड़ों की गूंज और श्रद्धालुओं की भीड़ ने गांव को एक अलग ही रंग में रंग दिया. यह यात्रा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक बनी. बल्कि प्रकृति और अन्न के प्रति सम्मान का संदेश भी देती नजर आई.
आयोजन के दौरान मां शाकंभरी, दुर्गा जगदंबा शक्ति, शताक्षी, वनशंकरी (बनशंकरी) और आशापुरा माता की विधिवत पूजा-अर्चना की गई. समाजजनों का कहना है कि मां शाकंभरी को अन्न और सब्जियों की देवी माना जाता है. इसलिए यह आयोजन शुद्ध शाकाहार और पर्यावरण संरक्षण की भावना को जीवंत करता है.
छेरछेरा पर्व के साथ हुए इस आयोजन में सामाजिक समरसता और लोक परंपराओं की झलक साफ दिखाई दी. महिलाओं, युवाओं और बुजुर्गों की समान भागीदारी ने कार्यक्रम को खास बना दिया.
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घर-घर अन्न दान लेकर मंत्री टंक राम वर्मा ने निभाई छेरछेरा की परम्परा

धरसींवा : छेरछेरा तिहार के मौके पर राज्य के राजस्व मंत्री टंक राम वर्मा ने धरसींवा विकासखंड के ग्राम तरपोंगी में पारंपरिक रुप से घर-घर जाकर अन्न दान ग्रहण किया. इस मौके पर गांव में उत्साह, अपनत्व और लोक उल्लास का वातावरण देखने को मिला.
मंत्री वर्मा ने छेरछेरा की परम्परा का निर्वहन करते हुए ग्रामीणों से आत्मीय भेंट की और अन्न दान स्वीकार किया. उन्होंने कहा कि छेरछेरा तिहार छत्तीसगढ़ की आत्मा से जुड़ा पर्व है. जो समाज में समानता, सहयोग और दान की भावना को सशक्त करता है. यह लोक पर्व हमें अपनी जड़ों से जोड़ता है और सामाजिक समरसता का संदेश देता है.
मंत्री वर्मा ने कहा कि छेरछेरा सिर्फ अन्न संग्रह का तिहार नहीं, बल्कि यह लोक संस्कृति, भाईचारे और मानवीय संवेदनाओं का उत्सव है. छत्तीसगढ़ की लोक परम्पराएं हमारी पहचान हैं और इन्हें संजोकर रखना हम सभी का दायित्व है. ऐसे पर्व समाज को जोड़ते हैं और नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराते हैं.
इस मौके पर ग्रामीणों ने पारंपरिक उल्लास के साथ मंत्री का स्वागत किया. गांव में छेरछेरा तिहार की रौनक देखते ही बन रही थी. बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों ने पूरे उत्साह के साथ इस लोक पर्व में सहभागिता निभाई. इस कार्यक्रम में जनप्रतिनिधि एवं बड़ी तादाद में ग्रामीणजन उपस्थित रहे.
उल्लेखनीय है कि छेरछेरा छत्तीसगढ़ का लोकप्रिय पारंपरिक लोक-पर्व है. जिसे धान कटाई के बाद पौष मास (दिसंबर–जनवरी) में मनाया जाता है. यह पर्व राज्य की कृषि संस्कृति से गहराई से जुड़ा है. फसल कटने के उपरांत किसान ईश्वर और समाज के प्रति कृतज्ञता प्रकट करता है.
छेरछेरा मूल रूप से दान, सहयोग और आपसी भाईचारे का पर्व है. इस दिन गांव के बच्चे, युवा और बुजुर्ग टोली बनाकर घर-घर जाते हैं और लोकगीत गाते हुए अन्न या दान मांगते हैं. दरवाजे पर पहुंचकर “छेरछेरा छेरछेरा, माई कोठी के धान ला हेरा…” का गायन किया जाता है, जिसका भाव यह होता है कि माता के भंडार में भरपूर धान है. उसमें से थोड़ा दान प्रदान करें।इकट्ठा की गई सामग्री का उपयोग सामूहिक भोज, जरुरतमंदों की सहायता एवं सामाजिक कार्यों में किया जाता है. यह पर्व अमीर-गरीब, जाति-धर्म के भेद को मिटाकर सामाजिक संवेदनशीलता को बढ़ाता है और नई पीढ़ी को साझा संस्कृति एवं लोक परम्पराओं से जोड़ता है.
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छेरछेरा… छेरछेरा…’ की गूंज से गूंजा गरियाबंद

‘गरियाबंद : छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक-संस्कृति और सामाजिक समरसता का प्रतीक छेरछेरा पर्व इस साल भी पूरे उल्लास, श्रद्धा और सद्भाव के साथ मनाया जा गया. शहर से लेकर गांव तक इस पारंपरिक लोक-पर्व की रौनक देखते ही बन रही है. गरियाबंद में सुबह होते ही बच्चों की टोलियां “छेरछेरा… छेरछेरा…” की मधुर पुकार के साथ सड़कों, गलियों और मोहल्लों में निकल पड़ीं। जिससे पूरा वातावरण लोक-आनंद से भर उठा.
पुराना मंगल बाजार क्षेत्र में आज छेरछेरा पर्व का विशेष उत्साह देखने को मिला। जहां कुछ बच्चे बाकायदा ढोल-नगाड़ों के साथ छेरछेरा मांगते नजर आए. बच्चे छत्तीसगढ़ी लोकगीत गाते हुए- “छेरछेरा… कोठी के धान ला हेर-हेरा…” की स्वर लहरियों के साथ घर-घर पहुंचे और परंपरा का जीवंत प्रदर्शन किया.
बच्चों ने टोकरी, चुंगड़ी और थैलों में अन्न, धान और दान एकत्र किया। यह दृश्य केवल मांगने का नहीं, बल्कि दान, त्याग और आपसी प्रेम की भावना का सशक्त प्रतीक बन गया. गली-मोहल्लों में बुजुर्गों, महिलाओं और परिवारजनों ने बच्चों को धान, चावल, नकद राशि और मिठाइयाँ देकर उनका उत्साह बढ़ाया और इस लोक-पर्व को श्रद्धा के साथ निभाया.
ग्रामीण अंचलों के साथ-साथ शहरी परिवेश में भी छेरछेरा पर्व को लेकर खासा उत्साह नजर आया. आधुनिक जीवनशैली के बीच भी लोगों ने अपनी जड़ों से जुड़ाव बनाए रखते हुए इस परंपरा को ससम्मान आगे बढ़ाया. यह पर्व केवल बच्चों तक सीमित नहीं रहा. बल्कि बुजुर्गों और युवाओं ने भी सहभागिता निभाकर सामाजिक एकता और आपसी अपनत्व का संदेश दिया.
उल्लेखनीय है कि छेरछेरा छत्तीसगढ़ का अत्यंत प्राचीन लोक-पर्व है. जो दान, समरसता और सामाजिक सौहार्द का प्रतीक माना जाता है. यह पर्व नई पीढ़ी को संस्कार, परंपरा और सामूहिकता का पाठ पढ़ाता है और यह सिद्ध करता है कि छत्तीसगढ़ की लोक-परंपराएं आज भी जीवंत और सशक्त हैं.
धरमीन बाई सिन्हा (बुजुर्ग महिला) ने कहा “हमारे जमाने से छेरछेरा मनाते आ रहे हैं. यह पर्व केवल बच्चों के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज को जोड़ने वाला है. जब बच्चे छेरछेरा मांगने आते हैं तो मन अपने आप खुश हो जाता है. अन्न और दान देना पुण्य का काम माना जाता है. इससे आपसी प्रेम बढ़ता है और समाज में बराबरी की भावना आती है. आज की पीढ़ी भी इस परंपरा को निभा रही है, यह देखकर बहुत संतोष होता है. छेरछेरा हमें सिखाता है कि जितना हो सके, दूसरों के साथ बाँटकर चलें.”
लता सिन्हा ने कहा कि “छेरछेरा छत्तीसगढ़ की आत्मा है. इस दिन अमीर-गरीब का कोई भेद नहीं रहता। सभी एक-दूसरे को दान देते हैं और आशीर्वाद लेते हैं. बच्चों की आवाज़ सुनकर पुराने दिन याद आ जाते हैं. ढोल-नगाड़ों और लोकगीतों के साथ जब बच्चे आते हैं. तो पूरा माहौल उत्सवमय हो जाता है. यह पर्व हमें हमारी संस्कृति से जोड़े रखता है और आने वाली पीढ़ी को संस्कार देने का काम करता है. ऐसी परंपराएं कभी खत्म नहीं होनी चाहिए.”
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