सिस्टम की नाकामी पर भड़की मजबूर जनता, गरियाबंद में हक की लड़ाई लड़ने चक्काजाम-धरना प्रदर्शन, कितने बार थामेंगे आश्वासन का झुन-झुना
The helpless public is enraged by the failure of the system, road blockades and protests are being held in Gariaband to fight for their rights, how many times will they keep the assurances?
गरियाबंद : छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में सरकारी आश्वासनों से ऊबे साहेबीन कछार गांव के ग्रामीणों का गुस्सा आखिरकार सड़क पर फूट पड़ा. Education, Road Connectivity और Health Infrastructure जैसी बुनियादी सुविधाओं की मांग सालों से लंबित रहने के बाद उदंती-सीता नदी अभ्यारण्य के Core Zone में बसे साहेबीन कछार गांव के 200 से ज्यादा ग्रामीणों ने सोमवार सुबह National Highway-130C पर पहुंचकर चक्का जाम कर दिया. इस Highway Blockade Protest के चलते सड़क के दोनों ओर यात्री बसों, मालवाहक वाहनों और निजी गाड़ियों की लंबी कतारें लग गईं.
ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन ने बार-बार सिर्फ आश्वासन दिए. जबकि जमीनी स्तर पर कोई ठोस काम नहीं हुआ. यही वजह है कि इस बार ग्रामीणों ने साफ कर दिया था कि जब तक लिखित आश्वासन और समयबद्ध कार्रवाई का भरोसा नहीं मिलेगा. तब तक प्रदर्शन खत्म नहीं किया जाएगा.
साहेबीन कछार गांव Udanti-Sitanadi Tiger Reserve के कोर इलाके में आता है. वन क्षेत्र में बसे होने के कारण यहां विकास कार्य पहले से ही धीमी रफ्तार से चलते हैं. ग्रामीणों का आरोप है कि इसी बहाने उन्हें सड़क, स्कूल, बिजली, मोबाइल नेटवर्क और स्वास्थ्य सेवाओं से लगातार वंचित रखा गया है. हालात ऐसे हैं कि बीमार मरीजों को कई किलोमीटर पैदल या कच्चे रास्तों से बाहर ले जाना पड़ता है. जो कई बार जानलेवा साबित होता है.
यह आंदोलन ग्राम प्रमुख अर्जुन नायक और रूपसिंह मरकाम के नेतृत्व में किया गया. सुबह-सुबह ग्रामीण महिलाएं, पुरुष और युवा हाथों में तख्तियां लेकर नेशनल हाइवे पर बैठ गए. नारे साफ थे— “आश्वासन नहीं, काम चाहिए”. मौके पर Indagaon Police पहुंची और ग्रामीणों को समझाने की कोशिश की. लेकिन प्रदर्शनकारियों का कहना था कि वे अब सिर्फ बातों पर भरोसा नहीं करेंगे.
ग्रामीणों की 8 सूत्रीय मांगें
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पहले भी दिया था ज्ञापन, नहीं हुआ अमल
ग्रामीणों ने बताया कि 28 अक्टूबर को वे कलेक्टर को ज्ञापन सौंप चुके हैं. ग्राम प्रमुख अर्जुन नायक के मुताबिक पिछले तीन साल में उन्होंने जनपद पंचायत, जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधियों तक अपनी समस्याएं पहुंचाईं. लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन मिला. काम धरातल पर नहीं उतरा. इसी नाराजगी के चलते इस बार ग्रामीणों ने Direct Action Protest का रास्ता चुना.
प्रशासन का लिखित आश्वासन, तब हटाया गया जाम
करीब कई घंटों तक चले चक्का जाम के बाद मैनपुर तहसीलदार रमेश कुमार मेहता मौके पर पहुंचे. उन्होंने प्रशासन की ओर से सभी 8 मांगों पर कार्रवाई शुरु करने और उन्हें पूरा करने के लिए 3 महीने का समय मांगा. खास बात यह रही कि तहसीलदार ने ग्रामीणों को Written Assurance दिया. जिसका उल्लेख मांग पत्र में भी किया गया.
लिखित आश्वासन मिलने के बाद ग्रामीणों ने आपसी चर्चा की और फिर प्रदर्शन को स्थगित करने पर सहमति जताई. इसके बाद नेशनल हाइवे पर यातायात धीरे-धीरे बहाल हो सका.
चेतावनी भी दी
हालांकि ग्रामीणों ने यह भी साफ कर दिया है कि अगर तय समय सीमा में काम शुरु नहीं हुआ तो वे फिर से आंदोलन करेंगे और इस बार प्रदर्शन और भी उग्र हो सकता है. ग्रामीणों का कहना है कि यह सिर्फ एक गांव की नहीं, बल्कि Remote Tribal Areas Development से जुड़ी लड़ाई है.
फिलहाल प्रशासनिक आश्वासन के बाद हालात सामान्य हैं. लेकिन अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि क्या वाकई साहेबीन कछार के ग्रामीणों को सड़क, स्कूल, बिजली और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं मिल पाएंगी या फिर यह आश्वासन भी कागजों तक ही सिमट कर रह जाएगा.
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