मेकाहारा प्रसूति वार्ड में एक बेड पर दो प्रसूताएं, फर्श पर भी लेटे मरीज, इधर आयुष्मान कार्ड से 66 हजार के क्लेम के बाद मरीज से 60 हजार नकद लेने का आरोप

Two new mothers sharing a single bed in the Mekahara maternity ward, with patients also lying on the floor; meanwhile, allegations have surfaced that ₹60,000 in cash was charged to a patient despite a ₹66,000 claim being processed via the Ayushman card.

मेकाहारा प्रसूति वार्ड में एक बेड पर दो प्रसूताएं, फर्श पर भी लेटे मरीज, इधर आयुष्मान कार्ड से 66 हजार के क्लेम के बाद मरीज से 60 हजार नकद लेने का आरोप

मेकाहारा प्रसूति वार्ड में एक बेड पर दो प्रसूताएं
रायपुर : रायपुर के डॉ. भीमराव आंबेडकर स्मृति चिकित्सालय (मेकाहारा) के प्रसूति वार्ड का एक वीडियो सामने आया है. जिसने अस्पताल की व्यवस्थाओं पर सवाल खड़े कर दिए हैं. वीडियो में एक ही बेड पर दो प्रसूताएं अपने नवजात शिशुओं के साथ दिख रही हैं. जबकि कुछ महिलाएं और उनके परिजन फर्श पर बिस्तर बिछाकर लेटे नजर आ रहे हैं.
मेकाहारा, पं. जवाहरलाल नेहरू स्मृति चिकित्सा महाविद्यालय से संबद्ध है और राजधानी का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल माना जाता है. ऐसे में यहां बेड की कमी का मुद्दा सीधे प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं की क्षमता से जुड़ गया है.
फिलहाल वीडियो के आधार पर स्थिति सामने आई है. अस्पताल प्रशासन या स्वास्थ्य विभाग की ओर से आधिकारिक पक्ष इस जानकारी में उपलब्ध नहीं है.
वीडियो में क्या दिख रहा है?
सामने आए दृश्यों के मुताबिक
एक सिंगल बेड पर दो प्रसूताएं अपने नवजात बच्चों के साथ हैं.
जगह कम होने से महिलाओं को करवट लेने में भी परेशानी हो सकती है.
कुछ महिलाएं और तीमारदार वार्ड के फर्श पर गद्दे या चादर बिछाकर लेटे हैं.
प्रसूता वार्ड में भीड़ क्यों चिंता की बात है?
डिलीवरी के बाद मां और नवजात दोनों को साफ-सुथरे और शांत माहौल की जरूरत होती है. नवजात शिशुओं की रोग-प्रतिरोधक क्षमता कम होती है. इसलिए भीड़भाड़ की स्थिति में संक्रमण फैलने का जोखिम बढ़ सकता है. चिकित्सा जगत में एक ही बेड साझा करने को सामान्यतः उचित व्यवस्था नहीं माना जाता.
स्वास्थ्य विभाग और मंत्री से क्या सवाल उठ रहे हैं?
इस मामले के बाद स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल और विभाग से कई सवाल पूछे जा रहे हैं:
राजधानी के सबसे बड़े अस्पताल में बेड क्षमता का विस्तार क्यों नहीं हुआ?
जिला अस्पतालों को इतना सक्षम क्यों नहीं बनाया गया कि मरीजों को रायपुर रेफर न करना पड़े?
अव्यवस्था के लिए अस्पताल प्रबंधन की जवाबदेही क्या तय हुई है?
क्या अब तक कोई कार्रवाई या वैकल्पिक व्यवस्था की गई है?
ये सवाल फिलहाल आलोचकों और विपक्ष की ओर से उठाए गए बिंदु हैं. विभाग का जवाब आना बाकी है.
आगे क्या होना चाहिए?
अस्पताल प्रशासन की ओर से बेड की संख्या और वर्तमान भर्ती मरीजों का आंकड़ा सामने आना चाहिए.
अतिरिक्त बेड या अस्थायी वार्ड जैसी वैकल्पिक व्यवस्था पर स्पष्टता जरूरी है.
वीडियो की तारीख और स्थिति की आधिकारिक पुष्टि होनी चाहिए.
आधिकारिक बयान आने पर स्थिति का अपडेट देखा जाना चाहिए.
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आयुष्मान कार्ड से 66 हजार के क्लेम के बाद मरीज से 60 हजार नकद लेने का आरोप
धमतरी : कैशलेस इलाज का दावा करने वाले आयुष्मान कार्ड के सामने धमतरी के शिवनन्दा हॉस्पिटल में एक मरीज को कथित तौर पर लगभग 60 हजार रुपये नकद देने पड़े आरोप है कि अस्पताल ने आयुष्मान कार्ड से करीब 66 हजार रुपये का क्लेम लेने के बाद भी दवा, जांच और अन्य खर्चों के नाम पर मरीज से अतिरिक्त राशि वसूली. इस तरह टूटी हड्डी के इलाज पर कुल खर्च करीब 1 लाख 26 हजार रुपये हो गया.
कार्ड था, फिर भी नकदी क्यों?…
पीड़ित मरीज टूटी हड्डी के इलाज के लिए अस्पताल पहुंचा था और उसे आयुष्मान योजना के तहत बिना पैसे उपचार मिलने की उम्मीद थी. लेकिन उसका आरोप है कि इलाज के दौरान अलग-अलग मदों में नकद रकम मांगी गई. आयुष्मान योजना में पात्र मरीजों को सूचीबद्ध अस्पतालों में कैशलेस इलाज मिलना है. जबकि अस्पताल अपने बिल का भुगतान क्लेम के माध्यम से लेता है.
यही बात मामले को संवेदनशील बनाती है…जब कार्ड से क्लेम हो चुका हो, तो मरीज से नकदी लेने का आधार क्या था?
शिकायत पहुंची कलेक्टर दरबार…
पीड़ित ने मामले की शिकायत कलेक्टर कार्यालय में की है. बताया जा रहा है कि कलेक्टर ने संज्ञान लेते हुए जांच के बाद नियमानुसार कार्रवाई का भरोसा दिया है. अब जांच में यह देखना होगा कि अस्पताल ने कितने का क्लेम भरा, किन मदों में नकद लिया और क्या वह भुगतान योजना के नियमों के अनुरूप था.
भरोसे पर सवाल…
आयुष्मान योजना का उद्देश्य गरीब और जरूरतमंद मरीजों को इलाज के आर्थिक बोझ से बचाना है. अगर कैशलेस इलाज के नाम पर मरीज से अतिरिक्त राशि लेने का आरोप सही निकला. तो यह सिर्फ एक मरीज की परेशानी नहीं, बल्कि पूरी योजना के भरोसे पर सवाल होगा.
अस्पताल का पक्ष खाली…
निष्पक्षता के लिए डॉक्टर विभोर नंदा से संपर्क का प्रयास किया गया. लेकिन फोन रिसीव नहीं हुआ. ऐसे में अस्पताल प्रबंधन का पक्ष अब तक सामने नहीं आया है. जब तक दस्तावेज और अस्पताल की प्रतिक्रिया जांच में सामने नहीं आते, आरोपों को अंतिम सच नहीं माना जा सकता—पर सवाल जरूर खड़ा है.
अब निगाहें प्रशासन की जांच पर हैं…क्या मरीज को न्याय मिलेगा या फिर यह मामला फाइलों में दब जाएगा?
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