खेलते-खेलते घर के सामने कड़ी यात्री बस में चढ़ गया पांच वर्षीय मूक-श्रवण बाधित बालक, ड्राइवर-कंडक्टर की सूझबूझ से टली बड़ी अनहोनी
A five-year-old deaf and hearing-impaired boy boarded a passenger bus parked in front of his house while playing. The driver and conductor's presence of mind averted a major tragedy.
गरियाबंद/छुरा : गांव में हुए शादी समारोह से लौटते समय खेलते-खेलते बस में चढ़ गया पांच वर्षीय कुनाल, दो से तीन घंटे के भीतर साझा प्रयासों से मिला परिवार से मंगलवार दोपहर एक ऐसी घटना सामने आई जिसने पहले तो सभी को चिंता में डाल दिया। लेकिन आखिर में राहत और सुकून की सांस लेने का मौका भी दिया.
मिली जानकारी के मुताबिक पलसिपानी नामक गांव में सम्पन्न हुए शादी समारोह से लौट रहे परिवार के बीच खेलते-खेलते पांच साल का मासूम कुनाल मांझी अनजाने में बागबाहरा से छुरा चलने वाली एक प्राइवेट ट्रैवल बस में चढ़ गया. सड़क से लगे घर में परिवारजन अपने कामकाज में बीजी थे. और किसी को अंदाजा तक नहीं हुआ कि बच्चा कब बस में बैठकर लंबी दूरी तय कर छुरा पहुंच गया. किसी को इस बात की खबर नहीं थी कि मासूम खेल-खेल में घरवालों से दूर चला गया है और एक बड़ी अनहोनी टलते-टलते बची.
बस जब छुरा पहुंची और सभी यात्री उतर गए. तब बस में सिर्फ एक छोटा बच्चा अकेला बैठा मिला. यहीं से बस चालक और कंडक्टर की सूझबूझ की असली परीक्षा शुरु हुई. परिचालक ने बच्चे से नाम, पता और साथ आए लोगों के बारे में पूछने की कोशिश की. लेकिन बच्चा मूक और श्रवण बाधित होने की वजह से कुछ भी बता नहीं सका. हालात की गंभीरता को समझते हुए चालक-परिचालक ने लापरवाही न बरतते हुए फौरन जिम्मेदारी दिखाई और बच्चे को बस स्टैंड पर छोड़ने के बजाय सीधे छुरा थाना पहुंचाया. उनकी तत्परता और संवेदनशीलता ने एक संभावित बड़े हादसे को टाल दिया.
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थाने में पहुंचने के बाद मामले को गंभीरता से लेते हुए वहां सक्रिय कानूनी जागरुकता से जुड़ी संस्था के प्रतिनिधियों को खबर दी गई. बचपन बचाओ योजना के अंतर्गत काम कर रहे जिला विधिक सेवा प्राधिकरण रायपुर के अधिकार मित्र वालेंटियर टिकेश्वर निषाद ने छुरा थाना की मदद से बच्चे की पहचान और परिजनों की खोज में अहम भूमिका निभाई। बच्चे का नाम कुनाल मांझी पिता नरसिंह मांझी होना पता चला जो महासमुंद जिला के पलसिपानी बताए गए.
टुहलु पुलिस चौकी से भी संपर्क साधा गया. सोशल मीडिया और आपसी नेटवर्क के जरिए जानकारी साझा की गई. जिसके सकारात्मक परिणाम सामने आए. महज दो से तीन घंटे के भीतर बच्चे की सही लोकेशन का पता लगाकर उसके माता-पिता से संपर्क स्थापित कर लिया गया.
आज जहां सोशल मीडिया पर अक्सर अफवाहें और गलत खबरें तेजी से फैलती देखी जाती हैं. वहीं इस घटना में इसका एक सकारात्मक पक्ष भी सामने आया. समन्वित प्रयास, पुलिस-प्रशासन की सक्रियता, कानूनी संस्था की तत्परता और बस चालक-परिचालक की मानवीय संवेदनशीलता के कारण एक मूक-श्रवण बाधित मासूम सुरक्षित अपने परिवार की गोद में लौट सका.
यह घटना न केवल सजग नागरिकता की मिसाल है. बल्कि यह भी संदेश देती है कि जिम्मेदारी और सामूहिक प्रयास से बड़ी से बड़ी अनहोनी को टाला जा सकता है मां-बाप से बिछड़ा यह मासूम आख़िरकार सुरक्षित मिला. जिसने पूरे क्षेत्र को राहत और सुकून का अहसास कराया.
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