जमीन की कीमतें 5-9 गुना बढ़ने पर विरोध, पुतला दहन, दिखाए काले झंडे, पुलिस ने किया लाठीचार्ज, व्यापारियों को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा, कई घायल
Protests effigy burning, black flags displayed, police lathicharge, traders chased and beaten, several injured as land prices increased 5-9 times.
दुर्ग : छत्तीसगढ़ जमीन गाइडलाइन की दरों में अप्रत्याशित वृद्धि को लेकर दुर्ग में बवाल मच गया है. आज शहर में एक ऐतिहासिक और हिंसक विरोध प्रदर्शन देखने को मिला, जिसमें सैकड़ों की संख्या में जमीन कारोबारी, जिन्हें अक्सर ‘जमीन के राजा’ कहा जाता है, सड़कों पर उतर आए.स्थिति तब विस्फोटक हो गई जब कलेक्ट्रेट का घेराव करने के लिए पैदल मार्च कर रहे प्रदर्शनकारियों पर पुलिस ने बर्बर लाठीचार्ज कर दिया।
विरोध प्रदर्शन में शामिल लोगों का गुस्सा सातवें आसमान पर था. वे अपने हाथों में काला गुब्बारा और काले झंडे लिए हुए थे. जो यह दर्शाता है कि यह वृद्धि उनके कारोबार के लिए किसी काले कानून से कम नहीं है. गाइडलाइन वृद्धि वापस लो के नारों के साथ, प्रदर्शनकारियों का यह सैलाब कलेक्ट्रेट की ओर बढ़ रहा था.
प्रदर्शन की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन ने पहले ही भारी पुलिस बल तैनात कर दिया था. कलेक्ट्रेट से पहले ही प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए पुख्ता घेराबंदी की गई थी. अधिकारियों ने प्रदर्शनकारियों को वापस जाने की चेतावनी दी. लेकिन आक्रोशित भीड़ ने पीछे हटने से साफ इनकार कर दिया.
सूत्रों के मुताबिक जब प्रदर्शनकारियों ने घेराबंदी तोड़ने की कोशिश की और कलेक्ट्रेट की ओर बलपूर्वक आगे बढ़ने लगे, तब पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए अंतिम उपाय के तौर पर लाठीचार्ज का सहारा लिया। चश्मदीदों का कहना है कि पुलिस के ने तांडव मचा दिया हो। अफरातफरी के माहौल में भगदड़ मच गई. लाठीचार्ज में कई प्रदर्शनकारियों को गंभीर चोटें आई हैं. जिन्हें इलाज के लिए नजदीकी अस्पताल ले जाया गया. कारोबारी इसे अलोकतांत्रिक और दमनकारी बता रहे हैं और इस कार्रवाई को खूनी लाठीचार्ज करार दे रहे हैं.
फिलहाल, इलाके में तनावपूर्ण शांति बनी हुई है। इस लाठीचार्ज की घटना ने न सिर्फ जमीन कारोबारियों को नाराज किया है, बल्कि इसने स्थानीय राजनीति का तापमान भी बढ़ा दिया है. कारोबारियों ने धमकी दी है कि अगर उनकी मांगें जल्द पूरी नहीं हुईं तो वे और भी बड़े और उग्र आंदोलन के लिए तैयार हैं. सरकार के लिए यह प्रदर्शन अब केवल राजस्व का नहीं, बल्कि जनता के गुस्से को शांत करने का विषय बन गया है.
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महासमुंद में बिफरी जनता बोली: अब नहीं चलेगा मनमाना बाजार मूल्य
महासमुंद :पूरे महासमुंद जिले में इन दिनों एक ही मुद्दा हर चौराहे, हर बैठक, हर पंचायत में गरम है. जमीन के बाजार मूल्य में अचानक 300 से 500 प्रतिशत तक की बेतहाशा वृद्धि! जनता की आवाज अब सिर्फ असंतोष नहीं, बल्कि उग्र जनाक्रोश में बदलने लगी है. लोग इसे शासन की “मनमानी”, “अन्यायपूर्ण” और “जनविरोधी” कार्रवाई करार दे रहे हैं. इसी के विरोध में जिला कलेक्टर एवं एसडीएम महासमुंद को एक भावनात्मक, तीखा और असरदार ज्ञापन सौंपा गया. जिसने प्रशासनिक हलकों में हलचल मचा दी है.
वर्ष 2025-26 के लिए केन्द्रीय मूल्यांकन बोर्ड छत्तीसगढ़ रायपुर द्वारा जारी नई गाइडलाइन 20 नवंबर से लागू कर दी गई. लेकिन यह फैसला सिर्फ एक नई गाइडलाइन नहीं, बल्कि जैसे बिजली गिर गई हो आम लोगों पर...
भारत में प्रथा है कि हर साल वित्तीय वर्ष की शुरुआत में गाइडलाइन की दरें तय होती हैं. लेकिन छत्तीसगढ़ में पहली बार साल के बीच में गाइडलाइन में संशोधन किया गया और वो भी इतना भारी कि आम जनता ल की आंखें फटी की फटी रह गईं.
पहले ही 2025-26 की गाइडलाइन में 42% की वृद्धि कर दी गई थी और अब बिना चेतावनी, बिना अधिसूचना, बिना आपत्ति-सुझाव प्रक्रिया के एक झटके में 300% से 500% तक की नई वृद्धि..
जनता पूछ रही है कि “यह बाजार मूल्य है या जनता को बाजार में चढ़ाने की नीति?”
जमीन सस्ती—रजिस्ट्री महंगी!
महासमुंद जिले में स्थिति ऐसी हो गई है कि “अब जमीन की कीमत कम और सेल डीड का खर्च ज्यादा पड़ रहा है ”जो कि खरीदने-बेचने वालों के लिए पूरी तरह अव्यवहारिक और अन्यायपूर्ण है. जहां विकास शून्य है, इंफ्रास्ट्रक्चर का नामोनिशान नहीं, वहीं पर गाइडलाइन की कीमतें आसमान छू रही हैं।
गांवों के लोग कहते हैं कि “जहां सड़क टूटी, जहां पानी नहीं, वहां जमीन का मूल्य दिल्ली-कोलकाता जैसा क्यों?”
ज्ञापन में गंभीर आरोप है कि:
•न कोई अधिसूचना निकाली गई,
•न आपत्तियां ली गईं,
•न सुझाव आमंत्रित हुए,
•न ग्राम या वार्ड स्तरीय बैठकें हुईं,
सब कुछ मनमाने तरीके से,सब कुछ बिना पारदर्शिता के,सब कुछ जनता को विश्वास में लिए बगैर कर दिया गया।
पंजीयन का ग्राफ गिरा—राजस्व को घाटा शुरू!
महासमुंद पंजीयन कार्यालय में प्रतिदिन 30 से 40 पंजीयन होते थे।लेकिन नई गाइडलाइन के लागू होने के बाद पिछले 10 दिनों में यह संख्या घटकर 15 से 20 रह गई.
यानी 50% से भी ज्यादा कमी!
सीधे-सीधे यह राज्य सरकार को राजस्व हानि पहुँचा रही है. जनता सवाल पूछ रही है कि “अगर सरकार का फैसला जनता को ही नहीं पचेगा, तो राजस्व कहां से आएगा?”
किसानों पर डबल मार—आयकर और महंगी रजिस्ट्री
नई गाइडलाइन का सबसे ज्यादा असर आम आदमी और किसानों पर पड़ रहा है।गरीब किसान जो—
•बेटी की शादी,
•खेत का इलाज,
•कर्ज चुकाने,
•या इलाज के लिए,
अपनी जमीन बेचते थे, अब उनके सामने बड़ी समस्या खड़ी हो गई है।ऊंची गाइडलाइन का मतलब है—
अनावश्यक आयकर,बढ़ा हुआ स्टांप शुल्क,और कई बार जमीन का सौदा रद्द!किसानों का दर्द शब्दों में छलक पड़ा—
“हमारी जमीन बिकेगी नहीं, तो हम बचेंगे कैसे?”
भविष्य में बैंक धोखाधड़ी का खतरा ज्ञापन में चेतावनी दी गई है कि:
•बाजार दर और गाइडलाइन दर की विशाल खाई,
भविष्य में बैंक ऋण, मॉर्गेज और मूल्यांकन में
गंभीर भ्रम पैदा करेगी।
अगर जमीन का गाइडलाइन मूल्य 20 लाख हैऔर बाजार मूल्य 6 लाख—तो बैंक गलत लोन जारी कर सकते हैं,जो बाद में आर्थिक घोटालों और कर्ज वसूली संकट को जन्म देगा.
लाखों लोगों का रोजगार खतरे में निर्माण और भूमि व्यवसाय से जुड़े—
•इंजीनियर,
•मजदूर,
•सर्वे करने वाले,
•लोहा,सीमेंट, रेत बेचने वाले,
•एजेंट,
•दस्तावेज लेखक,
इन लाखों लोगों का रोजगार इस गाइडलाइन से प्रभावित होगा.
सबसे बड़ा खतरा—निवेशक बाहर भागेंगे!
बाहर से आने वाले निवेशक अब छत्तीसगढ़ की गाइडलाइन देखते ही अपना पैसा दूसरे राज्यों में ले जाएंगे।इसका मतलब—छत्तीसगढ़ को राजस्व की दोहरी मार—एक जनता से, दूसरी व्यापारी निवेश से.
जनता का अंतिम अल्टीमेटम—जनआंदोलन होगा!
ज्ञापन में बताया गया है कि:अगर सरकार को सचमुच जनता की चिंता है, तो—
•गाइडलाइन तुरंत वापस ली जाए,
•नई दरों का समुचित, न्यायसंगत निर्धारण किया जाए,
•जनता, जनप्रतिनिधियों और किसान संगठनों की राय ली जाए,
•नई गाइडलाइन नए वित्तीय वर्ष से लागू हो,
अन्यथा महासमुंद की जनता जन आंदोलन शुरू करने को विवश होगी,जिसकी संपूर्ण जिम्मेदारी छत्तीसगढ़ सरकार की होगी।
ज्ञापन की प्रतिलिपि भेजी गई—माननीय राज्यपाल, छत्तीसगढ़
•मुख्यमंत्री, छ.ग.,
•वित्त एवं वाणिज्य कर मंत्री,
•जिलाधीश, महासमुंद,
•महानिरीक्षक पंजीयन,
•उप महानिरीक्षक पंजीयन,
•जिला पंजीयक एवं उप-पंजीयक महासमुंद,
इस मुद्दे ने महासमुंद में राजनीतिक और प्रशासनिक तापमान दोनों बढ़ा दिए हैं।अब देखना है कि सरकार जनता की पुकार सुनकर राहत देती है या आने वाले दिनों में महासमुंद एक बड़े जनआंदोलन का केंद्र बनेगा.
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मोदी-ईडी के खिलाफ कांग्रेस का फूटा आक्रोश
बिलासपुर : प्रदेश कांग्रेस कमेटी के निर्देश पर बिलासपुर शहर और ग्रामीण कांग्रेस कमेटियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईडी का पुतला दहन करते हुए तीखा विरोध दर्ज कराया. नेहरु चौक की ओर बढ़ते कांग्रेस कार्यकर्ताओं को रोकने की पुलिस की कोशिश नाकाम रही और पुतला जलते ही वोट चोर-गद्दी छोड़” के नारे पूरे शहर में गूंज उठे. नेशनल हेराल्ड केस में राहुल गांधी से दोबारा पूछताछ की प्रक्रिया को कांग्रेस नेताओं ने केंद्र सरकार की घबराहट बताया.
सोमवार को कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईडी के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन करते हुए पुतला दहन किया. कांग्रेस भवन से रैली की शुरुआत हुई. जहां बड़ी तादाद में कार्यकर्ता इकट्ठे हुए और नारेबाजी करते हुए नेहरु चौक की ओर कूच किया.
नेहरु चौक पहुंचने से पहले पुलिस ने पूर्व की भांति पुतला छीनने का प्रयास किया. लेकिन कांग्रेसजनों ने पुतले को बचाते हुए नारेबाजी जारी रखी. पुतला जमीन पर रखते ही कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने उसे आग के हवाले कर दिया.
चौक कुछ मिनटों तक वोट चोर-गद्दी छोड़ के नारों से गूंजता रहा.
शहर कांग्रेस अध्यक्ष सिद्धांशु मिश्रा ने कहा कि नेशनल हेराल्ड मामले में ईडी पहले ही राहुल गांधी से पूछताछ कर चुकी है और केस वही है. उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ‘वोट चोर-गद्दी छोड़’ अभियान से विचलित है. और 14 दिसंबर को दिल्ली में होने वाले बड़े कार्यक्रम से पहले विपक्ष को दबाने के लिए नई एफआईआर और जांच का हथकंडा अपनाया गया है.
मिश्रा ने कहा कि देशभर में लोग समझ चुके हैं कि हरियाणा, महाराष्ट्र, बिहार और लोकसभा चुनावों में वोट चोरी हुई है. उनके मुताबिक लोग अब खुलकर कह रहे हैं – वोट चोर, गद्दी छोड़।” मिश्रा ने कहा कि प्रधानमंत्री ईडी के सहारे विपक्ष पर कार्रवाई कराकर इस दबाव से निकलने की कोशिश में हैं. लेकिन राहुल गांधी न झुकेंगे, न डरेंगे और पूरी कांग्रेस उनके साथ खड़ी है.
ग्रामीण कांग्रेस अध्यक्ष महेंद्र गंगोत्री ने नेशनल हेराल्ड मामले को आज़ादी की लड़ाई का प्रतीक बताया. उन्होंने कहा कि यह वह संस्था है. जिसने स्वतंत्रता सेनानियों की आवाज़ को देश के सामने रखा। गंगोत्री ने आरोप लगाया कि कंपनी नियमों के तहत किया गया. स्थानांतरण पूरी तरह पारदर्शी था और इसमें किसी भी व्यक्ति द्वारा एक पैसा भी लिया नहीं जा सकता.
गंगोत्री ने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि 250 करोड़ की चंदा लेने वाली बीफ कंपनी से जुड़े मामले में ईडी क्यों जांच नहीं कर रही. उन्होंने आरोप लगाया कि मोदी सरकार के कार्यकाल में सब्सिडी पाओ-चंदा दो वाली राजनीति के चलते भाजपा ने 2014 से अब तक 10 हजार करोड़ रुपये चंदे के तौर पर प्राप्त किए हैं.
गंगोत्री ने कहा कि भाजपा की राजनीति केंद्रीय जांच एजेंसियों के सहारे संचालित होती है. पहले ईडी, सीबीआई और इनकम टैक्स की कार्रवाई होती है. और फिर नेता डरकर भाजपा में शामिल होते हैं. जिसके बाद उनके खिलाफ कार्रवाई धीमी कर दी जाती है. उन्होंने अजित पवार और हेमंता बिस्वा सरमा जैसे मामलों का उल्लेख किया.
तला दहन कार्यक्रम में शहर अध्यक्ष सिद्धांशु मिश्रा, ग्रामीण अध्यक्ष महेंद्र गंगोत्री, पूर्व ग्रामीण अध्यक्ष विजय केशरवानी, पूर्व शहर अध्यक्ष विजय पांडे, समीर अहमद, जावेद मेमन, विनोद साहू, मोती ठारवानी, शेरू असलम, धर्मेश शर्मा, रणजीत सिंह, सुनील सोनकर, रमाशंकर बघेल, मनीष गढ़ेवाल, शेख निजामुद्दीन, दीपक रजक, रामप्रसाद साहू, देवेंद्र मिश्रा, अखिलेश गुप्ता, कमलेश दुबे, विकास सिंह, अर्जुन सिंह, विनय पांडे, शैलेश मिश्रा, अर्पित केशरवानी, नीरज सोनी, सुभाष ठाकुर, अभिलाष रजक, अयाज़ खान, सोहराब खान, हरमेन्द्र शुक्ला, शाहनवाज़ खान, उमेश कुर्मी, चंद्रहास केशरवानी, मनोज सिंह और प्रतीक तिवारी सहित अनेक कार्यकर्ता मौजूद रहे।
क्या है नेशनल हेराल्ड मामला…?
नेशनल हेराल्ड अख़बार की स्थापना स्वतंत्रता संग्राम के दौरान की गई थी, जिसे गांधी-नेहरु परिवार से जुड़े संस्थान ने संचालित किया.
अख़बार चलाने वाली एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (AJL) को घाटा होने के बाद कंपनी अधिनियम के तहत दूसरी संस्था ‘यंग इंडियन’ को ट्रांसफर किया गया.
ईडी का आरोप है कि ट्रांसफर प्रक्रिया में आर्थिक अनियमितता हुई और कुछ हिस्सों को अवैध तरीके से लाभ पहुंचाया गया. कांग्रेस का कहना है कि यह पूरी प्रक्रिया नियमों के तहत थी और इसे राजनीतिक बदले की कार्रवाई के तहत उठाया गया मुद्दा बताया जाता रहा है.
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