जामड़ी पाटेश्वर धाम के खिलाफ घेरा कलेक्ट्रेट, तीन बैरिकेड तोड़कर घुसे हजारों आदिवासी, उग्र प्रदर्शन के बाद चूल्हे पर पानी डालते ही भड़का आक्रोश

The Collectorate was surrounded against Jamdi Pateshwar Dham, thousands of tribals broke through three barricades and entered, anger erupted after water was poured on the stove after a violent protest.

जामड़ी पाटेश्वर धाम के खिलाफ घेरा कलेक्ट्रेट, तीन बैरिकेड तोड़कर घुसे हजारों आदिवासी, उग्र प्रदर्शन के बाद चूल्हे पर पानी डालते ही भड़का आक्रोश

बालोद : बालोद जिला में तुएगोंदी स्थित कथित अतिक्रमण, आदिवासी देवस्थल पर कब्जे और पाटेश्वर धाम विवाद को लेकर रविवार को बालोद जिला मुख्यालय में ऐसा उग्र प्रदर्शन देखने को मिला. जिसने पूरे प्रशासनिक अमले को हिला कर रख दिया. सर्व आदिवासी समाज के नेतृत्व में जिलेभर से पहुंचे हजारों लोगों ने कलेक्ट्रेट का घेराव किया और तीन स्तरीय सुरक्षा बैरिकेडिंग तोड़ते हुए सीधे कलेक्ट्रेट परिसर में प्रवेश कर गए.
कलेक्ट्रेट परिसर में ही डाला डेरा, कलेक्टर से मिलने पर अड़े प्रदर्शनकारी
चिलचिलाती धूप में सुबह से जुटे आदिवासी समाज के लोग अपनी मांगों को लेकर कलेक्टर से सीधी बात चाहते थे. घंटों इंतजार के बाद भी जब संतोषजनक जवाब नहीं मिला तो प्रदर्शनकारियों ने कलेक्ट्रेट परिसर के भीतर ही पंडाल लगाकर सभा शुरू कर दिया. दिन भर नारेबाजी और भाषणों का दौर चलता रहा.
चूल्हा जलते ही मचा बवाल, पुलिस ने डाला पानी
शाम होते-होते प्रदर्शनकारियों ने परिसर के भीतर ही भोजन बनाने की तैयारी शुरू कर दी. महिलाओं ने चूल्हा जलाकर खाना बनाना शुरू किया. इसी दौरान एक पुलिस अधिकारी द्वारा जलते चूल्हे में पानी डाल दिए जाने का आरोप है. इसके बाद माहौल अचानक गरमा गया.
आदिवासी महिलाओं और पुरुषों ने इसका तीखा विरोध किया. देखते ही देखते पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच जमकर झूमाझटकी शुरू हो गई. कुछ प्रदर्शनकारियों ने पुलिसकर्मियों की लाठियां तक पकड़ लीं. कलेक्ट्रेट परिसर में अफरा-तफरी का माहौल बन गया
बालोद में पहली बार चला वाटर कैनन
स्थिति बिगड़ती देख पुलिस ने सख्ती दिखाई और भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पहली बार वाटर कैनन का इस्तेमाल किया. पानी की तेज बौछारों के बावजूद प्रदर्शनकारी देर रात तक डटे रहे. पूरे परिसर को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया और अतिरिक्त बल तैनात करना पड़ा
क्या है तुएगोंदी और पाटेश्वर धाम का विवाद?
सर्व आदिवासी समाज का आरोप है कि डौंडीलोहारा विकासखंड के ग्राम तुएगोंदी और जामड़ी क्षेत्र में रिजर्व फॉरेस्ट भूमि पर अवैध कब्जा, निर्माण और खनन किया जा रहा है. समाज का कहना है कि आदिवासी समुदाय के पवित्र देवस्थल और पाट (पहाड़) पर भी कब्जा कर लिया गया है. जहां समाज के देवी-देवताओं की मान्यता जुड़ी हुई है.
ग्रामीणों का आरोप है कि गांव की जमीन पर बने पाटेश्वर धाम में विकास कार्य कराए जा रहे हैं और धीरे-धीरे आदिवासी आस्था स्थलों का अस्तित्व खत्म किया जा रहा है.
बाबा बालक दास की गिरफ्तारी की मांग
सर्व आदिवासी समाज के जिला अध्यक्ष तुकाराम कोर्राम ने आरोप लगाया कि बाबा बालक दास द्वारा रिजर्व फॉरेस्ट क्षेत्र में करीब 1 करोड़ 25 लाख रुपये की लागत से अवैध निर्माण कराया गया है. उनका दावा है कि इस संबंध में वर्ष 2019 से लगातार शिकायतें की जा रही हैं. लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई.
समाज का कहना है कि बाबा बालक दास के खिलाफ एट्रोसिटी एक्ट के तहत मामला दर्ज होने के बावजूद गिरफ्तारी नहीं की गई है. प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी कि गिरफ्तारी और कार्रवाई होने तक आंदोलन जारी रहेगा.
12 एकड़ जमीन को कब्जा मुक्त कराने की मांग
आदिवासी समाज की प्रमुख मांगों में कथित रूप से कब्जे में ली गई करीब 12 एकड़ जमीन को मुक्त कराना, आदिवासी देवस्थलों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और पाटेश्वर धाम से जुड़े विवादित निर्माणों की जांच कर कार्रवाई करना शामिल है.
“जल, जंगल, जमीन हमारी पहचान”
प्रदर्शन के दौरान वक्ताओं ने कहा कि आदिवासियों के लिए जल, जंगल और जमीन केवल संसाधन नहीं बल्कि उनकी संस्कृति, पहचान और अस्तित्व का आधार हैं. समाज के युवाओं से बड़ी संख्या में आंदोलन में शामिल होने और अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए संघर्ष तेज करने का आह्वान किया गया.
सवालों के घेरे में प्रशासन
आदिवासी समाज का आरोप है कि वर्षों से शिकायतों के बावजूद कार्रवाई नहीं होना कई सवाल खड़े करता है. प्रदर्शनकारियों ने पूछा कि आखिर इतने गंभीर आरोपों के बावजूद जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही और क्या उन्हें किसी प्रकार का संरक्षण प्राप्त है?
अब प्रशासन के फैसले पर टिकी निगाहें
बालोद में हुए इस उग्र प्रदर्शन ने तुएगोंदी और पाटेश्वर धाम विवाद को फिर से सुर्खियों में ला दिया है. देर रात तक तनावपूर्ण स्थिति बनी रही. अब सभी की निगाहें जिला प्रशासन और शासन के अगले कदम पर टिकी हैं कि आदिवासी समाज की मांगों पर क्या निर्णय लिया जाता है और विवाद के समाधान के लिए क्या कार्रवाई होती है.
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