आज सड़कों पर उतरेंगी ममताओं की मसीहाएं, आंगनबाड़ी बहनों का ‘संघर्ष संग्राम’, कॉर्पोरेट परस्त सत्ता को खुली चुनौती

Today, Mamta's messiahs will come out on the streets, Anganwadi sisters' 'struggle', an open challenge to the corporate-friendly government

आज सड़कों पर उतरेंगी ममताओं की मसीहाएं, आंगनबाड़ी बहनों का ‘संघर्ष संग्राम’, कॉर्पोरेट परस्त सत्ता को खुली चुनौती

रायपुर : देश के इतिहास में एक और ‘जन क्रांति दिवस’ दर्ज होने जा रहा है. लेकिन इस बार मजदूरों और कर्मचारियों के साथ-साथ सड़कों पर उतरने जा रही हैं. वो महिलाएं जिनके कंधों पर देश की लाखों मासूमों की सेहत और भविष्य का भार होता है. आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएं...
आज 9 जुलाई को देश भर में आयोजित राष्ट्रीय मजदूर हड़ताल को समर्थन देते हुए छत्तीसगढ़ की आंगनबाड़ी कार्यकर्ता-सहायिका संयुक्त मंच ने खुलकर मोर्चा संभाल लिया है. सरकार की मजदूर विरोधी, महिला विरोधी और कॉर्पोरेटपरस्त नीतियों के खिलाफ इस बार मातृत्व का स्वर भी क्रांति में बदल गया है.
“ना वेतन, ना सम्मान – अब और नहीं सहेंगे अपमान!”
संयुक्त मंच की संयोजक समिति —सरिता पाठक, रुक्मणी सज्जन, सुधा रात्रे, हेमा भारती और कल्पना चंद — ने प्रेस बयान में साफ किया है.
“हम 50 साल से देश के बच्चों, गर्भवती माताओं और पोषण अभियान में अपनी जान खपा रही हैं. लेकिन आज भी हमें ना तो मजदूर का दर्जा मिला, ना कर्मचारी का, और ना ही इंसाफ का अधिकार,”
आंगनवाड़ी कार्यकर्ता को आज भी ₹4500 और सहायिका को ₹2250 मासिक मानदेय दिया जाता है. यह वह राशि है जो न तो एक मजदूर की जरुरतें पूरी करती है और न एक इंसान की गरिमा का सम्मान करती है.
“महंगाई भत्ता नहीं, पेंशन नहीं, बीमा नहीं, चिकित्सा नहीं – हम क्या भूतकाल से आई परछाइयाँ हैं?” — हेमा भारती, संयोजक
कॉर्पोरेटपरस्त सत्ता को महिला शक्ति की खुली ललकार!
संयुक्त मंच ने केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि आंगनबाड़ी महिलाओं से तीन गुना काम लिया जा रहा है, लेकिन उन्हें स्वयंसेवक कहकर जिम्मेदारियों की गिनती से बाहर रखा जा रहा है.
नई तकनीक, मोबाइल ऐप, पोषण ट्रैकिंग, गृह भ्रमण, दस्तावेजीकरण – ये सभी कार्य उस महिला पर थोपे गए हैं, जिसे न तो प्रशिक्षण दिया गया, न संसाधन और न सम्मान.
“हम पर एक के बाद एक नोटिस, बर्खास्तगी, और अपमानजनक भाषा की बौछार हो रही है. यह दमन है, अत्याचार है – और अब यह बर्दाश्त नहीं होगा.”
‘अब चुप नहीं रहेंगी आंगनबाड़ी की दीदियां’!
9 जुलाई को देश की 10 बड़ी ट्रेड यूनियनों द्वारा बुलाई गई हड़ताल को आंगनबाड़ी संयुक्त मंच ने निर्णायक समर्थन दिया है. इसमें मजदूरों, कर्मचारियों, और स्कीम वर्कर्स के हक की लड़ाई को एकजुट रुप से उठाया जाएगा.
• हड़ताल की प्रमुख मांगें इस प्रकार हैं:- 
• आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिका को सरकारी कर्मचारी का दर्जा,
• न्यूनतम ₹26,000 मासिक वेतन,
• ₹9,000 प्रतिमाह पेंशन,
• पीएफ, ग्रेच्युटी, बीमा, चिकित्सा प्रतिपूर्ति की गारंटी,
• रिटायरमेंट के बाद एकमुश्त ₹5 लाख की राहत राशि,
कार्यस्थलों पर दमन और उत्पीड़न पर पूर्ण विराम!
“बच्चों की सेवा की कीमत क्या बस ₹4500?”
संयुक्त मंच ने सवाल उठाया है कि जब सरकारें अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पोषण अभियान की वाहवाही लूटती हैं, तो उस अभियान की असली योद्धाओं की स्थिति इतनी दयनीय क्यों है?
“हमने हजारों बच्चों को गोद में खिलाया है, उनकी मांओं को सुरक्षित प्रसव के लिए प्रशिक्षित किया है, लेकिन बदले में हमें मिला क्या?” — कल्पना चंद, संयोजिका
हड़ताल नहीं, यह ‘अधिकारों का आंदोलन’ है!
संयुक्त मंच ने राज्य के सभी जिलों में 9 जुलाई को ज्ञापन सौंपने और प्रदर्शन की घोषणा की है। इस दिन आंगनबाड़ी बहनें सरकारी कार्यालयों के सामने शांतिपूर्ण प्रदर्शन करेंगी, अपनी मांगों का चार्टर प्रस्तुत करेंगी, और सरकार को चेतावनी देंगी — “या तो हक दीजिए, या कुर्सी छोड़िए!”
जनसमर्थन की अपील: “यह लड़ाई सिर्फ हमारी नहीं, पूरे समाज की है”
मंच ने आम जनता, खासकर मजदूर, महिलाएं, किसान और मध्यम वर्ग से इस बंद को समर्थन देने की अपील की है.
“हमारे संघर्ष की जीत ही आपके बच्चों का पोषण सुरक्षित करेगी। हमारी आवाज दबेगी तो कल आपके अधिकार भी कुचले जाएंगे.”
 “जब एक मां लड़ने पर उतर आए, तो समझो व्यवस्था डगमगाने वाली है!”
9 जुलाई का दिन केवल हड़ताल का दिन नहीं, यह उस सहमति और सहनशीलता की चुप्पी का अंत है, जो दशकों से आंगनबाड़ी बहनों ने ओढ़ रखी थी.
अब जब ममता की मसीहाएं सड़कों पर उतरेंगी,तब पोषण की प्रहरी महिलाएं हाथ में मांगपत्र और दिल में ज्वाला लिए खड़ी हैं — तो सत्ता को ये समझना होगा कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ता सिर्फ कार्यकर्ता नहीं, वह एक विचार है, जो अब जाग चुका है।
“हम चुप थीं, क्योंकि काम कर रही थीं…
अब बोलेंगी, क्योंकि कोई और रास्ता नहीं बचा!”
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