स्कूल के तानों ने छीन लिया घर का चिराग, बुलिंग ने डॉक्टर दंपति को कर दिया बर्बाद, आयुष्मान की चुप्पी समाज से पूछ रही सवाल
School taunts snatched the light of their home, bullying devastated a doctor couple, Ayushmann's silence questions society.
बिलासपुर : दिवाली की रोशनी में नहाए शहर के बीच एक ऐसा अंधेरा उतर आया जिसने हर दिल को झकझोर दिया. रविवार की रात 9-10 बजे शहर के बृहस्पति बाजार स्थित चंद्र पार्क अपार्टमेंट में वह दर्दनाक घटना घटी. जिसने पूरे बिलासपुर को सन्न कर दिया. राज्य के प्रतिष्ठित चिकित्सक दंपति मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. आशुतोष तिवारी और सिम्स की वरिष्ठ ईएनटी विशेषज्ञ डॉ. आरती पांडे का इकलौता बेटा 19 साल का आयुष्मान तिवारी ने अपने ही घर में फांसी लगाकर खुदकुशी कर ली. घटना के समय डॉक्टर दंपति नीचे अपार्टमेंट में आयोजित दिवाली मिलन कार्यक्रम में शामिल थे.
उस रात घर की कामवाली ने बताया कि आयुष्मान ने रोज की तरह खाना खाया और अपने कमरे में जाते-जाते मुस्कुराकर कहा कि मां का ध्यान रखना, मैं जा रहा हूं.” किसी ने नहीं सोचा था कि यह “जाना” हमेशा के लिए होगा. करीब एक घंटे बाद जब डॉक्टर दंपति लौटे और दरवाजा खटखटाया. तो कोई जवाब नहीं मिला. आपात दरवाजे से भीतर प्रवेश करने पर जो नजारा सामने आया. वह हर मां-बाप के दिल को तोड़ देने वाला था. आयुष्मान फंदे से झूल रहा था. शरीर नीचे फर्श पर था. पैर मुड़े हुए, चेहरा ऊपर की तरफ…मां की चीख भी नहीं निकली. पिता ठिठक गए. वह नजारा सिर्फ एक परिवार नहीं बल्कि पूरे समाज की हार थी.
आयुष्मान पढ़ाई में तेज, फुटबॉल का खिलाड़ी और कविताओं का शौकीन था. वह बचपन से ही दूसरों के लिए सोचने वाला, मदद करने वाला बच्चा था. कक्षा 7 से 10 तक वह शहर के प्रतिष्ठित जैन इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ा.
लेकिन इसी स्कूल में उसके साथियों ने उसके शरीर और रुप को लेकर मजाक उड़ाना शुरु कर दिया. कहते थे, “तू कुरुप है… तू अजीब दिखता है…”धीरे-धीरे वही “मजाक” उसके आत्मसम्मान को तोड़ने लगा. वह अपनी ही परछाई से नफरत करने लगा. मां से कहता- “मुझे अपने शरीर से नफरत है. मैं गंदा हूँ. उसका शरीर बदल दिया.
डॉ. आशुतोष तिवारी खुद मनोचिकित्सक हैं. उन्होंने बेटे के मनोभावों को समझने की कोशिश की. इलाज कराया. संवाद बनाए रखा. मां डॉ. आरती पांडे ने स्कूल प्रबंधन से भी बात की. लेकिन जो जहर आयुष्मान के मन में घुल चुका था. वह धीरे-धीरे उसकी सोच को निगलता चला गया.
मां ने बताया कि हम सोचते थे कि सब ठीक हो जाएगा… लेकिन उसने खुद पर यकीन करना छोड़ दिया था.
स्कूल में बुलिंग का असर इतना गहरा हुआ कि उन्होंने आयुष्मान को जैन इंटरनेशनल स्कूल से निकाल लिया और घर पर पढ़ाई शुरु कराई. बाद में उसे इंजीनियरिंग पढ़ाई के लिए दुर्ग भेजा गया. ताकि माहौल बदले. पर मन का अंधेरा वहीं रहा.
करीब डेढ़ महीने पहले आयुष्मान ने अपना बैंक अकाउंट खाली कर सारा पैसा मां के खाते में ट्रांसफर कर दिया. कहा-अब मुझे पैसों की जरुरत नहीं पड़ेगी. जब लगेगा तो मंगा लूंगा. मां ने समझा बेटा जिम जा रहा है. इसलिए खर्च नियंत्रित कर रहा है. लेकिन यह उसकी “अंतिम तैयारी” थी. कुछ दिन पहले उसने अपना मोबाइल फॉर्मेट कर दिया. सारे नंबर, चैट और फोटो मिटा दिए. बोला- “अब मुझसे जुड़ी कोई चीज़ मोबाइल में नहीं रखना चाहता.” वह अपने अतीत और दोस्तों से जुड़ी हर याद को मिटा रहा था. जैसे खुद को मिटा रहा हो.
डॉ. आशुतोष तिवारी अब टूट चुके हैं. वे कहते हैं कि मैं दूसरों के बच्चों का मन पढ़ लेता था. लेकिन अपने बेटे की चुप्पी नहीं पढ़ पाया. डॉ. आरती पांडे ने कहा कि बच्चे को बचाने की हर कोशिश की. लेकिन बुलिंग ने उसका आत्मविश्वास छीन लिया. बच्चे को बार-बार कहा गया कि वह कुरुप है… और एक दिन उसने उस बात पर यकीन कर लिया.
उनकी आंखों से आंसू बहते हैं. लेकिन शब्द समाज के लिए संदेश बन जाते हैं. बुलिंग मजाक नहीं. यह हत्या है. बिना खून के, मगर उतनी ही दर्दनाक...
आयुष्मान की मौत सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, समाज की चेतावनी है. हर स्कूल, हर कॉलेज, हर शिक्षक को यह समझना होगा कि बच्चे सिर्फ अंक नहीं, भावनाएं लेकर आते हैं. जरुरत है कि हर शिक्षण संस्थान में एंटी-बुलिंग कमेटी, काउंसलिंग सेल और भावनात्मक सत्र अनिवार्य किए जाएं. माता-पिता को भी यह सीखना होगा कि बच्चों की चुप्पी को हल्के में न लें. क्योंकि कभी-कभी वही चुप्पी ज़िंदगी की आखिरी आवाज़ होती है.
आयुष्मान अब नहीं है लेकिन उसकी कहानी हर माता-पिता के दिल तक पहुंचनी चाहिए. ताकि कोई और बेटा, कोई और बेटी ऐसी बुलिंग का शिकार न बने. डॉ. आरती पांडे की आंखों से गिरे हर आंसू में एक संदेश है —“मेरा बेटा बहुत सुंदर था. बस समाज ने उसे यह यकीन दिला दिया कि वह सुंदर नहीं है.
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