125 साल पुराने डेम पर सीमेंट प्लांट का साया, 1700 एकड़ जमीन पर बिड़ला की तैयारी, ग्रामीणों ने खोला मोर्चा, मुख्यमंत्री और जल संसाधन मंत्री से गुहार
125-year-old dam faces threat from proposed cement plant; Birla group eyes 1,700 acres of land; villagers launch protest and appeal to the Chief Minister and the Minister of Water Resources.
रायपुर : छत्तीसगढ़ में अडानी समूह के बाद अब बिड़ला समूह की कंपनी अल्ट्राटेक सीमेंट को लेकर विवाद खड़ा हो गया है. रायपुर जिले के करीब 125 साल पुराने पेंड्रावन डेम के कैचमेंट एरिया में कंपनी ने 689 हेक्टेयर यानी करीब 1700 एकड़ जमीन खरीदी है. इस जमीन पर सीमेंट प्लांट लगाने और लाइमस्टोन की माइनिंग की तैयारी है. जल संसाधन विभाग से कंपनी को एनओसी भी मिल गई है. लेकिन इस अनुमति ने आसपास के दर्जनों गांवों के किसानों और ग्रामीणों की चिंता बढ़ा दी है.
ग्रामीणों का आरोप है कि सीमेंट प्लांट और खनन की अनुमति से पेंड्रावन डेम का अस्तित्व और हजारों एकड़ कृषि भूमि की सिंचाई प्रभावित हो सकती है. उनका कहना है कि यह डेम आसपास के किसानों की खेती के लिए जीवनरेखा है. अगर कैचमेंट एरिया में खनन शुरू हुआ. तो डेम में पानी की आवक और जलभराव पर असर पड़ सकता है. इससे सिंचाई व्यवस्था प्रभावित होगी और किसानों की आजीविका संकट में आ जाएगी. पेंड्रावन बचाओ समिति ने इस अनुमति के खिलाफ मोर्चा खोलने की तैयारी शुरू कर दी है. गांव-गांव में बैठकें हो रही हैं. ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि इसके खिलाफ पहले से बड़ा आंदोलन किया जाएगा.
डेम के कैचमेंट में 1700 एकड़ जमीन
रायपुर जिले का पेंड्रावन डेम करीब सवा सौ साल पुराना है. इसके कैचमेंट एरिया में अल्ट्राटेक सीमेंट ने किसानों से 689 हेक्टेयर यानी करीब 1700 एकड़ जमीन खरीदी है. इसी जमीन पर सीमेंट प्लांट और लाइमस्टोन खनन प्रस्तावित है. ग्रामीणों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि खनन के लिए बड़े पैमाने पर जमीन की खुदाई से डेम के जलग्रहण क्षेत्र पर असर पड़ेगा. इस डेम से हजारों एकड़ कृषि भूमि की सिंचाई होती है. ऐसे में जलभराव प्रभावित होने की स्थिति में खेती पर सीधा असर पड़ने की आशंका है.
स्थानीय निवासी घनश्याम वर्मा का कहना है कि जब भी प्रदेश में बीजेपी की सरकार आती है. इस इलाके के लोगों को सीमेंट प्लांट शुरू होने का डर सताने लगता है. अब एक बार फिर जल संसाधन विभाग से एनओसी जारी होने के बाद ग्रामीणों की चिंता बढ़ गई है. उनके मुताबिक लोग अब आंदोलन की तैयारी में जुट गए हैं.
16 साल से अटका है प्लांट का मामला
पेंड्रावन में सीमेंट प्लांट लगाने का मामला करीब 16 साल पुराना है. वर्ष 2008 में पहली बार इस क्षेत्र में प्लांट लगाने की चर्चा शुरू हुई थी. वर्ष 2015 में तत्कालीन रमन सरकार ने कंपनी को एनओसी जारी की थी. इसका ग्रामीणों ने विरोध किया, जिसके बाद अनुमति निरस्त कर दी गई.
इसके बाद 3 जनवरी 2017 को तत्कालीन बीजेपी सरकार के जल संसाधन विभाग ने एक बार फिर कंपनी को एनओसी जारी कर दी. इस बार भी किसानों ने बड़ा आंदोलन किया. स्थानीय विधायक ने भी इसका विरोध किया. विरोध के बाद 20 मार्च 2017 को तत्कालीन जल संसाधन मंत्री ने एनओसी निरस्त कर दी.
कंपनी ने सरकार के इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दे दी। मामले में 25 अप्रैल 2024 को हाईकोर्ट ने सरकार के आदेश को निरस्त करते हुए जल संसाधन विभाग को कंपनी का पक्ष सुनने और नए सिरे से निर्णय लेने का निर्देश दिया. अदालत के इस आदेश के बाद विभाग में दोबारा प्रक्रिया शुरू हुई. कंपनी का पक्ष सुनने के बाद जल संसाधन विभाग ने फिर एनओसी जारी कर दी. इसी फैसले ने करीब 11 साल बाद एक बार फिर पेंड्रावन में सीमेंट प्लांट के विरोध की जमीन तैयार कर दी है.
मुख्यमंत्री और जल संसाधन मंत्री से गुहार
एनओसी जारी होने के बाद पेंड्रावन बचाओ समिति ने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और जल संसाधन मंत्री केदार कश्यप से हस्तक्षेप की मांग की है. समिति का कहना है कि सरकार को किसानों के हित और डेम के भविष्य को प्राथमिकता देनी चाहिए. समिति ने मांग की है कि कंपनी को जारी एनओसी रद्द की जाए। साथ ही, इस जमीन पर दी गई लीज भी निरस्त की जाए. ताकि प्रस्तावित प्लांट और खनन की प्रक्रिया आगे न बढ़ सके.
ग्रामीणों का कहना है कि पेंड्रावन डेम केवल जल संग्रहण का ढांचा नहीं. बल्कि आसपास के हजारों किसानों की खेती का आधार है. अगर इसके कैचमेंट एरिया में औद्योगिक गतिविधियों को अनुमति दी गई. तो इसका असर आने वाली पीढ़ियों तक पड़ सकता है.
फिलहाल दर्जनों गांवों में बैठकों का दौर शुरू हो चुका है. ग्रामीणों ने साफ कर दिया है कि अहर सरकार ने उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया. तो वे फिर सड़कों पर उतरेंगे. ऐसे में पेंड्रावन का पुराना विवाद एक बार फिर बड़े जनआंदोलन में बदलने की ओर बढ़ रहा है.
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18 नवंबर को ताराशिव में होगी पर्यावरणीय जनसुनवाई, 2970 मेगावाट से बढ़ाकर 4570 मेगावाट करने का प्रस्ताव; ग्रामीणों के साथ बैठक कर विरोध की रणनीति बनाने में जुटे स्थानीय जनप्रतिनिधि
तिल्दा-नेवरा : रायपुर जिले के तिल्दा-नेवरा और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में औद्योगिक गतिविधियों के विस्तार को लेकर एक बार फिर हलचल तेज हो गई है. क्षेत्र में लगातार स्थापित हो रहे उद्योगों और प्लांटों के बीच अब अडानी पावर लिमिटेड के रायपुर थर्मल पावर प्लांट के प्रस्तावित विस्तार को लेकर ग्रामीणों में चिंता बढ़ने लगी है. प्रस्तावित विस्तार के तहत वर्तमान 2970 मेगावाट क्षमता वाले पावर प्लांट को बढ़ाकर 4570 मेगावाट करने की योजना है. इसके लिए 1600 मेगावाट की अतिरिक्त उत्पादन क्षमता वाली दो इकाइयां स्थापित करने का प्रस्ताव रखा गया है.
प्राप्त शासकीय पत्र के मुताबिक पर्यावरणीय स्वीकृति के लिए लोक सुनवाई 18 नवंबर 2026 को सुबह 11 बजे ग्राम ताराशिव में आयोजित की जाएगी. यह जनसुनवाई ताराशिव स्थित खसरा नंबर 312/1, कुल रकबा 0.312 हेक्टेयर में प्रस्तावित है. इस मामले में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के क्षेत्रीय कार्यालय रायपुर की ओर से संबंधित अधिकारियों, ग्राम पंचायतों एवं जनप्रतिनिधियों को पत्र जारी कर जनसुनवाई की जानकारी दी गई है. साथ ही पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) रिपोर्ट, कार्यपालक सारांश हिंदी एवं अंग्रेजी तथा सीडी की प्रतियां आम नागरिकों के अवलोकन के लिए उपलब्ध कराने और संबंधित क्षेत्र में व्यापक प्रचार-प्रसार करने के निर्देश दिए गए हैं.
विकास के दावों के बीच स्थानीय युवाओं के रोजगार का सवाल
क्षेत्र में औद्योगिक गतिविधियों के बढ़ने के बावजूद स्थानीय युवाओं को उनकी योग्यता के अनुरूप रोजगार नहीं मिलने की शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं. ग्रामीणों का सवाल है कि जब क्षेत्र की जमीन, पानी और पर्यावरण पर उद्योगों का प्रभाव पड़ रहा है. तो स्थानीय युवाओं को रोजगार के पर्याप्त अवसर क्यों नहीं मिल रहे हैं? उद्योगों के विस्तार के साथ स्थानीय लोगों को रोजगार में प्राथमिकता देने की मांग भी उठने लगी है.
भारी वाहनों से यातायात प्रभावित, दुर्घटनाओं का बढ़ता खतरा
औद्योगिक गतिविधियों के चलते क्षेत्र की सड़कों पर भारी वाहनों की आवाजाही भी लगातार बढ़ रही है. ग्रामीणों के मुताबिक भारी वाहनों के दबाव से यातायात व्यवस्था प्रभावित हो रही है और आए दिन सड़क हादसों का खतरा बना रहता है. स्थानीय लोगों का कहना है कि औद्योगिक विकास के साथ सड़क सुरक्षा, यातायात प्रबंधन और आम नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी जरुरी है.
किसानों की उपजाऊ जमीन और पेयजल को लेकर चिंता
ग्रामीणों के बीच खेती-किसानी और जलस्रोतों को लेकर भी गंभीर चिंताएं हैं. किसानों का कहना है कि औद्योगिक गतिविधियों के विस्तार से कृषि भूमि, फसलों और सिंचाई व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है. वहीं क्षेत्र में पेयजल की उपलब्धता और उसकी गुणवत्ता को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं. ग्रामीणों की मांग है कि किसी भी नए विस्तार से पहले जल, वायु और मिट्टी पर पड़ने वाले प्रभावों का निष्पक्ष आकलन किया जाए.
ग्रामीणों के साथ बैठक कर विरोध की रणनीति बनाने में जुटे स्थानीय जनप्रतिनिधि
प्रस्तावित विस्तार को लेकर क्षेत्र के प्रभावित गांवों में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है. जानकारी के मुताबिक स्थानीय जनप्रतिनिधि, क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के पदाधिकारी और ग्रामीणों के बीच बैठकों का सिलसिला जारी है. इन बैठकों में जनसुनवाई के दौरान अपनी आपत्तियां दर्ज कराने, ग्रामीणों की समस्याओं को प्रशासन के सामने रखने और सामूहिक रूप से विरोध की रणनीति तैयार करने पर चर्चा की जा रही है.
ग्रामीणों के बीच इस बात को लेकर भी नाराजगी है कि औद्योगिक विकास का लाभ स्थानीय लोगों तक अपेक्षित रूप से नहीं पहुंच रहा है. जबकि इसके संभावित दुष्प्रभावों का सामना उन्हें करना पड़ रहा है. ऐसे में ग्रामीण जनसुनवाई को अपनी समस्याएं और आपत्तियां दर्ज कराने का अहम मौका मान रहे हैं.
अब जनसुनवाई में उठेंगे ग्रामीणों के सवाल
18 नवंबर को होने वाली जनसुनवाई में ग्रामीणों की प्रमुख मांगें स्थानीय युवाओं को रोजगार में प्राथमिकता, भारी वाहनों के लिए सुरक्षित यातायात व्यवस्था, प्रदूषण पर प्रभावी नियंत्रण, किसानों की उपजाऊ भूमि की सुरक्षा, स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता तथा पर्यावरणीय प्रभावों की निष्पक्ष जांच रहने की संभावना है.
अब देखना होगा कि पर्यावरणीय जनसुनवाई में ग्रामीणों की आपत्तियों और मांगों को किस तरह दर्ज किया जाता है और संबंधित विभाग और कंपनी प्रबंधन इन सवालों पर क्या जवाब देते हैं. फिलहाल अडानी पावर के प्रस्तावित विस्तार को लेकर तिल्दा-नेवरा क्षेत्र में चर्चाएं तेज हैं और 18 नवंबर की जनसुनवाई पर ग्रामीणों, किसानों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की निगाहें टिकी हुई हैं.
खोज खबर छत्तीसगढ़ न्यूज की विशेष टिप्पणी: औद्योगिक विकास जरुरी है. लेकिन विकास की कीमत किसानों की खेती, ग्रामीणों के स्वास्थ्य, स्वच्छ पेयजल और स्थानीय युवाओं के भविष्य से नहीं चुकाई जानी चाहिए. विकास ऐसा हो जिसमें उद्योगों के साथ-साथ स्थानीय जनता का हित भी सुरक्षित रहे.
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