छत्तीसगढ़ की सबसे बड़ी मंडी में आर्थिक उथल-पुथल, प्रशासनिक आदेश से उपज की कम आवक, मजदूर और व्यापारियों में गुस्सा, रोजी-रोटी पर संकट
Chhattisgarh's largest market faces economic turmoil, with administrative orders reducing the arrival of produce, angering workers and traders, and threatening livelihoods.
भाटापारा : धान खरीदी में ऋण पुस्तिका और आधार कार्ड की अनिवार्यता लागू होने के बाद भाटापारा की धान मंडी की रौनक अचानक थम गई है. मंडी में रोजाना काम कर रोजगार कमाने वाले सैकड़ों मजदूर अब काम के अभाव में भटकने को मजबूर हैं. हालात यह हैं कि कई परिवारों के घरों में चूल्हे ठंडे पड़ने की नौबत आ गई है. और बच्चे दो वक्त की रोटी के लिए तरस रहे हैं.
धान खरीदी बाधित होने का असर केवल मजदूरों तक सीमित नहीं रहा. बल्कि क्षेत्र की पोहा मिलों पर भी गहरा पड़ा है. कच्चा धान नहीं मिलने से कई मिलें बंद हो गईं. जिससे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रुप से करीब 3000 परिवार आर्थिक संकट में फंस गए हैं.
मजदूरों का कहना है कि वे सालों से मंडी और मिलों पर आश्रित रहे हैं. लेकिन दस्तावेज़ी पाबंदियों के कारण न धान की आवक हो रही है और न ही मजदूरी के अवसर बच पाए हैं. इधर, दस्तावेज़ों के सत्यापन और खातों से जुड़े कार्यों के लिए शहर के बैंकों में भारी भीड़ उमड़ रही है. लोग घंटों कतार में खड़े रहने के बावजूद समय पर काम न होने से परेशान और नाराज दिखाई दे रहे हैं. अव्यवस्था के कारण आमजन की मुश्किलें और बढ़ गई हैं.
इस मंडी में करीब 800 पंजीकृत मजदूर काम करते हैं. साथ ही मुंशी संघ, व्यापारी एसोसिएशन और अभिकर्ता संघ भी अपनी रोज़ी-रोटी के लिए मंडी पर निर्भर हैं. पहले मंडी में एक दिन में हजारों क्विंटल उपज की आवक होती थी. लेकिन अब अचानक कम आवक से आर्थिक असंतुलन पैदा हो गया है.
इस परिस्थिति से मंडी से जुड़े सभी वर्ग मजदूर, व्यापारी और मुंशी भी परेशान हैं. मजदूरों और व्यापारियों में गुस्सा पनपने लगा है और वे अपने हक की लड़ाई को लेकर असहज महसूस कर रहे हैं. इसी के चलते पंजीकृत मजदूर संघ ने एसडीएम भाटापारा को ज्ञापन सौंपा. जिसमें समस्या का त्वरित निराकरण करने का निवेदन किया गया. उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर उनकी समस्याओं का समाधान नहीं हुआ तो वे सड़क पर उतरकर आंदोलन करने को मजबूर होंगे.
स्थानीय मजदूर संगठनों और नागरिकों ने प्रशासन से मांग किया कि जब तक सभी किसानों और मजदूरों के दस्तावेज पूर्ण नहीं हो जाते, तब तक अंतरिम और मानवीय दृष्टि से कोई वैकल्पिक व्यवस्था सुनिश्चित की जाए. ताकि जरुरतमंद परिवारों की आजीविका प्रभावित न हो. अब सवाल यह है कि- क्या एक प्रशासनिक निर्णय की कीमत हजारों परिवार भूख और बेरोज़गारी से चुकाएँगे और क्या इस उभरते मानवीय संकट की जिम्मेदारी शासन-प्रशासन लेगा?
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