भालुओं का हमला, लकड़ी लेने गए ग्रामीण पर दो भालुओं ने किया हमला, हालत नाजुक, इलाज जारी, ग्रामीणों में दहशत का माहौल
Bear attack, two bears attacked a villager who had gone to collect wood, condition critical, treatment continues, panic prevails among villagers
गरियाबंद /बिंद्रानवागढ़ : बिन्द्रानवागढ़ वन परिक्षेत्र के कामेंपुर जंगल में जलाऊ लकड़ी लाने गए एक ग्रामीण पर दो भालुओं ने अचानक हमला कर दिया. इस हमले में गुमान सिंह नागेश उम्र करीव 40 साल गंभीर रुप से घायल हो गए.
मिली जानकारी के मुताबिक गुमान सिंह रोज की तरह जंगल से लकड़ी लेने गए थे. तभी दो जंगली भालुओं ने उन पर हमला कर दिया. भालुओं से जान बचाने के लिए उन्होंने साहस दिखाते हुए अपने पैर से एक भालू को धक्का देकर खुद को किसी तरह बचाया.
हमले में गंभीर रूप से घायल गुमान सिंह किसी तरह घर पहुंचे. जहां से परिजनों ने उन्हें तत्काल जिला अस्पताल पहुंचाया. फिलहाल अस्पताल में उनका इलाज जारी है. डॉक्टरों के मुताबिक गुमान सिंह की हालत नाजुक बनी हुई है. लेकिन वह खतरे से बाहर हैं. शरीर पर तीन से ज्यादा गहरे घाव, अंदरूनी चोटें और अत्यधिक रक्तस्राव की स्थिति बनी हुई थी. उन्हें फिलहाल अस्पताल में निगरानी में रखा गया है.
वन विभाग की ओर से प्राथमिक सहायता के रूप में परिजनों को तात्कालिक 1000 रुपये की राशि प्रदान की गई है. घटना के बाद से ग्रामीणों में दहशत का माहौल है. वहीं स्थानीय लोगों ने वन विभाग से सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम की मांग की है.
घटना के बाद वन विभाग ने तत्काल चिकित्सा सहायता के तौर पर मात्र 1000 रुपये की तात्कालिक राहत राशि परिजनों को सौंपी है. इस मामूली सहायता राशि को लेकर परिजन और गांववाले बेहद नाराज़ हैं. उनका कहना है कि जानलेवा हमले के बाद इतनी मामूली सहायता नाकाफी है और सरकार को इस तरह की घटनाओं के लिए एक ठोस मुआवजा नीति बनानी चाहिए.
जंगलों से सटे गांवों में वन्यजीवों का खतरा लगातार बढ़ रहा है. लेकिन क्या जंगल में जाने वालों की सुरक्षा के लिए कोई पुख्ता इंतजाम हैं? या फिर हर बार जान जोखिम में डालकर जलाऊ लकड़ी लानी ही गांववालों की मजबूरी बनती जा रही है?
इस हमले के बाद कामेंपुर और आसपास के गांवों में दहशत का माहौल है. ग्रामीणों का कहना है कि पिछले कुछ महीनों से भालुओं और हाथियों की गतिविधियाँ बढ़ गई हैं. लेकिन वन विभाग की तरफ से कोई ठोस कार्यवाही नहीं की जा रही है. कई बार भालू गांव के आसपास तक आ चुके हैं. लेकिन ना कोई जागरुकता अभियान चलाया गया और ना ही वन विभाग ने गश्त तेज की.
गुमान सिंह नागेश की यह घटना एक बड़ी चेतावनी है। यह दर्शाता है कि कैसे विकास और वनों के अंधाधुंध दोहन के कारण वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास संकुचित हो गया है. जिससे वे भोजन और सुरक्षा की तलाश में इंसानी इलाकों की ओर बढ़ रहे हैं. परिणामस्वरूप, ग्रामीण जनता, जो अब भी जंगल पर आश्रित है, सीधे इस संघर्ष की चपेट में आ रही है.
सरकार, वन विभाग और जिला प्रशासन को चाहिए कि वे इस घटना को सिर्फ एक ‘आंकड़ा’ न समझें, बल्कि इसे एक गंभीर चेतावनी के रूप में लें और स्थायी समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाएं.
माँगें और अपेक्षाएँ
घायल व्यक्ति को कम से कम 50,000 रुपये की तत्काल सहायता प्रदान की जाए।
भालुओं की गतिविधियों वाले क्षेत्रों में सिग्नलिंग सिस्टम, चेतावनी बोर्ड और वन गश्त बढ़ाई जाए।
ग्रामीणों को वन्यजीव हमलों से बचाव के लिए प्रशिक्षण और उपकरण उपलब्ध कराए जाएं।
स्थायी मुआवजा नीति बनाई जाए ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं में पीड़ितों को न्याय मिल सके।
गरियाबंद की यह घटना एक जंगल की कहानी नहीं, बल्कि एक संघर्षशील ग्रामीण की जीवटता, सरकारी उदासीनता और जंगलों की बदलती तस्वीर की सच्ची दास्तान है
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