मंत्रालय के आदेश को ठेंगा!, गरियाबंद में धान खरीदी से पहले देवभोग-अमलीपदर में फिर बदली कुर्सियां; आखिर किसे साधने की कवायद?
Flouting the ministry's directive! In Gariaband, officials in Devbhog and Amlipadar have been reshuffled yet again just ahead of the paddy procurement season—who exactly is this move intended to appease?
गरियाबंद/देवभोग : छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर स्थित मंत्रालय से जारी सरकारी आदेशों की जिलों में कितनी गंभीरता से पालना होती है, इसका एक बड़ा उदाहरण गरियाबंद जिले में सामने आता दिखाई दे रहा है. यहां सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) के निर्देश और जिला प्रशासन की तबादला सूची के बीच ऐसा विरोधाभास सामने आया है. जिसने प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
मामला सिर्फ कुछ अधिकारियों की कुर्सियां बदलने तक सीमित नहीं है. मामला उस समय जारी हुए तबादला आदेश का है. जब राज्य शासन की तरफ से जनगणना 2027 के महत्वपूर्ण कार्य को देखते हुए संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों के स्थानांतरण पर छह महीने तक रोक लगाने के निर्देश जारी किए जाने की बात सामने आई है.
हैरानी की बात यह है कि जिस 2 नवंबर 2026 को मंत्रालय से दिशा-निर्देश जारी होने की जानकारी सामने आई. उसी तारीख को गरियाबंद कलेक्टर कार्यालय से आदेश क्रमांक 233 के तहत 9 तहसीलदारों और नायब तहसीलदारों की पदस्थापना में फेरबदल कर दिया गया.
अब सवाल यह है कि क्या जिला प्रशासन को मंत्रालय के निर्देशों की जानकारी नहीं थी? अगर जानकारी थी तो तबादला आदेश किस नियम और किस प्रशासनिक अधिकार के तहत जारी किया गया? और अगर कोई विशेष छूट या अपवाद लागू था. तो क्या उसका उल्लेख आदेश में किया गया है?
मंत्रालय का आदेश एक तरफ, जिले में तबादलों की सूची दूसरी तरफ!
छत्तीसगढ़ शासन के सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा 2 नवंबर 2026 को जारी पत्र में जनगणना 2027 के द्वितीय चरण के कार्य को प्रभावित होने से बचाने के लिए संबंधित अधिकारियों-कर्मचारियों के स्थानांतरण पर छह महीने अथवा कार्य समाप्ति तक रोक लगाए जाने के निर्देश की बात कही जा रही है.
जनगणना देश की एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक प्रक्रिया है. इसमें अधिकारियों की लगातार तैनाती और जिम्मेदारियों की स्थिरता जरुरी होती है. ऐसे में शासन का मकसद साफ है कि जनगणना से जुड़े कार्यों में किसी तरह की प्रशासनिक बाधा उत्पन्न न हो. लेकिन गरियाबंद में उसी तारीख को नौ राजस्व अधिकारियों की नई पदस्थापना का आदेश जारी होना अपने आप में जांच का विषय बन गया है.
अगर संबंधित अधिकारी प्रतिबंध के दायरे में आते हैं. तो यह आदेश शासन के निर्देशों के अनुरूप कैसे है? वहीं अगर वे प्रतिबंध के दायरे से बाहर हैं. तो जिला प्रशासन को इसकी स्थिति साफ करनी चाहिए.
देवभोग-अमलीपदर में अदला-बदली: आखिर इस फेरबदल का औचित्य क्या?
इस पूरे मामले का सबसे चर्चित हिस्सा देवभोग और अमलीपदर तहसील से जुड़ा है. तबादला सूची के मुताबिक देवभोग तहसीलदार सुशील कुमार भोई को अमलीपदर भेजा गया है. जबकि अमलीपदर तहसीलदार अजय कुमार चंद्रवंशी को देवभोग की जिम्मेदारी सौंपी गई है. यानी दोनों अधिकारियों के बीच सीधे तौर पर कार्यक्षेत्र की अदला-बदली कर दी गई.
अब यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर ऐसी कौन-सी प्रशासनिक जरूरत उत्पन्न हो गई कि दोनों अधिकारियों को एक-दूसरे के क्षेत्र में भेजना जरूरी हो गया क्या दोनों तहसीलों में प्रशासनिक कार्य प्रभावित हो रहे थे? क्या किसी अधिकारी के खिलाफ शिकायत थी? क्या राजस्व व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता थी? या फिर यह सामान्य प्रशासनिक फेरबदल है?
जिला प्रशासन को इन सवालों का जवाब देना चाहिए. क्योंकि देवभोग और अमलीपदर केवल सामान्य तहसीलें नहीं हैं. ये ओडिशा सीमा से लगे महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं. जहां धान खरीदी के मौसम में अवैध धान के परिवहन, सीमावर्ती निगरानी और राजस्व अमले की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है.
धान खरीदी का सीजन और सीमावर्ती इलाकों की संवेदनशीलता
धान खरीदी का मौसम शुरू होते ही गरियाबंद जिले के देवभोग और अमलीपदर क्षेत्र में प्रशासनिक निगरानी की जिम्मेदारी बढ़ जाती है. ओडिशा सीमा से लगे होने की वजह से इन इलाकों में दूसरे राज्यों से धान की आवक, अवैध परिवहन और खरीदी केंद्रों तक पहुंचने वाले धान की वैधता की जांच प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती रहती है.
ऐसे समय में तहसील स्तर पर अधिकारियों की भूमिका बेहद अहम हो जाती है. सीमावर्ती रास्तों से धान के अवैध परिवहन की शिकायतें और बिचौलियों की सक्रियता जैसे मुद्दे समय-समय पर चर्चा में आते रहे हैं. ऐसे में धान खरीदी के ठीक पहले महत्वपूर्ण तहसीलों में अधिकारियों की अदला-बदली होना स्वाभाविक रूप से सवाल पैदा करता है.
स्थानीय स्तर पर कुछ जागरूक नागरिकों द्वारा इस फेरबदल के पीछे संभावित हितों और कथित सांठगांठ को लेकर आशंकाएं भी जताई जा रही हैं. हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है. किसी अधिकारी की संलिप्तता या अवैध वसूली में भूमिका का प्रमाण सामने आए बिना उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता. लेकिन प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह ऐसी आशंकाओं को दूर करने के लिए पारदर्शिता के साथ जवाब दे.
क्या तबादले के पीछे प्रशासनिक जरूरत या कोई और वजह?
यहां सवाल किसी एक अधिकारी के तबादले का नहीं, बल्कि पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता का है. अगर प्रशासनिक सुविधा के नाम पर तबादले किए गए हैं. तो यह बताना जरूरी है कि आखिर देवभोग और अमलीपदर में पदस्थ अधिकारियों की अदला-बदली से कौन-सी व्यवस्था सुधरने वाली है?
क्या इसके लिए कोई समीक्षा बैठक हुई थी? क्या दोनों तहसीलों की कार्यप्रणाली का मूल्यांकन किया गया था? क्या स्थानीय शिकायतों के आधार पर यह फैसला लिया गया?
या फिर धान खरीदी के महत्वपूर्ण समय में अधिकारियों की नई तैनाती के पीछे कोई अन्य प्रशासनिक समीकरण काम कर रहा है?
इन सवालों का जवाब मिलना जरूरी है, क्योंकि प्रशासनिक आदेशों पर जनता का भरोसा तभी कायम रह सकता है. जब निर्णयों के पीछे स्पष्ट कारण और नियमों का पालन दिखाई दे.
कलेक्टर के आदेश की वैधानिकता पर भी उठ रहे सवाल
इस पूरे प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि राज्य शासन के सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा जारी प्रतिबंधात्मक निर्देशों और जिला स्तर पर जारी तबादला आदेश के बीच वास्तविक कानूनी स्थिति क्या है?
क्या कलेक्टर को संबंधित अधिकारियों के स्थानांतरण का अधिकार था? क्या जनगणना कार्य के मद्देनजर जारी प्रतिबंध में जिला स्तर पर किसी प्रकार की छूट उपलब्ध थी? क्या इस तबादले के लिए शासन से पूर्व अनुमति ली गई थी?
इन सभी बिंदुओं की जांच आवश्यक है.
अगर संबंधित अधिकारी शासन के प्रतिबंध के दायरे में आते हैं और बिना किसी वैधानिक छूट या सक्षम अनुमति के उनका स्थानांतरण किया गया है, तो आदेश की वैधता पर गंभीर प्रश्न खड़े हो सकते हैं.
इसलिए मंत्रालय और जिला प्रशासन दोनों को इस मामले में स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए.
अब प्रशासन से सीधे पांच सवाल
क्या 2 नवंबर 2026 को जारी GAD के निर्देशों की जानकारी गरियाबंद कलेक्टर कार्यालय को थी?
क्या तबादला सूची में शामिल नौ अधिकारी जनगणना 2027 के प्रतिबंध के दायरे में आते हैं?
क्या इन अधिकारियों के स्थानांतरण के लिए शासन से अनुमति अथवा विशेष छूट प्राप्त की गई थी?
देवभोग और अमलीपदर के तहसीलदारों की आपसी अदला-बदली के पीछे प्रशासनिक कारण क्या हैं?
धान खरीदी के संवेदनशील सीजन में सीमावर्ती तहसीलों में अधिकारियों की नई तैनाती से निगरानी व्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
मंत्रालय संज्ञान लेगा या जिले में अपने हिसाब से चलेंगे नियम?
गरियाबंद जिले में सामने आया यह मामला केवल एक तबादला सूची का विवाद नहीं है. यह शासन के निर्देशों के पालन, प्रशासनिक जवाबदेही और सीमावर्ती क्षेत्रों में पारदर्शी व्यवस्था बनाए रखने से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है.
एक तरफ शासन जनगणना जैसे राष्ट्रीय महत्व के कार्य को लेकर अधिकारियों की तैनाती स्थिर रखने की बात कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ जिला स्तर पर तबादला आदेश जारी होने से कई सवाल पैदा हो रहे हैं.
अब निगाहें मंत्रालय और जिला प्रशासन पर टिकी हैं। क्या इस आदेश की समीक्षा होगी? क्या GAD के निर्देशों के अनुरूप स्थिति स्पष्ट की जाएगी? क्या देवभोग-अमलीपदर में अधिकारियों की अदला-बदली के पीछे के कारण सार्वजनिक किए जाएंगे?
जनता को केवल तबादले की सूची नहीं, उसके पीछे का सच जानने का भी अधिकार है. क्योंकि सवाल सिर्फ कुर्सियों की अदला-बदली का नहीं, बल्कि धान खरीदी के मौसम में सीमावर्ती क्षेत्रों की प्रशासनिक जवाबदेही का है.
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