बुलडोजर मानवता पर भारी, कैंसर पीड़ित मासूम बच्चे की मौत, परिजनों का फूटा ग़ुस्सा, बच्चे का शव लेकर कलेक्ट्रेट में प्रदर्शन
Bulldozers are heavy on humanity, an innocent child suffering from cancer dies, family members are furious, protest in the collectorate with the dead body of the child
बिलासपुर : बिलासपुर जिले में सरकंडा थाना क्षेत्र के लिंगियाडीह इलाके में नगर निगम की बुलडोजर कार्रवाई अब एक मानवीय त्रासदी का रुप ले चुकी है. सड़क चौड़ीकरण के नाम पर की गई इस कार्रवाई ने एक गरीब परिवार की आखिरी उम्मीद भी छीन ली. कैंसर से जूझ रहे 5 साल के मासूम अंशु यादव की इलाज के दौरान मौत हो गई. जब उसके घर को नगर निगम ने बिना किसी पूर्व सूचना के तोड़ दिया. शोक और आक्रोश से उबलते ग्रामीणों ने बच्चे का शव लेकर कलेक्ट्रेट पहुंच गए और जमकर प्रदर्शन किया.
दिलीप के अनुसार पीड़ित संतोष यादव सब्जी का छोटो मोटा कारोबार करता है. संतोष की मां लकवाग्रस्त है. पांच साल का लड़का हिमांशु यादव को कैंसर है. पिछले कई महीनों से उसका ईलाज चल रहा है.
परिजनों का आरोप है कि वे रायपुर के मेकाहारा हॉस्पिटल में बच्चे का इलाज करवा रहे थे. इस दौरान उन्होंने नगर निगम से दो से तीन दिन की मोहलत मांगी थी. ताकि इलाज पूरा किया जा सके और बच्चे को सुरक्षित स्थान पर शिफ्ट किया जा सके. लेकिन प्रशासन ने कोई राहत नहीं दी. घर में उनके दो अन्य बच्चे थे. इसी बीच नगर निगम का अतिक्रमण दस्ता पहुंचा और उनके घर को तोड़ दिया. इस दौरान घर में मौजूद दोनों बच्चे रोते और गिड़गिड़ाते रहे लेकिन उनके एक न सुनी गई.
बच्चों ने बताया कि मां-पापा नहीं हैं, 6 साल के भाई को लेकर इलाज के लिए रायपुर गए हैं. लेकिन उनकी नहीं सुनी गई और बुलडोजर चला दिया गया. पीड़ित संतोष यादव और उनकी पत्नी श्रद्धा यादव का कहना है कि पहले निगम के अफसरों ने तोड़फोड़ के लिए सिर्फ 1 कमरे को चिन्हित किया था. लेकिन कार्रवाई के दौरान पूरे मकान को ढहा दिया.
अंशु यादव के परिजनों का आरोप है कि नगर निगम की टीम ने उन्हें कोई लिखित सूचना नहीं दी और कार्रवाई अचानक शुरु कर दी गई. जिस समय मकान तोड़ा गया. पूरा परिवार रायपुर में इलाज करवा रहा था. मकान में रखे दस्तावेज़, कपड़े, दवाइयाँ और ज़रुरी सामान सब मलबे में दब गए. परिजनों ने बताया कि बच्चे की हालत पहले से ही नाज़ुक थी और इस मानसिक आघात के बाद उसका जीवन नहीं बचाया जा सका.
इस घटना के बाद पहले से आक्रोशित लोगों को बच्चे की मौत ने और आंदोलित कर दिया. चिंगराज पारा चौक को जाम किया. और शव लेकर कलेक्ट्रेट पहुंच गए. यहां पर जमकर प्रदर्शन किया और इंसाफ दिलाने की गुहार लगाने लगे. मोहल्लेवासियों ने प्रशासन से मांग की है कि सड़क चौड़ीकरण जैसे प्रोजेक्ट्स को लागू करने से पहले गरीब और कमजोर वर्ग के लिए उचित पुनर्वास की व्यवस्था की जाए. सतोष यादव का यह भी आरोप है कि उन्हें रहने के लिए आवास दिया गया है, वह एकदम जर्जर है। वहां पानी तक की व्यवस्था नहीं है.
लोगों का कहना है कि नगर निगम ने एकपक्षीय कार्रवाई की है. जहां रसूखदारों के मकान बचे रहे. वहीं गरीबों के घर ज़मीनदोज़ कर दिए गए. 70 साल की बुजुर्ग महिला, जो सालों से संपत्ति कर भर रही थी. उसे भी कोई वैकल्पिक आवास नहीं दिया गया.
अंशु के परिजन और स्थानीय लोगों ने कलेक्ट्रेट का घेराव कर नगर निगम के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. लोगों की मांग है कि दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई हो. पीड़ित परिवार को मुआवजा मिले और भविष्य में ऐसी अमानवीय कार्रवाइयों से बचा जाए.
घटना के बाद भी प्रशासन की तरफ से अब तक कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है. स्थानीय अधिकारी फोन कॉल्स से बचते नजर आ रहे हैं. इस बीच मानवाधिकार संगठनों ने भी इस मामले में दखल देने की बात कही है और घटना की निष्पक्ष जांच की मांग की है.
पीड़ित पिता संतोष यादव की आंखों में अब आंसू ही नहीं, भरोसे का भी सूखा पड़ा है.गोद में बेटे की लाश लेकर बैठे संतोष ने कहा “हमें बस एक कमरे की सूचना दी गई थी, लेकिन पूरा मकान गिरा दिया गया. अब हमारा बच्चा भी चला गया… हम कहां जाएं?”
प्रशासन की नींद तब टूटी जब आक्रोशित लोग कलेक्ट्रेट पहुंच गए.
लेकिन क्या एक बच्चे की मौत की भरपाई किसी मुआवज़े से हो सकती है?
क्या प्रशासन संवेदनशील विकास की दिशा में कदम बढ़ाएगा या फिर यही कहानी किसी और गरीब की जिंदगी में दोहराई जाएगी?
आज यह सिर्फ एक संतोष यादव का दुख नहीं, यह उस पूरे तंत्र का चेहरा है जो विकास की अंधी दौड़ में इंसानियत को रौंदता चला जा रहा है.
स्थानीय कांग्रेस पार्षद दिलीप पाटिल ने कहा कि निगम प्रशासन चेहरा देखकर अतिक्रमण के खिलाफ बुलडोजर चला रहा है. रसूखदारों को रियायत देते हुए गरीबों को उजाड़ा जा रहा है. बावजूद इसके लोग निगम के आदेश का पालन कर सत्तर फिट की प्रस्तावित सड़क भूमि को छोड़कर अपना मकान तोड़ रहे हैं.
मैं स्थानीय पार्षद हूं. जनता के दुख दर्द को सुूनना उनका काम है. मैंने जोन कमिश्नर से बातचीत कर पीड़ित परिवार के लिए दो दिन का समय मांगा था. लेकिन निगम ने सत्तर फिट से बाहर स्थित पीड़ित के मकान को तोड़ दिया. बच्चे की मौत की मौत कैंसर से हुई है. लेकिन घर निगम ने तोड़ा है. निगम कार्रवाई से मानवता शर्मसार हुई है. लेकिन हमें कलेक्टर साहब पर विश्वास है. पीड़ित परिवार को न्याय जरूर मिलेगा. एक सवाल पर दिलीप ने बोला कि मैं राजनीति नहीं कर रहा हूं…फिर भी जनता की आवाज में आवाज मिलाना राजनीति है तो मैं राजनीति कर रहा हूं.
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