वन भूमि बताकर रोक, जांच में निकली राजस्व भूमि!, अब अवैध कब्जा हटाएगा कौन?, शराब भवन निर्माण पर वन विभाग की रोक को लेकर भी उठे सवाल
Construction halted on grounds that the land was forest land, but an inquiry revealed it to be revenue land! Now, who will remove the illegal encroachment? Questions have also been raised regarding the Forest Department's stay on the construction of the liquor complex.
गरियाबंद : गरियाबंद जिला में पांडुका वन परिक्षेत्र से जुड़ा भूमि विवाद अब एक नए मोड़ पर पहुंच गया है. मुख्यमंत्री हेल्पलाइन 1076 में वन भूमि पर कथित अवैध अतिक्रमण की शिकायत के बाद वन विभाग द्वारा कराई गई जांच में शिकायतित स्थल को खसरा नंबर 40 के अंतर्गत राजस्व भूमि बताया गया है. वन विभाग की रिपोर्ट में अलग-अलग व्यक्तियों के नाम पर दर्ज रकबे और मौके पर कब्जे का उल्लेख करते हुए आगे की कार्रवाई राजस्व विभाग द्वारा किए जाने की बात कही गई है. लेकिन वन विभाग की यह रिपोर्ट सामने आने के बाद अब कई ऐसे सवाल खड़े हो गए हैं. जिनका जवाब संबंधित विभागों से अपेक्षित है.
अगर जमीन राजस्व की है तो कब्जा खाली कराने की जिम्मेदारी किसकी? सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब वन विभाग की जांच में भूमि राजस्व विभाग की बताई गई है, तो उस जमीन पर अगर अवैध कब्जा पाया गया है. तो उसे हटाने की कार्रवाई आखिर कौन करेगा?
राजस्व भूमि से संबंधित रिकॉर्ड, सीमांकन, पट्टा, कब्जे की वैधता तथा नियम विरुद्ध कब्जे की स्थिति की जांच राजस्व प्रशासन के अधिकार क्षेत्र से जुड़ी होती है. ऐसे में अब यह देखना अहम होगा कि संबंधित राजस्व अधिकारी मौके का सीमांकन और रिकॉर्ड की जांच कर कथित कब्जे की वास्तविक स्थिति क्या पाते हैं और अगर कब्जा अवैध पाया जाता है तो नियमानुसार क्या कार्रवाई की जाती है.
सिर्फ यह कह देना कि “जमीन राजस्व विभाग की है, आगे की कार्रवाई राजस्व विभाग करेगा”, क्या शिकायत के वास्तविक निराकरण के लिए पर्याप्त है? यह सवाल अब ग्रामीणों के बीच चर्चा का विषय बन गया है,
वन विभाग की जांच रिपोर्ट ने ही खड़े कर दिए कई सवाल
24 जून 2026 को जारी वन विभाग के पत्र के मुताबिक 23 जून को सहायक परिक्षेत्र अधिकारी पांडुका एवं परिसर रक्षक तिलईदादर द्वारा राजस्व विभाग के संबंधित पटवारी और पंचगणों की मौजूदगी में स्थल की जांच की गई. जांच में शिकायतित स्थल राजस्व भूमि खसरा नंबर 40 के अंतर्गत पाया गया.
रिपोर्ट में 0.080 हेक्टेयर भूमि का पट्टा नंदकुमार पिता होमराम साहू के नाम, जबकि पुनेश्वरी पिता टार्जन साहू का 0.014 हेक्टेयर और रमेश अजगले पिता बालाराम का 0.310 हेक्टेयर रकबा ग्राम पंचायत पांडरीपानीडीह के माध्यम से आवेदित राजस्व भूमि में कब्जे में पाया जाना बताया गया है.
अब सवाल यह है कि इन जमीनों का वास्तविक सीमांकन क्या है?
कब्जे पट्टे की सीमा के भीतर हैं या बाहर? अगर बाहर हैं तो उस अतिरिक्त कब्जे पर राजस्व विभाग क्या कार्रवाई करेगा?
शराब भवन निर्माण पर वन विभाग की कथित रोक ने बढ़ाया मामला
इस मामले में एक और अहम सवाल सामने आ रहा है. स्थानीय स्तर पर यह बात उठाई जा रही है कि जब नगर पंचायत द्वारा शासकीय राशि से शराब दुकान/भवन का निर्माण कराया जा रहा था. तब वन विभाग की तरफ से निर्माण कार्य पर रोक लगाए जाने की बात सामने आई थी.
अगर वर्तमान जांच रिपोर्ट के मुताबिक संबंधित भूमि राजस्व भूमि है. तो फिर उस समय वन विभाग ने निर्माण पर रोक किस आधार पर लगाई थी?
क्या उस समय भूमि का सीमांकन किया गया था?
क्या वन विभाग के रिकॉर्ड में जमीन वन भूमि के रूप में दर्ज थी?
क्या राजस्व और वन विभाग के रिकॉर्ड में कोई अंतर था?
और अगर जमीन पहले से राजस्व भूमि थी, तो शासकीय निर्माण में वन विभाग की आपत्ति का आधार क्या था?
इन सवालों का जवाब सामने आना जरूरी है.
वन विभाग की कार्यशैली पर भी उठ रहे सवाल
मामले ने वन विभाग की कार्यशैली को लेकर भी चर्चा तेज कर दी है. एक तरफ मुख्यमंत्री हेल्पलाइन में करीब 10 साल से वन अतिक्रमण होने की शिकायत की गई. वहीं जांच के बाद वन विभाग ने उसी स्थल को राजस्व भूमि बताया. दूसरी तरफ इसी क्षेत्र में शासकीय निर्माण को लेकर वन विभाग की कथित रोक का मामला सामने आ रहा है. ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि भूमि की वास्तविक स्थिति को लेकर विभागीय स्तर पर पहले क्या जांच हुई थी?
अगर जमीन राजस्व भूमि थी तो वन विभाग की आपत्ति का आधार क्या था? और अगर वन विभाग के पास उस जमीन को वन भूमि मानने का कोई दस्तावेजी आधार था. तो वर्तमान जांच में उसे राजस्व भूमि क्यों बताया गया?
अब सिर्फ रिपोर्ट नहीं, कार्रवाई का इंतजार
वन विभाग ने अपनी जांच रिपोर्ट की प्रतिलिपि उप वनमंडलाधिकारी गरियाबंद, उप वनमंडलाधिकारी राजिम, अनुविभागीय अधिकारी राजस्व छुरा और तहसीलदार छुरा को भी भेजी है. इससे अब मामला सीधे राजस्व प्रशासन की निगरानी में पहुंचता दिखाई दे रहा है.
अब देखना होगा कि राजस्व विभाग इस मामले में सीमांकन, रिकॉर्ड सत्यापन और कब्जे की जांच कब कराता है और अगर किसी तरह का अवैध कब्जा सामने आता है तो नियमानुसार उसे हटाने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं.
सबसे बड़ा सवाल यही—सरकारी जमीन आखिर किसकी जिम्मेदारी?
वन विभाग कह रहा है जमीन राजस्व की है. राजस्व विभाग को आगे कार्रवाई करनी है और दूसरी तरफ शासकीय निर्माण पर वन विभाग की पूर्व कथित रोक का सवाल खड़ा है. ऐसे में अब जनता जानना चाहती है कि आखिर इस जमीन की वास्तविक स्थिति क्या है और अगर कब्जा अवैध है तो सरकारी जमीन को कब्जामुक्त कराने की कार्रवाई कौन करेगा?
मामले में सिर्फ शिकायत का निराकरण दर्ज करना पर्याप्त नहीं होगा. जमीन का सीमांकन, पुराने रिकॉर्ड, वन विभाग की आपत्ति/रोक का आधार और वर्तमान जांच रिपोर्ट—इन सभी कड़ियों को सामने लाकर स्थिति स्पष्ट करना जरूरी है. तभी यह साफ होगा कि अतिक्रमण भूमि को लेकर आखिर वास्तविक विवाद क्या है और विभागीय स्तर पर जिम्मेदारी किसकी बनती है.
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