कितनी मौतों के बाद जागेगा स्वास्थ्य विभाग गरियाबंद?, बंधनों में संचालित श्री संकल्प छत्तीसगढ़ मिशन हॉस्पिटल पर फिर लगा गंभीर आरोप

After how many deaths will the Gariaband Health Department wake up? Serious allegations again leveled against Shri Sankalp Chhattisgarh Mission Hospital, which operates under restrictions.

कितनी मौतों के बाद जागेगा स्वास्थ्य विभाग गरियाबंद?, बंधनों में संचालित श्री संकल्प छत्तीसगढ़ मिशन हॉस्पिटल पर फिर लगा गंभीर आरोप

गरियाबंद /छुरा : छुरा ब्लॉक में संचालित श्री संकल्प छत्तीसगढ़ मिशन हॉस्पिटल एक बार फिर गंभीर आरोपों के घेरे में है. आंत की इमरजेंसी सर्जरी के बाद ग्राम दुल्ला, मरार पारा निवासी 45 वर्षीय तलेश्वर पटेल की मौत ने पूरे क्षेत्र में रोष फैला दिया है.
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस अस्पताल पर पहले से “बंधन” और निगरानी की स्थिति बताई जा रही है, वहां बार-बार गंभीर घटनाएँ कैसे हो रही हैं? और स्वास्थ्य विभाग आखिर कर क्या रहा है?
अनुमति पर सवाल, फिर भी ऑपरेशन
परिजनों और स्थानीय सूत्रों के मुताबिक अस्पताल के पास जनरल सर्जरी की विधिवत अनुमति संदिग्ध बताई जा रही है. 24 घंटे विशेषज्ञ जनरल सर्जन की उपलब्धता सुनिश्चित नहीं थी.
ICU और उन्नत आपात सुविधा की स्थिति स्पष्ट नहीं
इसके बावजूद रात 9 बजे आंत की जटिल सर्जरी की गई. जबकि विशेषज्ञों के अनुसार Intestinal Obstruction या Perforation जैसी स्थिति में पूर्ण संसाधन और अनुभवी टीम जरुरी होती है..अगर संसाधन सीमित थे. तो मरीज को उच्च केंद्र (जिला अस्पताल/मेडिकल कॉलेज) रेफर क्यों नहीं किया गया?
पहले भी हो चुकी है मौत, जांच अब तक जारी
सूत्र बताते हैं कि इससे पहले भी अस्पताल में एक व्यक्ति की मौत का मामला सामने आया था, जिसकी जांच अब तक लंबित है. यानी एक नहीं, दो-दो गंभीर घटनाएँ… फिर भी अस्पताल संचालन पर ठोस कार्रवाई क्यों नहीं?
क्या जांच केवल कागजों में चल रही है
क्या हर बार घटना के बाद “जांच जारी है” कहकर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है?
30 दिन का बंद, फिर खुली छूट?
मिली जानकारी के मुताबिक पूर्व में एक आदिवासी गर्भवती महिला क़े शिशु मृत्यु प्रकरण में अस्पताल को 30 दिन के लिए बंद कराया गया था. 
लेकिन उसके बाद क्या स्थायी सुधार हुआ?
क्या अनुमति और संसाधनों की दोबारा कठोर जांच हुई?
या फिर औपचारिकता पूरी कर अस्पताल को फिर खुली छूट दे दी गई?
ग्रामीणों का कहना है एक परिवार की कीमत क्या है? हर बार मौत के बाद 30 दिन का ताला और फिर सब सामान्य?”
पैसों के बीच दब गई जान?
ताजा मामले में परिजनों का आरोप है कि करीब ₹1.40 लाख खर्च के बावजूद मरीज को नहीं बचाया जा सका. अब सवाल उठ रहा है
क्या यह चिकित्सा निर्णय था या आर्थिक दबाव
क्या मरीज को रेफर करने के बजाय रोककर सर्जरी करना ‘जोखिम भरा निर्णय’ नहीं था?
स्वास्थ्य विभाग भी सवालों के घेरे में
लगातार घटनाओं के बावजूद
क्या CMHO कार्यालय ने नियमित निरीक्षण किया?
क्या लाइसेंस और अनुमति की समीक्षा की गई?
क्या संसाधनों की वास्तविक उपलब्धता का सत्यापन हुआ?
अगर अस्पताल पहले से जांच के दायरे में था. तो दूसरी घटना तक हालात कैसे पहुँचे?
जनता पूछ रही है-
“क्या इस बार भी सिर्फ खानापूर्ति होगी? या सख्त कार्रवाई?
कानूनी दृष्टि से मामला गंभीर अगर आरोप सत्य पाए जाते हैं, तो मामला-
लापरवाही से मृत्यु,
मानक उपचार प्रोटोकॉल का उल्लंघन,
और स्वास्थ्य नियमों की अवहेलना की श्रेणी में आ सकता है
विशेषज्ञ मानते हैं कि बिना पूर्ण संसाधन जटिल सर्जरी करना “ग्रॉस मेडिकल नेग्लिजेंस” माना जा सकता है.
*एक परिवार उजड़ा, जवाब कौन देगा?*
तलेश्वर पटेल परिवार के कमाऊ सदस्य थे। अब पत्नी और बच्चों के सामने भविष्य का संकट खड़ा है.
ग्रामीणों का आक्रोश साफ है अगर सुविधा नहीं थी तो ऑपरेशन क्यों किया? रेफर करते तो जान बच सकती थी.
बड़ा सवाल
बार-बार घटनाएँ…
पूर्व जांच लंबित…
अस्पताल पर पूर्व में ताला…
फिर भी संचालन जारी…
आखिर स्वास्थ्य विभाग कब जागेगा?
क्या इस बार भी मामला लीपापोती में दब जाएगा?
छुरा की जनता अब केवल जांच नहीं, ठोस और पारदर्शी कार्रवाई की मांग कर रही है. इसके बावजूद रात 9 बजे आंत की जटिल सर्जरी की गई. जबकि विशेषज्ञों के मुताबिक Intestinal Obstruction या Perforation जैसी स्थिति में पूर्ण संसाधन और अनुभवी टीम अनिवार्य होती है.
 अगर संसाधन सीमित थे, तो मरीज को उच्च केंद्र (जिला अस्पताल/मेडिकल कॉलेज) रेफर क्यों नहीं किया गया?
पहले भी हो चुकी है मौत, जांच अब तक जारी
सूत्र बताते हैं कि इससे पहले भी अस्पताल में एक व्यक्ति की मौत का मामला सामने आया था, जिसकी जांच अब तक लंबित है.
यानी एक नहीं, दो-दो गंभीर घटनाएँ… फिर भी अस्पताल संचालन पर ठोस कार्रवाई क्यों नहीं?
क्या जांच केवल कागजों में चल रही है?
क्या हर बार घटना के बाद “जांच जारी है” कहकर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है?
30 दिन का बंद, फिर खुली छूट?
मिली जानकारी के अनुसार पूर्व में एक आदिवासी गर्भवती महिला क़े शिशु मृत्यु प्रकरण में अस्पताल को 30 दिन के लिए बंद कराया गया था. लेकिन उसके बाद क्या स्थायी सुधार हुआ?
क्या अनुमति और संसाधनों की दोबारा कठोर जांच हुई?
या फिर औपचारिकता पूरी कर अस्पताल को फिर खुली छूट दे दी गई?
ग्रामीणों का कहना है एक परिवार की कीमत क्या है? हर बार मौत के बाद 30 दिन का ताला और फिर सब सामान्य?
पैसों के बीच दब गई जान?
ताजा मामले में परिजनों का आरोप है कि लगभग ₹1.40 लाख खर्च के बावजूद मरीज को नहीं बचाया जा सका.
अब सवाल उठ रहा है—क्या यह चिकित्सा निर्णय था या आर्थिक दबाव?
क्या मरीज को रेफर करने के बजाय रोककर सर्जरी करना ‘जोखिम भरा निर्णय’ नहीं था?
स्वास्थ्य विभाग भी सवालों के घेरे में
लगातार घटनाओं के बावजूद—
क्या CMHO कार्यालय ने नियमित निरीक्षण किया?
क्या लाइसेंस और अनुमति की समीक्षा की गई?
क्या संसाधनों की वास्तविक उपलब्धता का सत्यापन हुआ?
अगर अस्पताल पहले से जांच के दायरे में था, तो दूसरी घटना तक हालात कैसे पहुँचे?
जनता पूछ रही है-
क्या इस बार भी सिर्फ खानापूर्ति होगी? या सख्त कार्रवाई?
कानूनी दृष्टि से मामला गंभीर
अगर आरोप सत्य पाए जाते हैं, तो मामला—
लापरवाही से मृत्यु,
मानक उपचार प्रोटोकॉल का उल्लंघन,
और स्वास्थ्य नियमों की अवहेलना की श्रेणी में आ सकता है.
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विशेषज्ञ मानते हैं कि बिना पूर्ण संसाधन जटिल सर्जरी करना “ग्रॉस मेडिकल नेग्लिजेंस” माना जा सकता है.
एक परिवार उजड़ा, जवाब कौन देगा?
तलेश्वर पटेल परिवार के कमाऊ सदस्य थे। अब पत्नी और बच्चों के सामने भविष्य का संकट खड़ा है.
ग्रामीणों का आक्रोश साफ है—
अगर सुविधा नहीं थी तो ऑपरेशन क्यों किया? रेफर करते तो जान बच सकती थी।”
बड़ा सवाल
बार-बार घटनाएँ…
पूर्व जांच लंबित…
अस्पताल पर पूर्व में ताला…
फिर भी संचालन जारी…
आखिर स्वास्थ्य विभाग कब जागेगा?
क्या इस बार भी मामला लीपापोती में दब जाएगा?
छुरा की जनता अब केवल जांच नहीं, ठोस और पारदर्शी कार्रवाई की मांग कर रही है.
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