नया आलीशान भवन 5 साल पहले बनकर तैयार, फिर भी जर्जर पुराने भवन मे आदिवासी बालक आश्रम का हो रहा संचालन, प्रशासन की उदासीनता पर उठे सवाल
Despite a new, state-of-the-art building being completed five years ago, the tribal boys' ashram continues to operate from a dilapidated old structure, raising questions about the administration's apathy.
गरियाबंद/मैनपुर : गरियाबंद जिले के आदिवासी विकासखण्ड मुख्यालय मैनपुर क्षेत्र से एक अनोखा मामला सामने आया है सन् 1966 मे मैनपुर नगर मे आदिवासी बालक आश्रम शुरु किया गया. इस बालक आश्रम का संचालन शेड वाले बेहद जर्जर भवन मे किया जा रहा है भवन की हालत बेहद ही खराब हो गई है. लगातार बारिश होने पर कमरे के भीतर पानी झरने से बच्चो को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है.
कक्षा पहली से आठवीं तक करीब 100 सीटर इस आश्रम के भवन निर्माण के लिए मैनपुर नगर सहित क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों की मांग पर 162.76 लाख की लागत से देहारगुड़ा में आलीशन सर्व सुविधायुक्त आश्रम भवन का निर्माण किया गया है और इस आश्रम भवन का आज से करीब 5 साल पहले 10 जून 2021 को कांग्रेस पार्टी के तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, पूर्व लोक निर्माण गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू, पूर्व शिक्षा मंत्री प्रेमसाय सिंह टेकाम, पूर्व सांसद चुन्नीलाल साहू, डमरूधर पुजारी, स्मृति ठाकुर, जिला पंचायत सदस्य लोकेश्वरी नेताम द्वारा उद्घाटन भी किया गया है.
नया आलीशन भवन बनने के 5 साल बाद भी पुराने जर्जर भवन मे आदिवासी बालक आश्रम का संचालन किया जा रहा है. जो आदिम जाति कल्याण विभाग के संबंधित अधिकारियो के उदासीन रवैये को बताने के लिए काफी है.
जब आश्रम के पास स्वयं का आलीशन भवन है. उसके बावजूद पुराने जर्जर भवन मे क्यो आश्रम का संचालन किया जा रहा है. यह कई सवालो को जन्म देता है तो वही दूसरी तरफ आलीशान नया भवन देखरेख के अभाव मे खण्डहर मे तब्दील होता जा रहा है. मैनपुर क्षेत्र के लोगों ने गरियाबंद कलेक्टर रणबीर शर्मा से मांग किया कि पुराने भवन मे संचालित हो रहे आदिवासी बालक आश्रम को फौरन नये भवन में ट्रांसफर किया जाए. जिससे यहां के छात्र-छात्राओ को बेहतर सुविधा और फायदा मिल सके.
आदिवासी बालक आश्रम मैनपुर के सफल संचालन के लिए नगर से 6 किलोमीटर दुर ग्राम पंचायत देहारगुड़ा में कांग्रेस की सर्कार ने करोड़ों रूपये के लागत 5 साल पहले आलिशान भवन का निर्माण कराया गया. लेकिन अब तक नए भवन में आश्रम को संचालित नही किया जा रहा है. जिसकी वजह से यहा पढाई करने वाले बच्चे पुराने जर्जर भवन में निवास कर पढाई करने मजबूर हो रहे है. क्षेत्र के लोगों ने सांसद विधायक जिले के कलेक्टर एंव आला अधिकारियों से मांग कर चुके है कि मैनपुर आदिवासी बालक आश्रम को नया भवन देहारगुड़ा में संचालित किया जाए. लेकिन इस ओर ध्यान न देना समझ से परे है.
60 साल पुराने जर्जर शेडनुमा भवन में आश्रम का हो रहा संचालन
वर्तमान में आदिवासी बालक आश्रम जिस जर्जर भवन मे संचालित हो रहा है. वह 60 साल पुराना और शेडनुमा भवन है. जहां लगातार बारिश से कमरो के भीतर पानी रिस रहा है और बच्चो को यहां निवास कर पढ़ाई करना होता है. जर्जर भवन के उपर पॉलीथीन लगाया गया है जबकि कांग्रेस के शासन में करोड़ों रूपये की लागत से नये भवन का निर्माण 5 साल पहले हो चुका है.
सरपंच एवं ग्रामीणों ने नया भवन में आश्रम संचालित करने की मांग
ग्राम पंचायत देहारगुड़ा के सरपंच महेश दीवान, जनपद सदस्य प्रतापसिंह मरकाम, पूर्व सरपंच डिगेश्वरी सांडे, पूर्व उपसरपंच पवन दीवान, लोकेश सांडे, रामप्रसाद, सोहन नागेश, बुधराम सांडे, हितराम, देवन नेताम व क्षेत्र के लोगों ने मांग किया है कि जब करोड़ों रूपये की लागत से नया भवन का निर्माण किया गया है तो आदिवासी बालक आश्रम का संचालन नया में किया जाए. ग्रामीणों ने बताया नया भवन देखरेख के अभाव मे अब धीरे -धीरे खण्डहर मे तब्दील हो रहा है. देखरेख नहीं होने से परिषर में झाड़िया उग गई है. खिड़की दरवाजे खराब हो रहे हैं और सरकारी पैसो की खुलेआम बर्बादी हो रही है. करोड़ों रूपये के नया भवन बनने के बाद भी इसका लाभ बच्चों को नहीं मिलने से क्षेत्र के लोगों में नराजगी देखने को मिल रही है.
क्या कहते है अफसर
आदिम जाति कल्याण विभाग गरियाबंद के सहायक आयुक्त लोकेश्वर पटेल ने चर्चा मे बताया आदिवासी बालक आश्रम का नया भवन 5 साल पहले बनकर तैयार हो चुका है. पहले इसमें एक साल एकलव्य आवासीय विद्यालय का संचालन किया जा रहा था. अब भवन पिछले 3-4 साल से खाली पड़ा हुआ है. जल्द ही इस नये भवन में आदिवासी बालक आश्रम का संचालन शुरु करवाया जाएगा.
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8 लाख डकार कर भाग गया ठेकेदार, अब मासूम बच्चे और ग्रामीण मिलकर बना रहे 'अपना स्कूल', भ्रष्ट ठेकेदारों पर मेहरबान प्रशासन
गरियाबंद/मैनपुर : गरियाबंद जिले के आदिवासी बहुल मैनपुर ब्लॉक से सिस्टम की लापरवाही, भ्रष्टाचार और लाचारी की शर्मनाक तस्वीर सामने आई है. ग्राम मोतीपानी में प्राथमिक शाला के 41 मासूम बच्चे और ग्रामीण मिलकर खुद फावड़ा, कवेलू और गारा उठाकर एक कच्चे मकान को 'स्कूल भवन' बनाने में जुटे हुए हैं. आदिवासी अंचल से आई यह तस्वीर प्रदेश की बदहाल शिक्षा व्यवस्था और दावों के मुंह पर करारा तमाचा है.
8 लाख रुपए की मंजूरी, आधा पैसा खाकर भागा ठेकेदार
मिली जानकारी के मुताबिक करीब 4 साल पहले 'मुख्यमंत्री जतन योजना' के तहत मोतीपानी प्राथमिक शाला में अतिरिक्त कक्ष निर्माण के लिए 8 लाख रुपए स्वीकृत किए गए थे. इस निर्माण कार्य की पूरी जिम्मेदारी ट्राइबल डिपार्टमेंट के पास थी. ठेकेदार ने स्वीकृत राशि में से आधी से ज्यादा रकम तो निकाल ली. लेकिन स्कूल भवन का काम आधा-अधूरा छोड़कर रफूचक्कर हो गया.
सिर पर मंडराता खतरा देख ग्रामीणों ने शुरू किया श्रमदान
स्कूल का पुराना भवन पूरी तरह जर्जर हो चुका था और बरसात के दिनों में छत गिरने का खतरा मंडरा रहा था. अधिकारियों के चक्कर काटकर थके ग्रामीणों और शिक्षकों ने आखिरकार बच्चों की सलामती के लिए खुद ही कमान संभाली. गांव के लोग और मासूम स्कूली बच्चे मिलकर एक पुराने कच्चे मकान की दीवारों को ठीक कर रहे हैं और खपरैल (कवेलू) बदल रहे हैं ताकि बच्चे सिर ढककर पढ़ाई कर सकें. इस प्राथमिक शाला में कुल 41 बच्चे पढ़ते हैं, जो हर दिन खौफ के साए में शिक्षा हासिल करने को मजबूर हैं.
अकेले मैनपुर ब्लॉक में 40 से ज्यादा स्कूल भवन अधूरे!
मोतीपानी की यह घटना कोई अकेली नहीं है। मैनपुर ब्लॉक में ही 40 से ज्यादा स्कूल भवनों का काम भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुका है और वर्षों से अधूरा पड़ा है. स्थानीय निवासियों का आरोप है कि प्रशासन ने लापरवाह और भ्रष्ट ठेकेदारों पर सिर्फ नाममात्र की कागजी कार्रवाई करके मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया। जिम्मेदार अफसरों की मिलीभगत के कारण आज गरीब आदिवासियों के बच्चों को अपने हाथ से मिट्टी और कवेलू उठाकर अपना स्कूल संवारना पड़ रहा है.
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बारिश में अनहोनी के डर के बीच कोठा-खपरैल में पढ़ने मजबूर आदिवासी बच्चे: अब ग्रामीण चंदा जुटाकर कर रहे श्रमदान
गरियाबंद/मैनपुर : सरकार आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के दावे करती है. लेकिन गरियाबंद जिले के मैनपुर विकासखंड के राजापड़ाव क्षेत्र में इन दावों की जमीनी हकीकत कुछ और ही तस्वीर बयां कर रही है. ग्राम पंचायत भूतबेड़ा के आश्रित ग्राम मोतीपानी में मासूम आदिवासी बच्चे आज भी जर्जर कोठा-खपरैल के मकान में बैठकर पढ़ाई करने को मजबूर हैं.
चार साल से अधूरा पड़ा स्कूल भवन
मोतीपानी में शासकीय प्राथमिक शाला के लिए स्कूल भवन का निर्माण करीब चार साल पहले शुरू हुआ था. ग्रामीणों के मुताबिक निर्माण कार्य शुरू होने के बाद भवन को अधूरा छोड़ दिया गया. चार साल गुजर जाने के बाद भी भवन का निर्माण पूरा नहीं हो सका है. अधूरा भवन आज भी बच्चों की राह देख रहा है. जबकि बच्चे मजबूरी में पुराने जर्जर भवन में पढ़ाई कर रहे हैं. ग्रामीणों का आरोप है कि स्कूल भवन को अधूरा छोड़ने के मामले में जिम्मेदारी तय करने और निर्माण पूरा कराने को लेकर कई बार शासन-प्रशासन से गुहार लगाई गई, लेकिन समस्या जस की तस बनी हुई है.
41 बच्चों की पढ़ाई, लेकिन स्कूल भवन अधूरा
मोतीपानी के शासकीय प्राथमिक शाला में पहली से पांचवीं तक कुल 41 बच्चे दर्ज हैं. इन बच्चों को सुरक्षित और बेहतर शैक्षणिक वातावरण मिलना चाहिए. लेकिन भवन अधूरा होने के कारण पढ़ाई के लिए ग्रामीणों को वैकल्पिक व्यवस्था का सहारा लेना पड़ रहा है.
बरसात में छत गिरने का डर, ग्रामीणों ने संभाला मोर्चा
सबसे चिंता की बात यह है कि जिस जर्जर कोठा-खपरैल वाले मकान में बच्चों की कक्षाएं लग रही हैं. उसकी हालत भी ठीक नहीं है. बरसात के मौसम में छत गिरने और किसी अप्रिय घटना की आशंका बनी रहती है. बच्चों की सुरक्षा को देखते हुए ग्रामीणों ने खुद श्रमदान कर स्कूल की खपरैल और छत की मरम्मत की. यह तस्वीर व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करती है-जहां बच्चों के हाथों में किताब-कॉपी होनी चाहिए. वहां उनके गांव के लोग स्कूल की छत बचाने के लिए श्रमदान करने को मजबूर हैं.
न पेड़ के नीचे, न कोठा में-बच्चों को चाहिए पक्का स्कूल
राजापड़ाव क्षेत्र में शिक्षा व्यवस्था की चुनौतियां लंबे समय से सामने आती रही हैं. कहीं स्कूल भवन का अभाव है तो कहीं जर्जर भवनों में बच्चों की पढ़ाई हो रही है. मोतीपानी के बच्चे भी इसी बदहाल व्यवस्था का हिस्सा बन गए हैं. बरसात में टपकती छत, गर्मी में तपता खपरैल और जर्जर भवन के बीच पढ़ाई करने वाले इन बच्चों के लिए एक सुरक्षित और पक्का स्कूल भवन आज भी सपना बना हुआ है.
8 लाख के भवन का निर्माण कब होगा पूरा?
ग्रामीणों का सवाल है कि जब स्कूल भवन के लिए करीब 8 लाख रुपये की स्वीकृति है और योजना के तहत पहली किस्त भी जारी हो चुकी है. तो आखिर चार साल बाद भी भवन अधूरा क्यों है? निर्माण कार्य में देरी के लिए जिम्मेदार कौन है और बच्चों को उनका पक्का स्कूल भवन कब मिलेगा?
श्रमदान में जुटे ग्रामीण: रविन्द्र कुमार मरकाम, दुलार सिंह, प्रेमलाल, पंचूराम, रामेश्वर, दुखुराम, नवल सिंह, मंगूराम, भीमूराम यादव, थमन सिंह, रामेश्वर, भंवर सिंह, भावसिंह एवं नंदलाल नागेश सहित अन्य ग्रामीण
चार साल बाद भी जिम्मेदारी तय क्यों नहीं?
ग्रामीणों का सवाल है कि जब स्कूल भवन का निर्माण चार साल पहले शुरू हुआ था तो आखिर इसे अब तक पूरा क्यों नहीं कराया गया? निर्माण कार्य अधूरा छोड़ने वाले ठेकेदार या संबंधित जिम्मेदारों पर क्या कार्रवाई हुई? यदि कार्रवाई नहीं हुई तो इसकी वजह क्या है?
ग्रामीणों की मांग है कि प्रशासन तत्काल मौके का निरीक्षण कर अधूरे स्कूल भवन का निर्माण पूरा कराए और तब तक बच्चों की सुरक्षा के लिए वैकल्पिक एवं सुरक्षित व्यवस्था सुनिश्चित करे।मासूम बच्चों की पढ़ाई से जुड़ा यह मामला अब सिर्फ एक स्कूल भवन का नहीं, बल्कि राजापड़ाव क्षेत्र के आदिवासी बच्चों के शिक्षा के अधिकार और उनके सुरक्षित भविष्य का सवाल बन गया है.
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