खेल किट आपूर्ति में सिर्फ स्थानीय सप्लायर्स को अनुमति देने वाला छग का टेंडर सुप्रीम कोर्ट ने किया रद्द, बताया मनमानी और भेदभावपूर्ण

The Supreme Court has cancelled the Chhattisgarh tender allowing only local suppliers to supply sports kits, calling it arbitrary and discriminatory.

खेल किट आपूर्ति में सिर्फ स्थानीय सप्लायर्स को अनुमति देने वाला छग का टेंडर सुप्रीम कोर्ट ने किया रद्द, बताया मनमानी और भेदभावपूर्ण

सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ सरकार के स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा विद्यार्थियों को खेल किट आपूर्ति के लिए जारी की गई निविदा को रद्द कर दिया है. न्यायालय ने इसे मनमाना, अनुचित और भेदभावपूर्ण करार देते हुए कहा कि इसका बच्चों को खेल सामग्री उपलब्ध कराने के उद्देश्य से कोई तर्कसंगत संबंध नहीं है.
इस फैसले के बाद स्कूल शिक्षा विभाग की खेल किट आपूर्ति योजना पर फिलहाल रोक लग गई है. नई निविदा जारी होने तक बच्चों को खेल सामग्री वितरण की प्रक्रिया स्थगित रहेगी।
न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि यह फैसला जनहित और संवैधानिक समानता के सिद्धांतों को बनाए रखने के लिए जरुरी है.
छत्तीसगढ़ सरकार को बड़ा झटका देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उस विवादित टेंडर शर्त को रद्द कर दिया जिसमें सिर्फ उन्हीं कंपनियों को बोली लगाने की अनुमति दी गई थी. जिन्होंने पहले राज्य एजेंसियों को आपूर्ति की हो. जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि ऐसी शर्त “समानता और स्वतंत्र व्यापार के संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन करती है”. जो संविधान के अनुच्छेद 14 और 19(1)(g) में निहित हैं.
यह मामला तब शुरु हुआ जब दिल्ली स्थित विनिश्मा टेक्नोलॉजीज प्रा. लि. - जो बिहार, गुजरात और कर्नाटक जैसे राज्यों में आपूर्ति का अनुभव रखती हैं. उनको छत्तीसगढ़ के छात्रों के लिए ₹39.81 करोड़ के खेल किट आपूर्ति प्रोजेक्ट से बाहर कर दिया गया.
समग्र शिक्षा छत्तीसगढ़ कार्यालय ने 21 जुलाई 2025 को सरकारी स्कूलों के लिए तीन टेंडर जारी किए थे. विवादित शर्त के मुताबिक बोली लगाने वाले को पिछले तीन वित्तीय वर्षों में छत्तीसगढ़ की सरकारी एजेंसियों को कम से कम ₹6 करोड़ की आपूर्ति का अनुभव होना चाहिए.
विनिश्मा ने इस नियम को भेदभावपूर्ण और प्रतिस्पर्धा को खत्म करने वाला बताते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में चुनौती दी. लेकिन हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के पक्ष में फैसला दिया और कहा कि यह शर्त विश्वसनीयता और स्थानीय परिचय सुनिश्चित करती है.
अपील की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह जांच की कि क्या स्थानीय अनुभव की अनिवार्यता “तर्कसंगत” थी या “मनमानी.”
न्यायमूर्ति आलोक अराधे ने फैसले लिखते हुए कहा, “राज्य बिना उचित कारण के बाजार को बाहरी प्रतियोगियों के लिए बंद नहीं कर सकता. समान अवसर का सिद्धांत यह मांग करता है कि सभी समान रूप से योग्य प्रतिस्पर्धियों को भाग लेने की अनुमति हो.”
पीठ ने यह भी कहा कि यह टेंडर खेल किट जैसी सामान्य वस्तुओं की आपूर्ति से जुड़ा है न कि किसी संवेदनशील या सुरक्षा-संबंधी सामग्री से. इसलिए राज्य के “नक्सल प्रभावित” होने का तर्क इस तरह की सीमितता को सही नहीं ठहरा सकता.
कोर्ट ने पाया कि यह शर्त एक “कृत्रिम बाधा” थी, जो सक्षम और अनुभवी सप्लायर्स को बाहर कर रही थी - चाहे उन्होंने अन्य राज्यों या केंद्रीय एजेंसियों के साथ बड़े कॉन्ट्रैक्ट ही क्यों न निभाए हों. “ऐसी सीमाएँ प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के बजाय कार्टेल बनाने को प्रोत्साहित करती हैं.” अदालत ने कहा.
पीठ ने रामाना दयाराम शेट्टी बनाम इंटरनेशनल एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (1979) और भारत फोर्ज लि. बनाम भारत संघ (2022) जैसे पुराने फैसलों का हवाला देते हुए दोहराया कि टेंडर की शर्तें निष्पक्षता के सिद्धांत को कमजोर नहीं कर सकतीं या व्यापक भागीदारी को हतोत्साहित नहीं कर सकता.
सुप्रीम कोर्ट ने इस शर्त को असंवैधानिक ठहराते हुए 11 और 12 अगस्त 2025 के हाईकोर्ट आदेशों के साथ-साथ 21 जुलाई 2025 के टेंडर नोटिसों को भी रद्द कर दिया. अदालत ने कहा कि राज्य सरकार चाहे तो नई टेंडर अधिसूचनाएँ जारी कर सकती है. बशर्ते वे शर्तें तर्कसंगत और भेदभाव-रहित हों.
“विवादित शर्त मनमानी, अनुचित और भेदभावपूर्ण है,” अदालत ने कहा, यह जोड़ते हुए कि इसका “खेल किट की प्रभावी आपूर्ति सुनिश्चित करने के मकसद से कोई तार्किक संबंध नहीं है.”
यह फैसला न सिर्फ विनिश्मा टेक्नोलॉजीज के लिए राहत लेकर आया. बल्कि यह भी दोहराया कि भारत में सार्वजनिक अनुबंधों में समान अवसर का संवैधानिक अधिकार सर्वोपरि है.
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