गुलज़ार साहब के परिवार की माली हालत थी बहुत खराब, मोटर गैरेज में करना पड़ा काम
मुंबई : गुलज़ार साहब जब जवान हो रहे थे , उस वक़्त उनके परिवार की माली हालत अच्छी नहीं थी .इस वजह से उन्हें मुंबई आकर एक मोटर गैराज़ में काम शुरू करना पड़ा.गुलज़ार साब को रंगों से खेलने का बहुत शौक था,
मुंबई : गुलज़ार साहब जब जवान हो रहे थे , उस वक़्त उनके परिवार की माली हालत अच्छी नहीं थी .इस वजह से उन्हें मुंबई आकर एक मोटर गैराज़ में काम शुरू करना पड़ा.गुलज़ार साब को रंगों से खेलने का बहुत शौक था, इसलिए उनको मोटर गेराज़ में काम करना बुरा मालूम न हुआ .गुलज़ार साब मोटर गैराज़ में एक्सीडेंट से खराब हुई गाड़ियों को रंगने का काम किया करते थे .
यही काम करते वक़्त गुलज़ार साब को पढने लिखने का वक़्त मिल जाया करता था गुलज़ार साब हर रविवार को "प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन " की बैठक में जाया करते थे ,जहाँ उनकी उस ज़माने के बड़े साहित्यकारों के साथ मुलाक़ात और चर्चा होती इस दौरान उनकी गीतकार शैलेन्द्र ,शायर अली सरदार जाफरी ,लेखक कृष्ण चन्दर से अच्छी जान पहचान हो गयी इसी लिखने - पढने के माहौल का गुलज़ार साब की शख्सियत पर बहुत असर हुआ और गुलज़ार साब साहित्य की दुनिया में रमते चले गये .

साल 196२ में मशहूर फ़िल्मकार "बिमल रॉय
" अपनी नयी फ़िल्म बन्दिनी पर काम कर रहे थे फ़िल्म का संगीत निर्माण सचिन देव बर्मन के ज़िम्मे था ,वही गीत लिखने का काम गीतकार शैलेन्द्र कर रहे थे इसी बीच किसी बात को लेकर बर्मन दा और शैलेन्द्र में बहस हो गयी ,जिससे नाराज़ होकर शैलेन्द्र ने फ़िल्म छोड़ दी .
शैलेन्द्र जानते थे कि गुलज़ार साब की फ़िल्मों में रुचि है इसलिए उन्होंने गुलज़ार साब से कहा कि वो बिमल रॉय से जाकर मिलें और उनकी फ़िल्म में गीत लिखें गुलज़ार साब बिमल रॉय से मिलने पहुंचे और बिमल दा को सब बात बताई बिमल दा गुलज़ार साब से गीत लिखवाने के लिए तैयार हो गये ये बात एस .डी बर्मन साहब को अजीब लगी कि बिमल दा कैसे किसी नौसिखिये से फ़िल्म का गीत लिखवा सकते हैं खैर शैलेन्द्र जी के फ़िल्म छोड़ने से वैसे ही फ़िल्म बनने में देरी हो रही थी इसलिए बर्मन दा खामोश रहे .

बिमल दा ने गुलज़ार साब को फ़िल्म के उस सीन के हर पहलू से रूबरू कराया जिस पर उनको गीत लिखना था .गुलज़ार साहब ने वैष्णव भजन की बुनियाद पर गीत लिखा और उसे लेकर बिमल दा के पास गये .गीत बिमल दा को बहुत पसंद आया .बिमल दा ने जब गीत बर्मन दा को दिखाया तो वह भी गुलज़ार साब की प्रतिभा से प्रभावित हुए .गीत के बोल थे "मोरा गोरा अंग लई ले ,मोहे श्याम रंग दई दे " जिसे सुर सम्राज्ञी लता मंगेशकर ने अपनी आवाज़ दी .
बिमल दा एक बहुत ही पारखी नज़र रखने वाले इन्सान थे उन्होंने गुलज़ार साहब के हुनर को पहचान लिया था बिमल दा ने गुलज़ार साहब से उनके साथ काम करने के लिए कहा तो गुलज़ार साब बोले कि उन्हें फ़िल्मों में गीत लिखने में रुचि नहीं है ये बात सुनकर बिमल दा ने गुलज़ार साब से कहा कि तुम चाहे गीत मत लिखो मगर मैं तुम्हें उस मोटर गैराज़ में जाकर अपना जीवन बर्बाद करने नहीं दूंगा तुम यही मेरे साथ मेरी फ़िल्मों में बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर काम करो बिमल द़ा की बात सुनकर गुलज़ार साब भावुक हो गये और उनकी आँखों से आंसू निकल पड़े .उसके बाद गुलज़ार साब ने बिमल दा की कई फ़िल्मों में बतौर असिस्टेंट काम किया और उनकी फ़िल्मों में गीत भी लिखे .



