माता दुर्गा एवं जवारा का विसर्जन, आकर्षक आतिशबाजी के साथ किया जाएगा रावण के पुतले दहन, बस्तर में नहीं जलाया जाता रावण का पुतला
The immersion of Goddess Durga and 'Jawara' will take place, and the effigy of Ravana will be burnt amidst spectacular fireworks; however, in Bastar, the effigy of Ravana is not burnt.
गरियाबंद : तहसील मुख्यालय मैनपुर नगर में शारदीय नवरात्रि पर्व के समापन अवसर पर सर्वत्र भक्ति और श्रद्धा का माहौल छाया रहा. नगर में विराजित मां दुर्गा की प्रतिमा का वैदिक मंत्रोच्चार एवं पूरी निष्ठा व विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना कर विसर्जन किया गया. इसके साथ ही तालाबों में जवारा विसर्जन का दौर भी देर तक अनवरत चलता रहा.
सुबह से ही श्रद्धालुओं द्वारा मां दुर्गा की विशेष महाआरती की गई. तत्पश्चात बाजे-गाजे, ढोल-नगाड़ों और “जय माता दी” के गगनभेदी जयघोष के साथ शोभायात्रा निकाली गई. माता रानी के दर्शन के लिए मार्ग के दोनों ओर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी. दूसरी और दुर्गा मंदिर वन विभाग परिसर से जवारा विसर्जन शोभायात्रा निकाली गई पंडित योगेश शर्मा द्वारा विधि विधान से पूजा अर्चना किया गया.
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मैनपुर नगर में आकर्षक आतिशबाजी के साथ किया जाएगा रावण के पुतले दहन
गरियाबंद/मैनपुर : तहसील मुख्यालय मैनपुर नगर सहित पूरे अंचल में कल 20 अक्टूबर को असत्य पर सत्य की जीत का प्रतीक विजय दशमी (दशहरा) का पर्व अत्यंत धूमधाम और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा. पर्व को लेकर क्षेत्रवासियों में भारी उत्साह देखा जा रहा है.
मैनपुर नगर में सार्वजनिक दुर्गा उत्सव समिति द्वारा इस वर्ष भी विजय दशमी के पावन अवसर पर भव्य तैयारियां की गई हैं. समिति की ओर से नगर में एक विशाल रावण के पुतले का निर्माण किया गया है. रावण का पुतला का निर्माण गुमान पटेल एवं साथियों द्वारा किया जा रहा है. जिसका दहन कल शाम को आकर्षक और रंग-बिरंगी आतिशबाजी के साथ किया जाएगा. इस दौरान नगर सहित आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं व दर्शकों के पहुंचने की संभावना है.
मैनपुर नगर के साथ-साथ पूरे ग्रामीण अंचल में भी विजय दशमी का पर्व परम्परागत तरीके से मनाया जाएगा. इस अवसर पर कई गांवों में विशेष धार्मिक अनुष्ठान, मेलों और रामलीला के मंचन का आयोजन किया गया है. जिससे पूरे क्षेत्र का वातावरण राममय और भक्तिमय हो गया है. पर्व को शांतिपूर्ण और उत्साहपूर्ण माहौल में संपन्न कराने के लिए स्थानीय प्रशासन और समितियों द्वारा पुख्ता इंतजाम किए गए हैं.
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छत्तीसगढ़ के बस्तर में नहीं जलाया जाता रावण का पुतला
छत्तीसगढ़ के बस्तर में दशहरा करीब 75 दिनों तक मनाया जाता है। यहां देश के दूसरे हिस्सों की तरह रावण का पुतला नहीं जलाया जाता, बल्कि मां दंतेश्वरी की पूजा और आदिवासी परंपराओं के साथ यह पर्व मनाया जाता है.
बस्तर में इस त्योहार का स्वरूप अलग है. यहां मां दंतेश्वरी की आराधना होती है. आसपास के इलाकों से देवी-देवताओं के प्रतिनिधि भी इस आयोजन में शामिल होते हैं. आदिवासी समाज की मान्यताएं और रीति-रिवाज इस उत्सव का अहम हिस्सा हैं.
भारत में कई ऐसे स्थान हैं जहां दशहरे पर रावण के पुतले का दहन नहीं किया जाता, बल्कि उसकी पूजा की जाती है या उसे सम्मान दिया जाता है.
प्रमुख स्थान और उनके कारण
• देवघर (झारखण्ड): मान्यता है कि रावण भगवान शिव का परम भक्त था और उसी के कारण बाबा बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग यहां स्थापित हुआ था. इसलिए यहां उसका पुतला नहीं जलाया जाता है.
• बिसरख (उत्तर प्रदेश): इसे रावण की जन्मभूमि माना जाता है और यहां के लोग उसे अपना पूर्वज मानते हैं, इसलिए यहां पुतला दहन नहीं होता है.
• मंदसौर (मध्य प्रदेश): इसे रावण की पत्नी मंदोदरी का मायका (ननिहाल) माना जाता है. जिससे रावण यहां का दामाद है. यहां दशहरे पर शोक मनाया जाता है और उसकी पूजा होती है.
• नटेरन (विदिशा, मध्य प्रदेश): यहां रावण को 'रावण बाबा' के रूप में ग्राम देवता मानकर पूजा जाता है और उसकी लेटी हुई प्रतिमा है.
• बैजनाथ (कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश): शिवभक्ति के सम्मान में यहां रावण का पुतला नहीं जलाया जाता है.
• रोपा (भीलवाड़ा, राजस्थान): यहां 100 साल पुरानी सीमेंट की प्रतिमा का तीर-कमान से सांकेतिक वध किया जाता है. पुतला नहीं जलाया जाता है.
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