SIR पर दो चुनाव आयुक्तों ने 10 महीने में 14 बार आपत्ति दर्ज कराई, फॉर्म-6 में बदलाव पर भी दी चेतावनी, वोटर लिस्ट से 13 करोड़ से ज्यादा नाम हटाए गए!
Two Election Commissioners raised objections 14 times in 10 months regarding the SIR; they also issued warnings about changes to Form-6, and over 13 crore names were removed from the voter list!
नई दिल्ली : भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) ने जून 2025 में बिहार से ‘स्पेशल इंटेंसिव रिविजन’ (SIR) के तहत वोटर लिस्ट के संशोधन की प्रक्रिया शुरू की. एसआईआर के तहत 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से 13 करोड़ से ज्यादा नाम हटाए गए.
एसआईआर को लेकर चुनाव आयोग की आलोचना भी हुई और सवाल उठा कि यह कैसे तय किया जा रहा है कि कौन वोट देगा और कौन नहीं.
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की पड़ताल में एसआईआर प्रक्रिया और इसे लेकर निर्वाचन आयोग के अन्दर उठी असहमतियों के बारे में अहम जानकारियां सामने आई हैं.
सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने उठाए सवाल
चुनाव आयोग में तीन सदस्य होते हैं. इनमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी शामिल हैं.
इंडियन एक्सप्रेस की जाँच में पता चला है कि इस प्रक्रिया के दौरान चुनाव आयोग के भीतर ही इसे लेकर सवाल उठाए गए. ये सवाल तीन में से दो चुनाव आयुक्तों- सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने उठाए थे.
एसआईआर को पूरे देश में लागू करने का काम तीनों चुनाव आयुक्तों की देखरेख में हुआ लेकिन संधू और जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार इसे लेकर आधिकारिक तौर पर आपत्ति जताई. इसमें एक ही दिन में चार बार इन फैसलों और आदेशों को लेकर आपत्ति दर्ज कराई गई थी.
संधू और जोशी के मुताबिक, ये फैसले या आदेश उनकी जानकारी के बिना लिए या जारी किए गए थे.
चुनाव आयुक्तों की क्या आपत्तियां थीं?
चुनाव आयुक्तों की ये आपत्तियां चुनाव आयोग के मुख्य काम से जुड़ी थीं. जैसे- नए वोटर का रजिस्ट्रेशन, वोटर लिस्ट से नाम हटाना और फिर से जोड़ना, एसआईआर प्रक्रिया में वोटर का नाम बहाल करने के आदेशों के खिलाफ अपील करना और पूरी वोटर लिस्ट की सुरक्षा.
इन सभी आपत्तियों की कॉपी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को भी भेजी गई थीं. कुछ आपत्तियां डिप्टी चुनाव आयुक्तों को भी भेजी गई थीं.
ऐसी ही एक लिखित आपत्ति में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने शिकायत की कि चुनाव आयोग ने दो आयुक्तों की लिखित सलाह के खिलाफ काम किया और दावा किया कि यह कदम ‘अनाधिकृत और गैर-कानूनी’ था.
इसके बाद भी जोशी और संधू ने कैबिनेट सचिव को अलग-अलग पत्र लिखकर काम के बंटवारे में किए गए बदलावों की शिकायत की. इन बदलावों से असल में वोटर लिस्ट के लिए आईटी सिस्टम की निगरानी का एक स्तर खत्म हो गया था. दोनों चुनाव आयुक्तों ने साफ कहा- ये बदलाव उनकी जानकारी के बिना किए गए थे और उन्होंने इन्हें रद्द कर दिया.
इसके बाद, 9 सितंबर को मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों की बैठक हुई. चार महीनों में यह उनकी पहली बैठक थी.
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने इस मामले की पड़ताल के दौरान सभी आपत्तियों को देखा और नई दिल्ली, कोलकाता, गोवा और मुंबई में कई अफसरों से बात की. इसका मकसद यह समझना था कि देश में निष्पक्ष चुनाव कराने की संवैधानिक जिम्मेदारी संभालने वाले इस संस्थान के भीतर क्या चल रहा था?
यह बात और भी अहम इसलिए है क्योंकि इन तीनों चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति एनडीए सरकार ने ही की थी. इनकी नियुक्ति 2023 के कानून के तहत प्रधानमंत्री, केंद्रीय गृह मंत्री और विपक्ष के नेता वाले एक सलेक्शन पैनल ने की थी.
चुनाव आयोग के अंदर पहले भी अफ़सरों के बीच मतभेद हुए हैं, लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है जब दो चुनाव आयुक्तों ने लिखित में सीधे चुनाव प्रक्रिया के सबसे ज़रूरी हिस्सों पर सवाल उठाए हैं.
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राहुल गांधी, अधीर रंजन चौधरी ने दर्ज कराई थी असहमति
मार्च, 2024 में जब सुखबीर सिंह संधू और ज्ञानेश कुमार को चुनाव आयुक्त बनाया गया था. तब कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने नियुक्ति प्रक्रिया पर अपनी असहमति दर्ज कराई थी. फरवरी, 2025 में लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने भी ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त बनाए जाने और विवेक जोशी की चुनाव आयुक्त के रूप में नियुक्ति पर असहमति दर्ज कराई थी.
फॉर्म 6 में किए गए बदलावों को लेकर चुनाव आयुक्तों- सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की चेतावनी एकदम साफ थी लेकिन फिर भी इसे नजरअंदाज कर दिया गया.
21 सितंबर को ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने चुनाव आयोग को कुछ सवाल भेजे और पूछा कि दोनों चुनाव आयुक्तों द्वारा उठाए गए मुद्दों और उनकी चिंताओं को दूर करने के लिए क्या किया गया? लेकिन अखबार को कोई जवाब नहीं मिला। 21 सितंबर को दोनों चुनाव आयुक्तों को ई-मेल भी भेजा गया. जिसमें पूछा गया कि क्या उनकी चिंताओं को हल किया गया?
ई-मेल में यह भी पूछा गया था कि क्या 9 सितंबर की बैठक में इन मुद्दों को उठाया गया था? ई-मेल के बाद सोमवार और मंगलवार को फोन भी किए लेकिन कोई जवाब नहीं मिला.
चुनाव आयुक्तों की आपत्तियां
| क्रम संख्या | तारीख | आपत्ति दर्ज करने वाले | क्या थी आपत्ति? |
|---|---|---|---|
| 1. | 28 अक्टूबर 2025 | सुखबीर सिंह संधू | आयोग की मंजूरी के बिना चुनाव आयोग के नाम से पत्र और आदेश जारी किए गए। |
| 2. | 16 अप्रैल 2026 | सुखबीर सिंह संधू | नए आईटी मॉड्यूल और पोर्टल के बारे में उन्हें मीडिया से जानकारी मिली। |
| 3. | 16 अप्रैल 2026 | सुखबीर सिंह संधू | आयोग की मंजूरी के बिना संदेश जारी किए गए। |
| 4. | 16 अप्रैल 2026 | विवेक जोशी | एक साल से अधिक समय से आयोग की बैठकों के बाद मिनट्स जारी किए जा रहे थे लेकिन अगली बैठक का एजेंडा पहले उपलब्ध नहीं कराया जा रहा था। |
| 5. | 16 अप्रैल 2026 | विवेक जोशी | आयोग की मंजूरी के बिना अधिकारियों को विदेश यात्राओं पर भेजा जा रहा था। |
| 6. | 24 अप्रैल 2026 | विवेक जोशी | विवेक जोशी ने दोहराया कि आयोग की मंजूरी के बिना कोई आधिकारिक संदेश जारी नहीं होने चाहिए। |
| 7. | 16 मई 2026 | विवेक जोशी | सरकार की मंजूरी के बिना नए मतदाताओं के लिए फॉर्म 6 में बदलाव नहीं किया जाना चाहिए। संधू ने 19 मई को इस पर सहमति जताई। |
| 8. | 29 मई 2026 | विवेक जोशी | चेतावनी दी कि मतदाता सूची के डेटाबेस को केंद्रीकृत किया जा रहा है और इसका ऑडिट जरूरी है। |
| 9. | 29 जुलाई 2026 | जोशी ने कैबिनेट सचिव को | एक अधिकारी आयोग की जानकारी के बिना काम का बंटवारा कर रहा था। |
| 10. | 29 जुलाई 2026 | संधू ने कैबिनेट सचिव को | काम के आवंटन से जुड़े मुद्दे को दोहराया और संबंधित अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। |
| 11. | 30 जुलाई 2026 | जोशी और संधू ने | दोनों चुनाव आयुक्तों ने काम के आवंटन से जुड़े एक आदेश को रद्द कर दिया। |
| 12. | 12 अगस्त 2026 | सुखबीर सिंह संधू | पश्चिम बंगाल के ट्रिब्यूनल के सामने चुनाव आयोग की ओर से अपील करने की अनुमति किसने दी? |
| 13. | 13 अगस्त 2026 | सुखबीर सिंह संधू | फॉर्म 6 में बदलाव को ‘अनाधिकृत और गैरकानूनी’ बताया। |
| 14. | 14 अगस्त 2026 | सुखबीर सिंह संधू | फील्ड अफसरों को ECINET सिस्टम तक पहुंच नहीं मिल रही थी। डीजी (आईटी) के पास इसे प्रतिबंधित करने का अधिकार नहीं है |
चुनाव आयुक्तों की ओर से दर्ज कराई गई ये आपत्तियां किसी संवैधानिक संस्था के भीतर चल रहे मतभेदों को दिखाती हैं और इसमें चार बड़े सवाल सामने आए हैं
पहला सवाल- “नया वोटर” कौन है, और फॉर्म-6 क्यों बदला गया?
इस साल जुलाई में, ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने सबसे पहले बताया था कि वोटर बनने के लिए 18 साल से ऊपर के शख्स को जो फॉर्म भरना होता है, उसमें एक ऐसा सवाल पूछा जाने लगा जो पहले कभी नहीं पूछा गया था.
सवाल यह था कि क्या नया वोटर या उसके माता-पिता/दादा-दादी इससे पहले हुए एसआईआर की मतदाता सूची में मौजूद थे. इस सवाल का जवाब देना जरूरी था. लेकिन इस साल मई में चुनाव आयुक्त जोशी ने फाइल पर लिखकर इस बात की चेतावनी दी थी कि सरकार द्वारा नियमों में बदलाव किए बिना फॉर्म-6 को इस तरह नहीं बदला जा सकता और संधू ने भी इस बात पर सहमति जताई थी। फिर भी यह बदलाव किया गया.
जुलाई में ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की ओर से इस बदलाव की खबर दिए जाने के बाद सुखबीर सिंह संधू ने 13 अगस्त को रिकॉर्ड पर कहा कि यह “अनधिकृत और गैरकानूनी” था और कहा कि इसे तुरंत हटाया जाना चाहिए। सोमवार सुबह तक, वह सवाल वहीं मौजूद था.
दूसरा सवाल – वोटर लिस्ट तक किसकी पहुंच होनी चाहिए?
वोटर लिस्ट में गड़बड़ी के हर राजनीतिक आरोप के खिलाफ चुनाव आयोग का सबसे मजबूत जवाब यह रहा है कि वोटर लिस्ट तैयार करने का काम विकेंद्रीकृत (decentralised) है. हर चुनाव क्षेत्र की वोटर लिस्ट वहां के इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ईआरओ) द्वारा तैयार की जाती है.
आमतौर पर, ईआरओ सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट (एसडीएम) होता है. यह वोटर लिस्ट ERONet और उसके बाद आए ECINet सॉफ्टवेयर पर मौजूद होती है. पिछले एक साल में, दोनों चुनाव आयुक्तों ने बार-बार सवाल उठाया है कि क्या अब ईआरओ की इस लिस्ट तक पहुंच सीमित की जा रही है.
विवेक जोशी ने मई में क्या कहा था?
इसी बात पर विवेक जोशी ने इस साल मई में चिंता जताई थी. इस दौरान अलग-अलग राज्यों में एसआईआर का काम तेजी से चल रहा था. इसे “वोटर लिस्ट डेटाबेस का धीरे-धीरे केंद्रीकरण” बताया था और एक ऑडिट का प्रस्ताव दिया गया था. ताकि यह तय किया जा सके कि संबंधित वैधानिक अधिकारियों के अलावा किसी और के पास वोटर डेटाबेस में कोई बदलाव करने का अधिकार नहीं हो.
अगस्त में चुनाव आयुक्त संधू ने भी यही बात दोहराई. उन्होंने बताया कि राज्य स्तरीय चुनाव अधिकारी इस बात की रिपोर्ट कर रहे थे कि उन्हें ERONet पोर्टल तक पूरी और सही पहुंच नहीं मिल रही है. उन्होंने इस बात की ओर भी ध्यान दिलाया कि चुनाव आयोग की आईटी डायरेक्टर जनरल सीमा खन्ना के पास कानून द्वारा वैधानिक अधिकारियों को दी गई पहुंच और काम करने की आजादी को सीमित करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है.
दोनों चुनाव आयुक्तों का कहना था कि चुनाव आयोग की दशकों पुरानी व्यवस्था को उसके अपने ही आईटी विभाग से खत्म किया जा रहा है.
तीसरा सवाल- पश्चिम बंगाल में अपील करने की इजाजत किसने दी?
पश्चिम बंगाल में एसआईआर को लेकर सबसे ज्यादा विवाद हुआ। चुनाव के नतीजों पर इसकी भूमिका का कोई सबूत नहीं मिला. जिन 294 सीटों पर चुनाव हुए, उनमें से 49 सीटों पर एसआईआर के तहत हटाए गए नामों की संख्या जीत के अंतर से ज्यादा थी लेकिन इन सीटों पर बीजेपी और टीएमसी की जीत लगभग बराबर हुई। 26 सीटें बीजेपी ने और 21 सीटें टीएमसी ने जीतीं.
सुप्रीम कोर्ट ने क्या किया?
जिस तरह से एसआईआर की प्रक्रिया के जरिये नाम हटाए गए, उससे सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी, 2026 में एसआईआर के आखिरी चरण को चुनाव आयोग से ले लिया और “लॉजिकल गड़बड़ियों” के कारण चिह्नित किए गए 60 लाख वोटरों के मामले पर फैसला करने का काम न्यायिक अधिकारियों को सौंप दिया. इनमें से 27 लाख वोटरों के नाम बाद में चुनाव आयोग ने हटा दिए. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि हाई कोर्ट के रिटायर्ड जजों के ट्रिब्यूनल हटाए गए नामों के खिलाफ की गई.
पिछले हफ्ते, चुनाव आयोग ने अदालत को बताया कि ट्रिब्यूनल के पास 38 लाख अपीलें लंबित हैं। इसमें से 22.21 लाख अपीलें उन वोटरों ने दायर की थीं जिनके नाम हटा दिए गए थे और जो उन्हें वापस जुड़वाना चाहते थे. बाकी 16.10 लाख अपीलें उन वोटरों के खिलाफ दायर की गई थीं जिन्हें न्यायिक अधिकारियों ने लिस्ट में शामिल किया था और इन अपीलों में उनके नाम हटाने की मांग की गई थी. चुनाव आयोग ने यह नहीं बताया कि ये अपीलें किसने दायर की थीं.
यही वह मुद्दा था जिसे चुनाव आयुक्त संधू ने उठाया था कि चुनाव आयोग उन वोटरों के खिलाफ अपील कर रहा था जिन्हें न्यायिक अधिकारियों ने लिस्ट में शामिल किया था.
अगस्त में, संधू ने चुनाव आयोग के अधिकारियों को पत्र लिखकर पूछा था, “आयोग की तरफ से ये अपीलें दायर करने की इजाजत किसे थी और किसने दी थी? आयोग की तरफ से असल में ये अपीलें किसने दायर की?”
संधू ने यह भी कहा कि न तो उन्हें, न जोशी को और न ही पश्चिम बंगाल के मौजूदा मुख्य चुनाव अधिकारी को अपील दायर करने के आधार या प्रक्रिया के बारे में जानकारी दी गई थी.
चौथा सवाल- गोवा में सॉफ्टवेयर ने पात्र मतदाताओं को क्यों लिस्ट से बाहर रखा?
जोशी और संधू ने सेंट्रलाइजेशन यानी केंद्रीकरण को लेकर बार-बार सवाल उठाए थे. यही गोवा में वोटरों को वोट देने के अधिकार से वंचित करने का कारण बना. 29 जनवरी को, सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि एसआईआर के दौरान “लॉजिकल गड़बड़ियों” के लिए चिह्नित वोटरों को डॉक्यूमेंट जमा करने और फाइनल वोटर लिस्ट पब्लिश होने से पहले अपनी बात रखने का मौका दिया जाए.
“लॉजिकल गड़बड़ी” एक तरह का मिसमैच (मेल न खाना) है। जब सॉफ्टवेयर किसी मतदाता के नाम को उसके माता-पिता या रिश्तेदार के पुराने मतदाता रिकॉर्ड से जोड़ने की कोशिश करता है और उसमें कोई गड़बड़ी मिलती है, तो इसे ही “लॉजिकल गड़बड़ी” कहा जाता है. जैसे- जैसे नाम का मेल न खाना या उम्र का अंतर सही न होना.
गोवा के EROs ने इन मामलों की सुनवाई की. पेश किए गए दस्तावेजों के आधार पर, उन्होंने 97 वोटरों को फाइनल वोटर लिस्ट में शामिल करने के योग्य पाया। सॉफ्टवेयर में उस फैसले को रिकॉर्ड करने का कोई तरीका नहीं था.
11 से 17 फरवरी के बीच, गोवा के मुख्य चुनाव अधिकारी के ऑफिस ने राज्य के प्रभारी और वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त ज्ञानेश भारती को आठ बार पत्र लिखा. हर बार आईटी विभाग की डायरेक्टर जनरल सीमा खन्ना को भी इसकी कॉपी भेजी गई. इन पत्रों में ‘रोलबैक’ विकल्प की मांग की गई थी. जिससे EROs सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार पहले हटाए गए नामों को वापस जोड़ सकें.
फाइनल वोटर लिस्ट जारी करने की समय-सीमा नजदीक आने के बावजूद इस बारे में किए गए अनुरोधों का कोई जवाब नहीं मिला। यह प्रावधान समय पर लागू नहीं किया जिस वजह से गोवा में अंतिम वोटर लिस्ट से 97 लोगों के नाम छूट गए थे.
97 वोटर भले ही छोटी संख्या है लेकिन मामला सिर्फ 97 लोगों तक सीमित नहीं है. भारत के चुनाव आयोग की यह जिम्मेदारी है कि वह इस बात को सुनिश्चित करे कि हर सही वोट की गिनती हो.
चुनाव आयोग अनुच्छेद 324 के तहत एक संवैधानिक संस्था है, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त होते हैं। तीनों का दर्जा बराबर होता है. मुख्य चुनाव आयुक्त इसमें सबसे ऊपर होते हैं लेकिन उनके पास अकेले फैसला लेने का अधिकार नहीं होता है.
2023 का कानून क्या कहता है?
मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 की धारा 18 के अनुसार, आयोग के सभी काम जहां तक संभव हो, सर्वसम्मति से किए जाने चाहिए.
अगर मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की किसी मामले पर राय अलग-अलग होती है तो उस मामले का फैसला बहुमत की राय के आधार पर किया जाएगा. यही धारा आयोग को अपनी प्रक्रिया और काम के बंटवारे को तय करने की अनुमति देती है. लेकिन केवल सर्वसम्मति से लिए गए फैसले से.
असल में, दोनों चुनाव आयुक्तों ने आयोग के अधिकारियों को यह याद दिलाने के लिए अपनी टिप्पणियों में इन प्रावधानों का जिक्र किया कि आयोग को कैसे काम करना चाहिए। 16 अप्रैल को, संधू ने आयोग के वरिष्ठ अधिकारियों से कहा कि चुनाव आयोग के नाम से कई संदेश भेजे जाते हैं. लेकिन उन्हें आयोग की ही मंजूरी नहीं मिली होती और अब से हर संदेश में यह मंजूरी होनी चाहिए.
इसके आठ दिन बाद, विवेक जोशी ने उन्हीं अधिकारियों से कहा कि चुनाव आयोग के नाम से कई संदेश आयोग की जरूरी मंजूरी के बिना भेजे जाते हैं. जोशी ने कहा कि भविष्य में भेजे जाने वाले सभी संदेश, संविधान के अनुच्छेद 324 और 2023 के कानून के प्रावधानों के अनुसार आयोग की मंजूरी से जारी होने चाहिए.
कौन हैं सुखबीर सिंह संधू?
सुखबीर सिंह संधू ने 15 मार्च 2024 को चुनाव आयुक्त के रूप में कार्यभार संभाला था. उत्तराखंड कैडर के 1988 बैच के आईएएस अफसर संधू ने जुलाई 2021 से जनवरी 2024 तक उत्तराखंड के मुख्य सचिव के रूप में काम किया है. इससे पहले 2019 से 2021 तक, वह भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) के अध्यक्ष थे. फरवरी 2024 में, उन्होंने कुछ समय के लिए लोकपाल के सचिव के रूप में काम किया. संधू हरिद्वार, गौतम बुद्ध नगर (नोएडा) और उधम सिंह नगर जिलों के कलेक्टर भी रहे. उन्होंने 2007 और 2014 के बीच तीन राजनीतिक दलों के चार मुख्यमंत्रियों के प्रमुख सचिव के रूप में काम संभाला. संधू ने गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज, अमृतसर से एमबीबीएस किया है और गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर से इतिहास में मास्टर डिग्री प्राप्त की है. वह लॉ ग्रेजुएट भी हैं.
कौन हैं विवेक जोशी?
विवेक जोशी ने 19 फरवरी, 2025 को चुनाव आयुक्त के रूप में कार्यभार संभाला था. हरियाणा कैडर के 1989 बैच के आईएएस अफसर जोशी हरियाणा के मुख्य सचिव रह चुके हैं. वह वस्त्र, महिला एवं बाल विकास और वित्त मंत्रालयों में भी काम कर चुके हैं. विवेक जोशी हरियाणा के जींद, हिसार और पंचकूला के डिप्टी कमिश्नर तथा अंबाला के डिवीजनल कमिश्नर रहे हैं. जोशी भारतीय रिजर्व बैंक और भारतीय स्टेट बैंक के बोर्ड मेंबर रह चुके हैं. जोशी के पास ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट, जिनेवा से इंटरनेशनल इकोनॉमिक्स में पीएचडी और आईआईटी रुड़की से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बी.ई. (1987) की डिग्री है.
अभिजीत दीपके चुनाव आयोग पर फायरः SIR पर मचे बवाल पर ज्ञानेश कुमार पर गंभीर आरोप लगाए, भारत का दुश्मन करार दिया
वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिविजन यानी एसआईआर को लेकर चुनाव आयोग में मतभेद पर इंडियन एक्सप्रेस की खुलासे के बाद बवाल मच गया है. पूरा विपक्ष इसे लेकर मोदी सरकार और सीईसी ज्ञानेश कुमार पर निशाना साध रही है. इसी बीच कांग्रेस जनता पार्टी यानी सीजेपी फाउंडर अभिजीत दीपके चुनाव आयोग (election Commission) पर भड़कते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को भारत का दुश्मन करार दिया.
अभिजीत दीपके ने S.I.R को Special Intensive Rigging (स्पेशल इंटेंसिव हेराफेकी) कहा. दीपके ने सोशल मीडिया एक्स पर लिखा- ज्ञानेश कुमार भारत के दुश्मन हैं, खबर है कि वोटर लिस्ट से 12 करोड़ से ज़्यादा नाम हटा दिए गए हैं. यह 2024 के लोकसभा चुनाव के आस-पास 97 करोड़ रजिस्टर्ड वोटर्स का लगभग 12.4% है। BJP की लीडरशिप वाली NDA और विपक्ष के बीच सिर्फ़ 2% का गैप था। ज्ञानेश कुमार चुनाव नहीं करा रहे हैं, बल्कि उन्हें लिख रहे हैं.
सीजेपी नेता दीपके ने आगे कहा कि बीजेपी के नेतृत्व वाले NDA और विपक्ष के बीच का अंतर सिर्फ 2 फीसदी था. मुख्य चुनाव आयुक्त पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि ज्ञानेश कुमार चुनाव करवा नहीं रहे हैं. बल्कि वे चुनाव की स्क्रिप्ट लिख रहे हैं. इसके अलावा एक अन्य पोस्ट में अभजीत दीपके ने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को Special Intensive Rigging (विशेष गहन हेराफेरी) करार दिया है. इससे पहले सीजेपी नेता आशुतोष रांका ने भी ज्ञानेश कुमार पर निशाना साधा. उन्होंने कहा कि जब इस देश का इतिहास लिखा जाएगा, तो लोकतंत्र को बर्बाद करने में शामिल लोगों की लिस्ट में ज्ञानेश कुमार काफी ऊपर होंगे. एसआईआर प्रक्रिया के मामले को लेकर अब पूरा विपक्ष चुनाव आयोग पर हमलावर है.
चुनाव आयुक्त लिखित शिकायत दी
एक लिखित शिकायत में संधू ने कहा है कि EC ने दो कमिश्नरों की लिखित सलाह के खिलाफ काम किया और दावा किया कि उनका यह कदम “बिना अधिकार के और गैर-कानूनी” था. हाल ही में, आम तौर पर अपनाए जाने वाले तरीकों से हटकर, जोशी और संधू ने अलग-अलग कैबिनेट सेक्रेटरी को काम के बंटवारे में हुए बदलावों के बारे में शिकायत की. इन बदलावों से असल में वोटर लिस्ट के लिए IT सिस्टम की निगरानी का एक स्तर खत्म हो गया था. उन्होंने साफ कहा कि ये बदलाव उनकी जानकारी के बिना किए गए थे. उन्होंने इन्हें रद्द कर दिया.
तीन चुनाव आयुक्तों का पैनल है चुनाव आयोग
बता दें कि चुनाव आयोग के बड़े फैसले मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ, दो अन्य चुनाव आयुक्तों का पैनल लेता है. इनमें से दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने एपआईआर में लिए फैसले पर आपत्तियां जताई है. मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार हैं. एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, एसआईआर प्रक्रिया के दौरान कई मसलों पर दो चुनाव आयुक्तों ने अपनी आपत्तियां जताई. उन्होंने 10 महीनों में 14 बार आपत्तियां दर्ज कराईं. चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने नए वोटरों को जोड़ने और नाम हटाने से लेकर जानकारी छिपाने पर सवाल उठाए हैं. दोनों की आपत्तियों को नजरअंदाज किया गया और फैसले आयोग के सामने बहुमत के आधार पर नहीं रखे गए.
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