विनायक दामोदर सावरकर ने अंग्रेजों को दी 10 दया याचिकाएं, भगत सिंह जैसे क्रांतिकारी रहे उसूलों पर अडिग, कोर्ट में पोते सत्यकी सावरकर ने दिया बड़ा बयान
Vinayak Damodar Savarkar submitted 10 mercy petitions to the British, whereas revolutionaries like Bhagat Singh remained steadfast in their principles; his grandson, Satyaki Savarkar, made a significant statement in court.
पुणे : 15 जून को दक्षिणपंथी विचारक विनायक दामोदर सावरकर के पोते सत्यकी सावरकर ने पुणे की एक विशेष सांसद/विधायक अदालत के सामने बड़ा बयान दिया है. मानहानि के एक मामले में गवाही देते हुए सत्यकी ने खुद कबूल किया कि उनके दादा वी.डी. सावरकर ने अपनी सजा कम कराने के लिए तत्कालीन ब्रिटिश सरकार के सामने 10 बार दया याचिकाएं दायर की थीं। इसके साथ ही उन्होंने अदालत में यह भी कहा कि उसी दौर के दुसरे स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के सामने झुकने या दया याचिका दायर करने से साफ इंकार कर दिया था. जिसमें भगत सिंह का नाम सबसे ऊपर है.
राहुल गांधी के खिलाफ मानहानि मामले में हुई जिरह
लाइव लॉ के मुताबिक सत्यकी सावरकर ने यह खुलासे विशेष जज अमोल शिंदे की अदालत में अपनी जिरह के दौरान किया. दरअसल सत्यकी ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ एक आपराधिक मानहानि का मामला दर्ज कराया है. उनका आरोप है कि राहुल गांधी ने लंदन में दिए अपने एक भाषण में उनके दादा वीर सावरकर को बदनाम किया था. इसी मामले की सुनवाई के दौरान राहुल गांधी के वकील मिलिंद पवार ने अदालत में सत्यकी से तीखे सवाल-जवाब किया.
अदालत में सत्यकी सावरकर का बड़ा बयान:
10 बार दया याचिका की बात मानी: सत्यकी ने अदालत के सामने कबूल किया कि यह कहना सही है कि सावरकर ने दस बार दया याचिका दायर की थी. जब ये याचिकाएं दायर की गईं, तब भी उन्हें 'वीर' कहा जाता है. हालांकि उन्होंने इस बात से इंकार किया कि दया याचिका दायर करने वाले व्यक्ति को 'वीर' कहना विरोधाभास है.
भगत सिंह और अन्य क्रांतिकारियों का जिक्र: जिरह के दौरान सत्यकी ने कहा कि यह सच है कि उसी दौर के अन्य क्रांतिकारी जैसे राजगुरु, बटुकेश्वर दत्त और अशफाकउल्ला खान ने कोई दया याचिका दायर नहीं की थी. मुझे यह जानकारी नहीं थी कि भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने ब्रिटिश सरकार को पत्र लिखकर खुद को युद्ध बंदी मानने की मांग की थी और किसी भी तरह की रियायत या नरमी सेइंकार कर दिया था. लेकिन मैं यह जानता हूँ कि भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त आखिर तक अपनी विचारधारा और सिद्धांतों पर अडिग रहे और उन्होंने अंग्रेजों के साथ कोई समझौता नहीं किया.
सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज हैं दस्तावेज: सत्यकी ने बताया कि सावरकर द्वारा दायर की गई इन 10 दया याचिकाओं के रिकॉर्ड आज भी आधिकारिक सरकारी दस्तावेजों में सुरक्षित हैं.
"यह अंग्रेजों के प्रति वफादारी नहीं थी"
लाइव लॉ के मुताबिक जब राहुल गांधी के वकील ने याचिकाओं की भाषा को लेकर सवाल उठाए तो सत्यकी ने अपने दादा का बचाव करते हुए कहा कि दया याचिका दायर करना उस समय की एक सामान्य आधिकारिक प्रक्रिया थी. सत्यकी ने अदालत से कहा: "दया याचिका दायर करना ब्रिटिश शासन के तहत सजा कम कराने की एक मानक प्रक्रिया थी. और बाद में उन्हें अंग्रेजों ने छोड़ दिया और उनकी माहवारी पेंशन भी बांध दी. यही उन्हें अंग्रेजों से हर महीने पैसा मिलता था.
आरोपों में घिरा है आरएसएस
आरएसएस सावरकर की विचारधारा से प्रभावित है. वो उनको अपना आदर्श मानता है. महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे भी सावरकर को अपना आदर्श मानता था. इस समय आरएसएस के पास अथाह चंदा (डोनेशन) आने का मामला चर्चा में है. कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांक खड़गे ने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को पत्र लिखा है. इसमें उन्होंने संगठन से अपने कानूनी दर्जे, रजिस्ट्रेशन, फंडिंग के स्रोत और खर्च का पूरा ब्योरा देने को कहा है. प्रियांक खड़गे ने लिखा है कि आरएसएस बहुत बड़ा संगठन है. इसकी 60 हज़ार से ज्यादा शाखाएं चल रही हैं. इतना बड़ा संगठन कानून से ऊपर नहीं रह सकता.
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मिडिया रिओर्ट के मुताबिक अपनी याचिका विनायक दामोदर सावरक में उन्होंने अंग्रेज़ों से यह वादा किया कि ‘यदि मुझे छोड़ दिया जाए तो मैं भारत के स्वतंत्रता संग्राम से ख़ुद को अलग कर लूंगा और ब्रिट्रिश सरकार के प्रति अपनी वफ़ादारी निभाउंगा.’ अंडमान जेल से छूटने के बाद उन्होंने यह वादा निभाया भी और कभी किसी क्रांतिकारी गतिविधि में न शामिल हुए, न पकड़े गए.
वी. डी. सावरकर ने 1913 में एक याचिका दाख़िल की, जिसमें उन्होंने अपने साथ हो रहे तमाम सलूक का ज़िक्र किया और अंत में लिखा, ‘हुजूर, मैं आपको फिर से याद दिलाना चाहता हूं कि आप दयालुता दिखाते हुए सज़ा माफ़ी की मेरी 1911 में भेजी गई याचिका पर पुनर्विचार करें और इसे भारत सरकार को फॉरवर्ड करने की अनुशंसा करें. भारतीय राजनीति के ताज़ा घटनाक्रमों और सबको साथ लेकर चलने की सरकार की नीतियों ने संविधानवादी रास्ते को एक बार फिर खोल दिया है. अब भारत और मानवता की भलाई चाहने वाला कोई भी व्यक्ति, अंधा होकर उन कांटों से भरी राहों पर नहीं चलेगा, जैसा कि 1906-07 की नाउम्मीदी और उत्तेजना से भरे वातावरण ने हमें शांति और तरक्की के रास्ते से भटका दिया था.’
अपनी याचिका में सावरकर लिखते हैं, ‘अगर सरकार अपनी असीम भलमनसाहत और दयालुता में मुझे रिहा करती है, मैं आपको यक़ीन दिलाता हूं कि मैं संविधानवादी विकास का सबसे कट्टर समर्थक रहूंगा और अंग्रेज़ी सरकार के प्रति वफ़ादार रहूंगा, जो कि विकास की सबसे पहली शर्त है. जब तक हम जेल में हैं, तब तक महामहिम के सैकड़ों-हजारों वफ़ादार प्रजा के घरों में असली हर्ष और सुख नहीं आ सकता, क्योंकि ख़ून के रिश्ते से बड़ा कोई रिश्ता नहीं होता. अगर हमें रिहा कर दिया जाता है, तो लोग ख़ुशी और कृतज्ञता के साथ सरकार के पक्ष में, जो सज़ा देने और बदला लेने से ज़्यादा माफ़ करना और सुधारना जानती है, नारे लगाएंगे.’
याचिका के अगले हिस्से में वे और भारतीयों को भी सरकार के पक्ष में लाने का वादा करते हुए लिखते हैं, ‘इससे भी बढ़कर संविधानवादी रास्ते में मेरा धर्म-परिवर्तन भारत और भारत से बाहर रह रहे उन सभी भटके हुए नौजवानों को सही रास्ते पर लाएगा, जो कभी मुझे अपने पथ-प्रदर्शक के तौर पर देखते थे. मैं भारत सरकार जैसा चाहे, उस रूप में सेवा करने के लिए तैयार हूं, क्योंकि जैसे मेरा यह रूपांतरण अंतरात्मा की पुकार है, उसी तरह से मेरा भविष्य का व्यवहार भी होगा. मुझे जेल में रखने से आपको होने वाला फ़ायदा मुझे जेल से रिहा करने से होने वाले होने वाले फ़ायदे की तुलना में कुछ भी नहीं है. जो ताक़तवर है, वही दयालु हो सकता है और एक होनहार पुत्र सरकार के दरवाज़े के अलावा और कहां लौट सकता है. आशा है, हुजूर मेरी याचनाओं पर दयालुता से विचार करेंगे.’
ऐसी गतिविधियों में लिप्त और दया की मांग करता हुआ ऐसा माफ़ीनामा डालने वाले सावरकर ‘वीर’ कैसे कहे जा सकते हैं, जिन्होंने सुभाष चंद्र बोस के उलट अंग्रेज़ी फ़ौज के लिए भारतीयों की भर्ती में मदद की ? सावरकर का योगदान यही है कि उन्होंने भारत में हिंदुत्व की वह विचारधारा दी जो लोकतंत्र के उलट एक धर्म के वर्चस्व की वकालत करती है.
दुनिया के इतिहास में कहीं भी माफीनामे लिखने वाले गद्दारों को सम्मान नहीं दिया गया. भारत इस मामले में एक अनूठा देश है जहां लालची, जिन्दगी के लिए माफी की भीख मांगने वाले, देश के साथ गद्दारी करने वालों को ‘वीर’ की उपाधि से नवाजा जाता है. माफीवीर सावरकर एक कड़वा उदाहरण है.



