उर्दू को परवान चढ़ा कर ही मिर्ज़ा गालिब की खिदमात को मुतारफ कराया जा सकता हैः एम.डब्ल्यू अंसारी (आईपीएस) पूर्व डीजी

उर्दू और फारसी के बाक, मज़ाहिया षायर, मुजाहिद आजादी, हर दिल अज़ीज़, मिर्ज़ा असदुल्लाह खान जिन्हें दुनिया गालिब के नाम से जानती है। आज उनका जन्मदिन है।

उर्दू को परवान चढ़ा कर ही मिर्ज़ा गालिब की खिदमात को मुतारफ कराया जा सकता हैः एम.डब्ल्यू अंसारी (आईपीएस) पूर्व डीजी

27 दिसंबर यौमे पैदाइष मिर्ज़ा असदुल्लाह ख़ान गालिब 

उर्दू और फारसी के बाक, मज़ाहिया षायर, मुजाहिद आजादी, हर दिल अज़ीज़, मिर्ज़ा असदुल्लाह खान जिन्हें दुनिया गालिब के नाम से जानती है। आज उनका जन्मदिन है।

मिर्जा गालिब का जन्म 27 दिसंबर 1797 को आगरा के काला महल के मुगल परिवार में हुआ था। उनके दादा, मिर्जा कौकान बेग, सेल्जुक तुर्क थे। जो अहमद शाह (1748-54) के शासनकाल के दौरान समरकंद से भारत आये थे। उन्होंने लाहौर, दिल्ली और जयपुर में काम किया और अंततः आगरा, यूपी, भारत में बस गए। उनके चार बेटे और तीन बेटियां थीं। मिर्जा अब्दुल्ला बेग और मिर्जा नसरुल्लाह बेग उनके दो बेटे थे। मिर्जा गालिब का दुनिया के बारे में दृष्टिकोण था कि दुनिया एक खेल के मैदान की तरह है जहाँ हर कोई किसी बड़ी चीज के बजाय कुछ सांसारिक गतिविधियों और सुखों में लगा हुआ है। जैसा उन्होने लिखा है
बाज़ीचा-ए-अतफाल है दुनिया मिरे आगे
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मिरे आगे

1850 में, बहादुर शाह ज़फर ने मिर्ज़ा गालिब को ‘दबीर-उल-मुल्क’ की उपाधि से सम्मानित किया। बादशाह ने इसमें ‘नज्म-उद-दौला’ की अतिरिक्त उपाधि भी जोड़ दी। उन्हें बादशाह से ‘मिर्जा नौशा’ की उपाधि भी मिली, इस प्रकार मिर्ज़ा को अपने पहले नाम के तौर पर शामिल किया। वह बादषाह के शाही दरबार का एक महत्वपूर्ण दरबारी भी थे। चूँकि बादशाह स्वयं एक शायर थे, इसलिए 1854 में मिर्जा गालिब को उनका कवि शिक्षक नियुक्त किया गया। उन्हें बहादुर शाह सानी के सबसे बड़े बेटे फखरुद्दीन मिर्जा (वफातः 10 जुलाई 1856) का शिक्षक भी नियुक्त किया गया था। उन्हें मुगल दरबार के शाही इतिहासकार के रूप में भी नियुक्त किया गया था।

गालिब ने 11 साल की उम्र में शायरी शुरू कर दी थी. उनकी पहली भाषा उर्दू थी, लेकिन घर पर फारसी और तुर्की भी बोली जाती थी। उन्होंने कम उम्र में ही फारसी और अरबी सीख ली थी। गालिब के दौर में ‘हिंदी’ और उर्दू शब्द पर्यायवाची थे। हालाँकि गालिब ने उर्दू की तुलना में फारसी को महत्व दिया, लेकिन उनकी प्रसिद्धि उर्दू में उनके लेखन पर है।

उन्होंने उर्दू और फारसी दोनों भाषाओं में कविताएँ लिखीं। हालाँकि उनका फारसी दीवान उनके उर्दू दीवान से कम से कम पाँच गुना लंबा है, लेकिन उनकी प्रसिद्धि उर्दू में उनकी कविता पर टिकी हुई है। आज गालिब न केवल भारत और पाकिस्तान उपमहाद्वीप में, बल्कि पूरी दुनिया में लोकप्रिय हैं। लेकिन उर्दू के विकास के लिए जिस तरह उन्होंने लोगों को जागृत करने की कोशिश की और लोगों को उर्दू पढ़ने-लिखने के लिए प्रोत्साहित किया। वह प्रयास नहीं हो पा रहे हैं। .

जो लोग उर्दू जानते हैं और अपने बच्चों को उर्दू नहीं सिखाते,उन्है चाहिए के कोशिश करें बच्चों को भी उर्दू पढ़ायें। हमें उर्दू को बचाने के लिए प्रयास करने होंगे। उर्दू को भावी पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए उर्दू के पठन-पाठन पर जोर देने की जरूरत है। इसके लिए हमें सरकार से स्कूलों, मदरसों में उर्दू शिक्षकों की नियुक्ति की भी मांग करनी चाहिए। महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों में उर्दू विभाग खोलें, पाठ्यक्रम उपलब्ध करायें तथा उर्दू की सभी समस्याओं की माँग सरकारों से करनी चाहिए।

उर्दू भाषा में जो तासीर है वह अन्य किसी भाषा में नहीं है। इसका अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि गालिब जैसे फारसी के महान शायर ने फारसी में कई अषआर लिखे। लेकिन उन्हें प्रसिद्धि तब मिली जब उन्होंने उर्दू में षयरी लिखी। गालिब ने अपने अंतिम दिनों तक उर्दू और फारसी में कविताएँ लिखीं। 15 फरवरी 1869 को उर्दू की खिदमत करते हुए मशहूर शायर मिर्ज़ा गालिब ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया, लेकिन आज उनकी जयंती पर हमें उनके मिशन को आगे बढ़ाने का संकल्प लेना चाहिए। हमें भी अहद करना चाहिए कि हम मरते दम तक उर्दू की सेवा करेंगे, यही मिर्ज़ा गालिब को सच्ची श्रद्धांजलि है। हम उनकी जयंती पर उन्हें याद करते हैं और उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं।