भाजपा विधायक शकुंतला पोर्ते की बढ़ती जा रही मुश्किलें, जाति प्रमाण पत्र सत्यापन समिति ने दस्तावेज पेश करने को भेजा नोटिस
BJP MLA Shakuntala Porte's troubles mount, with the Caste Certificate Verification Committee issuing a notice to produce documents.
अम्बिकापुर : सूरजपुर जिले के विधानसभा प्रतापपुर की भाजपा विधायक शकुंतला पोर्ते की मुश्किलें बढ़ती जा रही है. कार्यालय कलेक्टर आदिवासी विकास स्तरीय जाति प्रमाण-पत्र सत्यापन समिति बलरामपुर-रामाजुगजंग ने 27 नवंबर को अनुसूचित जनजाति दस्तावेज पेश करने को नोटिस भेजा है.
नोटिस में सामाजिक प्रास्थिति प्रमाण पत्र/जाति प्रमाण पत्र (स्थायी) के सत्यापन के बारे में आवेदक धन सिंह धुर्वे ग्राम व पोस्ट नवगई थाना और तहसील रघुनाथनगर के द्वारा शिकायत आवेदन पत्र इस कार्यालय को प्रेषित किया गया है और आवेदक जयश्री सिंह पुसाम पिता बेचन सिंह ग्राम गौरमाटी, महेवा, वाड्रफनगर जिला बलरामपुर के द्वारा उच्च न्यायालय बिलासपुर में याचिका क्रमांक WPC No. 2966/2025 दायर किया गया है. उच्च न्यायालय द्वारा उक्त प्रकरण पर यथाशीघ्र अभिलेख प्रस्तुत करते हुए कार्यवाही किए जाने के लिये निर्देशित किया गया है.
नोटस में “गोंड़” अनुसूचित जनजाति का जाति प्रमाण-पत्र जारी किया गया है. जिन अभिलेखों के आधार पर उक्त स्थायी जाति प्रमाण-पत्र जारी किया गया है. उन अभिलेखों की मूल प्रति के साथ-साथ पूर्वजों के राजस्व अभिलेख, जन्म-मृत्यु संबंधी पंजीयन, शालेय दाखिल खारिज पंजी, निवास संबंधी अभिलेख अथवा अन्य सुसंगत अभिलेखों को समिति के समक्ष 27 नवंबर 2025 को समय सुबह 11 बजे खुद या अपने अधिवक्ता के जरिए उपलब्ध कराने को कहा है.
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डॉ. टेकाम पूर्व विधायक व मंत्री ने सभा में दावा किया कि विधायक शकुंतला सिंह पोर्ते मूल रुप से उत्तर प्रदेश की निवासी हैं. ऐसे में छत्तीसगढ़ में उन्हें अनुसूचित जनजाति (ST) का लाभ नहीं दिया जा सकता. अगर किसी ने गलत दस्तावेज का उपयोग कर चुनाव लड़ा और जीता है. तो यह सिर्फ क़ानूनी उल्लंघन नहीं बल्कि आदिवासी समाज के अधिकारों का सीधा हनन है. सैकड़ों आदिवासी प्रतिनिधियों ने इस मुद्दे पर गहरी नाराज़गी व्यक्त की.
समाज के नेताओं का कहना है कि अगर प्रमाण पत्र फर्जी पाया गया तो समाज खुद FIR दर्ज कराएगा और विधायक पद अमान्य घोषित कराए जाने की लड़ाई लड़ेगा. अनुसूचित जनजाति (ST) आयोग के अध्यक्ष भानू प्रताप सिंह ने भी इस मुद्दे को “बेहद गंभीर” बताते हुए कहा कि “यदि कोई जनप्रतिनिधि फर्जी दस्तावेज़ों के आधार पर चुनाव जीतता है. यह समाज और संविधान दोनों का अपमान है. त्वरित कार्रवाई आवश्यक है.” ST आयोग की सक्रियता से मामला और भी संवेदनशील और हाई-प्रोफाइल हो गया है.
विपक्ष का सवाल साफ है क्या पार्टी को इस मामले की जानकारी नहीं थी? अगर जानकारी थी, तो फर्जी दस्तावेज़ के आधार पर चुनाव लड़ने वाली विधायक को संरक्षण क्यों दिया गया? राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह मामला अब सिर्फ एक विधायक का नहीं रहा. बल्कि भाजपा की उम्मीदवार चयन प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं.
वाड्रफनगर क्षेत्र में उठा यह मुद्दा अब प्रतापपुर, बलरामपुर, और रायपुर तक पहुंच चुका है. आदिवासी समाज में इस मुद्दे पर भारी असंतोष है. समाज के कई संगठन इसे अस्तित्व और सम्मान के सवाल से जोड़कर देख रहे हैं.
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