छत्तीसगढ़ राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग में भी आदिवासी परिवार को नहीं मिल पा रहा है इंसाफ, न्याय के लिए दर-दर को ठोकर खाने मजबूर हो रही महिला
Tribal families are not getting justice even in Chhattisgarh State Scheduled Tribe Commission women are forced to stumble from door to door for justice
धमतरी/ नगरी : छत्तीसगढ़ राज्य में अनुसूचित जनजातियों की जनसंख्या को ध्यान में रखते हुए छत्तीसगढ़ राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग का गठन किया गया. आयोग का कार्य अनुसूचित जनजातियों के संवैधानिक अधिकारों से वंचित लोगों के शिकायतों की जांच करना है. ताकि पीड़ित आदिवासी परिवारों को उनके हक और अधिकार के तहत इंसाफ मिल सके.
लेकिन इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि आदिवासी आयोग में भी आदिवासी परिवार को इंसाफ नहीं मिल रहा है. पीड़ित आदिवासी महिला इंसाफ पाने की आस में आयोग का दरवाजा खटखटाया था. लेकिन करीब दो साल बीतने के बाद भी आयोग के कई चक्कर लगाने के बाद आज तक पीड़िता को इंसाफ नहीं मिल सका है. आदिवासियों के हक और अधिकार के लिए बड़ी-बड़ी बातें होती हैं. लेकिन यह सब बातें भाषण और कागजों तक सिमट कर रह गई है. यहां पर तो खुद आदिवासी प्रतिनिधि ही आदिवासी समाज के शोषण करने में लगे हुए हैं. आर्थिक रुप से दबे कुचले पीड़ित आदिवासी परिवारों को इंसाफ के लिए भटकना पड़ रहा है. ऐसे में आदिवासी हितों की बात करना बेमानी होगी.
आरोप है कि आदिवासी विकास खंड नगरी के दमकाडीही चुरियारा निवासी गरीब आदिवासी परिवार के जबर्रा रोड स्थित 9 एकड़ जमीन को एक रसूखदार साहू परिवार के द्वारा बलपूर्वक दादागिरी कर इस जमीन पर कब्जा कर लिया है. इसके बाद अधिकारियों से मिली भगत कर फर्जी तरीके से रजिस्ट्री भी करा लिया है. और रजिस्ट्री कराने के बाद जमीन पर कई साल से लगे हुए सैंकड़ों पेड़ों को कटवा कर वन विभाग से 30 लाख रुपए का मुआवजा भी ले लिया है.
इधर पीड़ित आदिवासी परिवार अपने जमीन को वापस पाने और रजिस्ट्री को निरस्त कराने के लिए दर-दर भटक रहा है. लेकिन कर्तव्य विहिन अधिकारियों के कार्यशैली की वजह से इस आदिवासी परिवार को इंसाफ नहीं मिल पा रहा है.
बता दें कि दमकाडीही की इस आदिवासी विधवा गरीब महिला के पति और ससुर ने जमीन हड़पने की शिकायत करते हुए 170(ख) के तहत नगरी के अनुविभागीय अधिकारी राजस्व के न्यायालय में मामला दर्ज कराया था. मामले की सुनवाई के दौरान एसडीएम ने पाया कि आदिवासी की जमीन को इन दबंगों के द्वारा छल कपट और बलपूर्वक कब्जा करना पाया गया. तब एसडीएम ने इस जमीन को आदिवासी परिवार को वापस दिलाने तहसीलदार को निर्देशित भी किया था. इसके बाद इन साहू परिवार के लोग एसडीएम के आदेश को राजनीतिक संरक्षण के चलते गुप-चुप तरीके से निरस्त करा कर जमीन की रजिस्ट्री फर्जी रुप से करा लिया है.
गौरतलब है छत्तीसगढ़ भू राजस्व संहिता के मुताबिक अनुसूचित क्षेत्र में आदिवासी की जमीन को गैर आदिवासी के नाम पर रजिस्ट्री नहीं हो सकती है. लेकिन यहां पर उच्च स्तरीय राजनीतिक संरक्षण में इस नियमों का खुलेआम उल्लंघन किया गया है. और आदिवासी की जमीन को गैर आदिवासी के नाम पर रजिस्ट्री कर दिया गया है. इसकी उच्च स्तरीय जांच होने पर मामले का खुलासा हो जाएगा.
पीड़ित परिवार ने बताया कि पूर्व विधायक लक्ष्मी ध्रुव के द्वारा जमीन हड़पने वाले दबंग परिवार को खुलेआम संरक्षण देने का काम किया है. 218 में एसडीएम के द्वारा जमीन लौटान के फैसले के बाद विधायक ने अपने पद और पावर का दुरुपयोग कर उक्त एसडीएम का तबादला करवा दिया और हमें बिना सुचना दिए बगैर विधायक ने राजनीतिक दबाव बनाकर एसडीएम के आदेश को कलेक्टर से निरस्त करवा कर दिया गया. जबकि होना यह था कि आदेश निरस्त करने से पहले पीड़ित परिवार का पक्ष को भी जानना था. लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं हुआ और कलेक्टर ने बिना सुनवाई के एसडीएम के फैसले को निरस्त कर दिया. इसके बाद रजिस्ट्री करवाया गया है.
बता दे कि उक्त पीड़ित आदिवासी परिवार कलेक्टर से लेकर राज्यपाल और अनुसूचित जनजाति आयोग तक न्याय की गुहार लगा चुके हैं. शिकायत पर उच्च कार्यालय से जांच करने का आदेश संबंधित विभाग के अधिकारी को दिया जाता है तो अधिकारी वस्तु स्थिति का जायजा नहीं लेते ना ही पीड़ित पक्ष का बयान लेते हैं. और टेबल में बैठकर जांच रिपोर्ट तैयार कर देता है. जिसमें लिखा होता है कि शिकायत में लगाया गया आरोप निराधार है. ऐसे जांच करने वाले अधिकारियों पर भी कड़ी सी कड़ी कार्रवाई हो.
अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों के खिलाफ होने वाले क्रूर और अपमानजनक अपराध के लिए बनाए कानून के तहत इन तीनों व्यक्तियों पर एफआईआर दर्ज कर मुकदमा दर्ज करना चाहिए. और आदिवासी की जमीन रजिस्ट्री को शून्य घोषित कर मालिक मकबूजा से मिले 30 लाख रुपए की राशि को आदिवासी परिवार को दिया जाना चाहिए.
प्रार्थी का कहना है कि इस मामले पर रिटायर्ड आदिवासी अधिकारियों की एक उच्च स्तरीय जांच कमेटी गठित कर मामले की जांच कराई जाए. तभी मामले का खुलासा होगा. वरना विभागीय अधिकारी टेबल में बैठकर जांच करेंगे और दबंग परिवार के खिलाफ की गई शिकायत को निराधार बताते रहेंगे. इस मामले में जितनी भी जांच हुई हैं. उसकी जांच रिपोर्ट लेकर जांच अधिकारी के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्यवाही किया जाए. ताकि आदिवासी मामले में कोई भी अधिकारी झूठी जांच रिपोर्ट नहीं बना सके.
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