उद्घाटन से पहले ही ट्रायल में ही गिरा रोपवे का ढांचा, 13 करोड़ लागत से श्रद्धालुओं के लिए बना, निर्माण में लापरवाही या खराब क्वालिटी?
The ropeway structure collapsed during the trial even before its inauguration. Built for devotees at a cost of Rs 13 crore, was it negligence in construction or poor quality?
रोहतास : बिहार के रोहतास जिले में ऐतिहासिक Rohtasgarh Fort और रोहितेश्वर धाम तक पर्यटकों की आसान पहुंच के लिए बनाई जा रही रोहतासगढ़ रोपवे परियोजना को आज बड़ा झटका लगा. ट्रायल रन के दौरान रोपवे का एक प्रमुख टावर/पिलर गिर गया. जिससे सालों से चल रहे इस प्रोजेक्ट की गुणवत्ता, सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं.
रोहतासगढ़ क्षेत्र में स्थित दुर्गम पहाड़ी किले तक पहुंचने के लिए अब तक श्रद्धालुओं और पर्यटकों को कठिन चढ़ाई करनी पड़ती थी. इसी परेशानी को दूर करने के मकसद से बिहार सरकार ने इस रोपवे परियोजना को मंजूरी दी थी. ताकि बुजुर्गों, महिलाओं और दिव्यांग यात्रियों को सुरक्षित और तेज़ सुविधा मिल सके. यह परियोजना सासाराम के आसपास पर्यटन को बढ़ावा देने की एक प्रमुख योजना मानी जा रही थी.
दिसंबर 2025 में इसे तकरीबन पूरा मानते हुए ट्रायल रन शुरु किया गया. ताकि नए साल से पहले इसे आम जनता के लिए खोला जा सके. ट्रायल रन के दौरान जब रोपवे सिस्टम पर भार परीक्षण (लोड टेस्ट) किया जा रहा था. खाली केबिन को अकबरपुर की तरफ से रोहतासगढ़ किला की तरफ भेजा गया. वह थोड़ी ही दूरी पर पहुंचा था कि अचानक रोपवे का एक पिलर गिर पड़ा. इसके बाद एक के बाद एक कई पिलर जमीन पर गिरते चले गए.
कुछ ही पलों में पूरा रोपवे सिस्टम, मशीनों और केबिन के साथ पूरी तरह धराशाई हो गया. इस दौरान तेज आवाज के साथ लोहे का ढांचा गिरने से आसपास के लोग भी दहशत में आ गए. हालांकि राहत की बात यही रही कि केबिन खाली था.
बताया जा रहा है कि इस रोपवे का निर्माण पिछले 6 सालों से चल रहा था और इस पर करीब 13 करोड़ 65 लाख रुपये की लागत आई है. वर्ष 2019 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसका शिलान्यास किया था. नए साल के मौके पर इसके लोकार्पण की तैयारी चल रही थी.
स्थानीय लोगों को उम्मीद थी कि रोपवे शुरू होने से रोहतासगढ़ किला तक पहुंचना आसान हो जाएगा और लगभग 70 किलोमीटर का घुमावदार रास्ता कुछ ही मिनटों में तय हो सकेगा. लेकिन ट्रायल में ही रोपवे के धराशाई हो जाने से लोगों की यह उम्मीद टूट गई है और इलाके में निराशा का माहौल है.
हादसे के बाद जिला प्रशासन और संबंधित विभागों ने उच्च स्तरीय तकनीकी जांच समिति गठित करने के आदेश दिए हैं. डिजाइन, निर्माण गुणवत्ता और इस्तेमाल की गई सामग्री का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाएगा.
स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने इस घटना के बाद निर्माण कार्य में लापरवाही और कमजोर निगरानी का आरोप लगाया है. सालों से लंबित परियोजना में खर्च हुई बड़ी रकम को लेकर भ्रष्टाचार की आशंका भी जताई है. लोगों का कहना है कि अगर समय रहते गुणवत्ता जांच होती. तो यह हादसा टल सकता था.
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