डिलीवरी के बाद नहीं दे सकी 15 हजार, अस्पताल में पांच दिनों तक बंधक रही आदिवासी प्रसूता, जिपं अध्यक्ष के दखल से घर लौटे जच्चा-बच्चा
Unable to pay 15,000 rupees after delivery, tribal woman held captive in hospital for five days; mother and child returned home after Zilla Panchayat president intervened.
गरियाबंद : भुंजिया जनजाति की 23 वार्धीय गर्भवती महिला को नॉर्मल डिलीवरी के एवज में अस्पताल ने 20 हजार रुपए की मांग की. जब तक बेवा सास पैसों का प्रबंध करती, तब तक महिला को नवजात के साथ अस्पताल में कथित तौर पर बंधक बनाकर रखा गया. आखिरकार जिला पंचायत अध्यक्ष के अपने प्रतिनिधियों के जरिए अस्पताल प्रबंधन से चर्चा के बाद जच्चा-बच्चा सकुशल घर पहुंचे.
मिली जानकारी के मुताबिक आदिवासी ब्लॉक मैनपुर के मूचबहल के मालिपारा वार्ड में रहने वाली भुंजिया जनजाति की 23 साल की नवीना चींदा को प्रसव के बाद ओडिशा के कालाहांडी जिले के धर्मगढ़ स्थित एक प्राइवेट अस्पताल में पांच दिनों तक अघोषित रुप से बंधक बनाकर रखा गया था. प्रसूता की सास दोषो बाई ने बताया कि 18 तारीख को प्रसव पीड़ा के बाद उसे धर्मगढ़ स्थित मां भंडारणी क्लिनिक में भर्ती कराया. उसी दिन ही सामान्य प्रसव में पोती ने जन्म दिया.
भर्ती से पहले 5 हजार जमा किया गया था. लेकिन प्रसव के बाद अस्पताल प्रबंधन ने और 15 हजार रुपए की मांग की. पैसे पूरे देने के बाद ही बहू, 3 साल के पोते और नवजात को लाना संभव था. इसलिए पैसे की व्यवस्था करने के लिए वह 21 जनवरी को गांव वापस आ गई.
सास ने बताया कि बेटा पोड़ा आंध्र के ईंट भट्ठे में मजदूरी करता है. उसको भी फोन लगाया लेकिन उसके सेठ भी पैसा नहीं दे रहे थे. बेटे के साथ रही बहू 6 महीने के गर्भ के दौरान घर वापस आ गई थी.
सास ने बताया कि कि पहला बच्चा तीन साल पहले धर्मगढ़ के उसी अस्पताल में ऑपरेशन से हुआ था. तब सोना-चांदी बेच कर 85 हजार दिया था. इस बार प्रसव पीड़ा के बाद स्थानीय अस्पताल को मैंने संपर्क नहीं किया. क्योंकि पिछली बार वे इंकार कर दिए थे. दोबारा बहू की हालत को देखते हुए गाड़ी किराया कर ओडिशा ले गई. लेकिन सामान्य ऑपरेशन के बाद भी इतनी रकम मांगी गई कि छह दिन इंतजाम नहीं हो पाया. जिला पंचायत अध्यक्ष गौरी शंकर की मदद से जच्चा-बच्चा सकुशल घर पहुंचे.
2000 की आबादी वाले गांव में पोशो चींदा का परिवार अकेला भुंजिया है. गांव के बीच बीच टूटे हुए मकान में सास बहु रहते हैं. रोजगार का अभाव था इसलिए बेटा आंध्रप्रदेश काम करने जाता है. गांव कलस्टर में शामिल नहीं है. इसलिए विशेष पिछड़े जनजाति योजना का लाभ इस परिवार को नहीं मिल रहा है. पीएम आवास के तहत आवास मिला है. लेकिन बना नहीं पा रहे हैं. बूढ़ी सास मजदूरी कर किसी तरह गुजारा कर रही है. परिवार के लिए मजदूरी ही अंतिम विकल्प था.
जिला पंचायत अध्यक्ष गौरी शंकर कश्यप ने बताया कि लाचार सास दो दिन से पैसों की व्यवस्था में जुटी थी. कारण सुनते ही हैरानी हुई. लेकिन पहले अस्पताल में मौजूद जच्चा-बच्चा को सकुशल वापस लाना था. अस्पताल में प्रतिनिधि के तौर पर मैने दो लोगों को भेजा था. मसला समझने के बाद उसे सकुशल वापस लेकर आए. लेकिन ऐसी परिस्थिति क्यों निर्मित हो रही है, सरकारी योजना का लाभ भुंजिया जनजाति की महिला तक क्यों नहीं पहुंचा, लापरवाही किसकी थी. इस बारे में जांच के लिए सीएमएचओ को निर्देशित किया जाएगा.
मौके पर गए जय विलास शर्मा ने बताया कि अस्पताल पहुंचने के बाद प्रबंधन ने 2 घंटे इंतजार कराया. फिर अस्पताल में मौजूद कालाहांडी जिला पंचायत सदस्य गोपीनाथ महानंद ने मदद की. बाकी 15 हजार रुपए की बजाए स्वेच्छा से बिल भरने कहा गया. इस पर गौरी शंकर कश्यप के जरिए 5 हजार दिया गया. जिसके बाद एंबुलेंस के जरिए जच्चा-बच्चा को उसके गांव सकुशल छोड़ा गया.
इस मामले में अस्पताल संचालक चैतन्य मेहेर ने सफाई देते हुए कहा कि उन्होंने किसी भी तरह से पैसों की मांग नहीं की थी. महिला और उनके परिजनों ने हमें दिक्कतों की कोई जानकारी नहीं दी थी. जब तक रही तब तक स्टाफ ने उनका पूरा ख्याल रखा है. अगर वे रुपए की दिक्कत बताते तो उन्हें पहले ही जाने दे दिए होते. पर उन्होंने आखरी समय तक कुछ भी नहीं बताया.
गांव की मितानिन पार्वती ध्रुव ने बताया कि महिला गर्भावस्था के छठे महीने में गांव आई थी. जांच कराई गई थी. लेकिन पंजीयन कार्ड नहीं होने की वजह से जच्चा-बच्चा कार्ड नहीं बन पाया.
मैनपुर बीएमओ गजेंद्र ध्रुव ने कहा कि यह मामला मीडिया के जरिए सामने आया है. विभाग को पहले कोई खबर नहीं दी गई थी. अब पूरे मामले की जांच की जाएगी.
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