सुशासन तिहार के मंच पर समाधान के आंकड़ों का जश्न, खोखले दावे और जमीनी हकीकत में पेंशन पाने दर-दर की ठोकरें खाने में मजबूर वरुण यादव
Celebration of solution figures on the stage of Sushasan Tihaar, hollow claims and ground reality Varun Yadav forced to wander from door to door to get pension
गरियाबंद : प्रदेशभर में सुशासन तिहार की धूम है. कहीं सरकारी टेंट लगे हैं. कहीं मंचों पर माइक गरज रहे हैं. एक ओर प्रदेश सरकार द्वारा शारीरिक और मानसिक रुप से कमजोर दिव्यांक बच्चों को कई योजनाओं का लाभ देकर उनकी मदद किए जाने का दावा किया जा रहा है तो वहीं दूसरी तरफ जिले में ऐसे कई विकलांग बच्चे हैं. जिन पर शासन प्रशासन ने अब तक नजरें इनायत नहीं की है.
ताजा मामला गरियाबंद जिला के देवभोग विकासखंड के ग्राम पंचायत झाखरपारा के टांडीपारा का है। जहा एक 16 साल वरुण यादव जो दिव्यांग है. पिछले कई सालों से अपने बच्चों का पेंशन पाने के लिए दर-दर भटक रहे हैं. 16 साल के वरुण यादव के चाचा का कहना है कि बच्चे जन्म से ही विकलांग है. पेंशन के लिए दर दर की ठोकर खा रहा है. इसको लेकर पंचायत द्वारा अब तक कोई कार्यवाही नहीं की गई है.
आपको बता दें कि काफी समय में कई बार माता और उनके चाचा के द्वारा पंचायत, जनपद पंचायत,ओर शिविरों के चक्कर लगाए गए लेकिन पंचायत भी ध्यान नहीं दिया. शिविर के आवेदन को भी अनदेखा किया गया. मदद करना तो दूर खैर खबर तक नहीं ली गई. पंचायत के जिम्मेदारों ने परिवार को मार्गदर्शन तक नहीं दिया.ओर मदद के तौर पर किसी तरह से कड़े कदम नहीं उठाए गए जिसका खामियाजा दिव्यांक बच्चों को भुगतना पड़ रहा है. सरकार बड़े-बड़े दावे करती है. लेकिन दिव्यांक तक शासन की हर संभव मदद पहुंच नहीं पा रही है.
शुक्रवार को सुशासन तिहार में शामिल होने छुरा के मड़ेली पहुंचे थे. मंच पर आकर उन्होंने समस्या का समाधान कम और समाधान के आंकड़ों का बखान ज्यादा किया. न किसी की समस्या सुनी. न पत्रकारों से इस बारे में कोई में चर्चा की. सिर्फ एक नियमित कार्यक्रम के तहत हाजिरी दर्ज कराई खुद की पीठ थपथपाई और हेलिकॉप्टर से सेर पर निकल पड़े. जिसमें असली समस्याओं का न तो कोई उल्लेख था और न ही उसका समाधान...
देवभोग विकासखंड के झाखरपारा गांव के टांडीपारा मोहल्ले में रहने वाला 16 साल का दिव्यांग वरुण यादव आज भी पेंशन की आस में भटक रहा है. और वो सुशासन त्यौहार में पहुंचा. एक बार फिर बड़ी उम्मीद के साथ आवेदन दिया. लेकिन फिर मिला आश्वासन, जबकि उसकी गुहार तो त्योहार शुरु होने से बहुत पहले की है. वरुण जन्म से ही विकलांग है. पढ़ाई भी किसी तरह पांचवीं तक कर पाया. फिर परिवारवालों ने उसे कलेक्टर कैंप ले जाकर विकलांग प्रमाणपत्र बनवाया. सरकार ने कहा था “पहचान पत्र हो तो अधिकार मिलेगा.” लेकिन पहचान मिलते ही सबने पहचानना बंद कर दिया.
वरुण के चाचा घासी राम यादव कहते हैं कि हमने हर जगह दस्तक दी. आवेदन दिया.. चप्पल घिसी… लेकिन कहीं सुनवाई नहीं हुई. गांव के पंच-सरपंच तो जैसे आंखें मूंदे बैठे हैं. शिविर वाले फोटो खिंचवाने में बीजी हैं. आवेदनों की फाइलें धूल खा रही हैं. सरकार कह रही है हर दिव्यांग को योजना का लाभ देंगे. लेकिन वरुण पूछ रहा है मुझे क्यों नहीं??? पंचायत के जिम्मेदारों ने आज तक मार्गदर्शन तक नहीं दिया. सुशासन तिहार के आंकड़ों का समाधान देखा तो इस उम्मीद से पहुंचे थे कि इस बार सुनवाई हो जाएगी. मगर वह भी ढोल का पोल निकला. और पेंशन की जगह फिर एक बार तसल्ली का झुनझुना थमा दिया गया. सुशासन के नाम पर मंच सजे हैं. नेता सेल्फी ले रहे हैं. अधिकारी आंकड़े गिना रहे हैं… लेकिन असली ‘आवेदक’ अब भी दर-दर भटक रहा है.
आखिर सवाल यह है – क्या सुशासन त्यौहार सिर्फ प्रचार का एक नया पैकेज है? या फिर वरुण जैसे आवेदकों के लिए भी इसमें कोई कोना बचा है?
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