बुजुर्ग का संघर्ष न छत मिली, ना ही इंसाफ, जमीन पर दोबारा कब्जा और अफसरों की खामोशी से पीड़ित 80 की उम्र में कलेक्ट्रेट के सामने भूख हड़ताल
The struggle of the elderly man: Neither did he get a roof nor justice, he was suffering from reoccupation of his land and the silence of the officers. At the age of 80, he went on a hunger strike in front of the Collectorate.
गरियाबंद : अमलीपदर के मुरहा नागेश के बाद अब मैनपुर विकासखंड के 80 साल के बुजुर्ग अहमद बेग अपने परिवार के साथ अपने ही घर की जमीन पर कब्जा हटवाने की मांग को लेकर 45 किलोमीटर का सफर तय कर जिला मुख्यालय में कलेक्ट्रेट कार्यालय के सामने भूख हड़ताल पर बैठ गए.
अहमद बेग का आरोप है कि उनकी पुश्तैनी जमीन पर एक स्कूल संचालक ने अवैध कब्जा कर लिया है. इससे पहले 10 जून को एसडीएम मैनपुर के निर्देश पर राजस्व विभाग की टीम ने भूख हड़ताल के बाद कार्रवाई करते हुए जमीन पर से कब्जा हटाया था.
हालांकि कुछ ही दिनों बाद कथित अतिक्रमणकारियों ने दोबारा ताला तोड़कर जमीन पर कब्जा कर लिया. इस दोहराव से दुखी और नाराज़ अहमद बेग ने दोबारा भूख हड़ताल शुरु कर दी है.
बेग का कहना है कि अगर प्रशासन ने समय रहते कड़ी कार्रवाई नहीं की. तो वे परिवार सहित आमरण अनशन के लिए मजबूर होंगे.
इस मामले को लेकर मैनपुर क्षेत्र में रोष फैल रहा है और आम लोग भी अब इस मुद्दे को गंभीर मानते हुए प्रशासन से स्थायी समाधान की मांग कर रहे हैं. अब प्रशासन ‘राजस्व मामला’ कहकर फाइलों में सुलझाने की कोशिश कर रहा है.
कुछ दिन पहले ही अमलीपदर निवासी मुरहा नागेश ने आत्मदाह की धमकी देकर प्रशासन की नींद तोड़ी थी. 12 घंटे में कार्रवाई हो गई. अब वही स्क्रिप्ट बुजुर्ग अहमद बेग के लिए दोहराई जा रही है. फर्क बस इतना है कि उम्र 80 है और शरीर कमजोर.
मैनपुर और देवभोग क्षेत्र अब ‘राजस्व पेंचीदा प्रकरण ज़ोन’ बनते जा रहे हैं. जमीन-मकान तो वही हैं. पर फाइलें और अफसर बदलते रहते हैं. हर केस में एक ही स्क्रिप्ट आवेदन लो. तारीख दो, फिर भूल जाओ.
अब देखने वाली बात ये है कि क्या गरियाबंद प्रशासन फिर 12 घंटे वाली घड़ी देखेगा? या 80 वर्षीय अहमद बेग को भूख हड़ताल की जगह भूख मिटाने के लिए किसी NGO का सहारा लेना पड़ेगा? लोकतंत्र है, सब चलता है… मगर इंसाफ शायद थोड़ा धीमा चलता है! अहमद बैग का कहना है कि वैसे ही उनके पास अब छत नहीं है. इसलिए जब तक इंसाफ नहीं मिलेगा वे मैनपुर नहीं लौटेंगे. चाहे उनकी जान ही क्यों न चली जाए.
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