महिला आरक्षण पर घमासान : सत्ता में बने रहने की BJP की साज़िश नाकाम, अमितेश शुक्ल- बीजेपी भ्रम फैला रही, हार के डर से परिसीमन का खेल

The row over women's reservation: BJP's plot to retain power fails, Amitesh Shukla - BJP spreading confusion, fearing defeat, playing the delimitation game

महिला आरक्षण पर घमासान : सत्ता में बने रहने की BJP की साज़िश नाकाम, अमितेश शुक्ल- बीजेपी भ्रम फैला रही, हार के डर से परिसीमन का खेल

गरियाबंद /राजिम : महिला आरक्षण को लेकर देशभर में चल रही बहस के बीच कांग्रेस ने भाजपा पर तीखा हमला बोला है. पूर्व पंचायत मंत्री अमितेश शुक्ल ने इस पूरे मुद्दे को “राजनीतिक भ्रम फैलाने की साजिश” बताते हुए कहा कि भाजपा जानबूझकर तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश कर रही है.
“महिला आरक्षण पर हमारा समर्थन पहले दिन से”
अमितेश शुक्ल ने साफ़ कहा कि “महिला आरक्षण बिल 2023 में ही पारित हो चुका है और कांग्रेस ने उस समय भी इसका पूरा समर्थन किया था. हम कभी इसके खिलाफ नहीं थे. न हैं और न ही रहेंगे. ”उन्होंने कहा कि भाजपा यह झूठ फैला रही है कि विपक्ष ने महिला आरक्षण का विरोध किया. जबकि सच्चाई यह है कि विपक्ष का विरोध सिर्फ परिसीमन (Delimitation) को लेकर था.
“बीजेपी ने महिला आरक्षण के साथ जोड़ा परिसीमन का पेंच”
अमितेश शुक्ल ने कहा कि भाजपा ने महिला आरक्षण को लागू करने के बजाय उसे परिसीमन से जोड़ दिया, जबकि अगर सरकार चाहे तो वर्तमान लोकसभा की 543 सीटों पर ही 33% आरक्षण तुरंत लागू कर सकती है. ”उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा ने जानबूझकर ऐसा प्रावधान रखा ताकि आरक्षण को टाला जा सके और राजनीतिक लाभ लिया जा सके.
“हार के डर से नया राजनीतिक खेल”
अमितेश शुक्ल ने भाजपा की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि आगामी चुनाव में संभावित हार के डर से भाजपा अब परिसीमन के जरिए सीटों की तादाद और समीकरण बदलने की कोशिश कर रही है. यह पूरी तरह राजनीतिक रणनीति है.”
उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा को लग रहा है कि करीब आधे से अधिक सीटों पर उनकी स्थिति कमजोर है. इसलिए वह अपने नुकसान को बचाने के लिए नए तरीके अपना रही है.”
बीजेपी झूठ पर झूठ बोल रही”
अमितेश शुक्ल ने आरोप लगाया कि भाजपा महिला आरक्षण के नाम पर ढकोसला कर रही है. झूठ पर झूठ बोलकर जनता को गुमराह किया जा रहा है, जबकि असलियत सबके सामने है.”
“कांग्रेस हमेशा महिलाओं के साथ”
अमितेश शुक्ल ने दोहराया कि “कांग्रेस पार्टी हमेशा महिलाओं के अधिकारों के साथ खड़ी रही है. महिला आरक्षण का समर्थन हमने पहले भी किया था और आगे भी करते रहेंगे.”
बड़ा सवाल
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि कि जब कानून 2023 में पास हो चुका है. तो महिलाओं को 33% आरक्षण तुरंत क्यों नहीं दिया जा रहा है? महिला आरक्षण जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर जहां एक तरफ़ कानून पारित हो चुका है. वहीं इसके लागू होने को लेकर राजनीति तेज हो गई है. कांग्रेस इसे भाजपा की रणनीति बता रही है. जबकि भाजपा इसे अपनी उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है. आने वाले चुनावों के बीच यह मुद्दा और भी गरमाने वाला है. लेकिन असली सवाल यही रहेगा कि महिलाओं को उनका अधिकार कब मिलेगा? क्या भाजपा सरकार सिर्फ इसी तरह गुमराह कऱ राजीनीति की झूठी चाल चलता रहेगा. जो अभी ढीढोरा पिट रहे है कि महिला आरक्षण का विरोध किया गया.
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कांग्रेस सांसद और महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने शनिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह पर तीखा हमला बोलते हुए उन पर "संघीय ढांचे को बदलने की साज़िश रचने" का आरोप लगाया. साथ ही, उन्होंने लोकसभा में परिसीमन पर हुए मतदान को लोकतंत्र और संविधान की एक बड़ी जीत बताया.
शनिवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, "कल जो हुआ, वह लोकतंत्र की एक बड़ी जीत थी। संघीय ढांचे को बदलने की साज़िश नाकाम हो गई. यह संविधान, विपक्ष की एकता और देश की जीत थी."
सरकार को एक झटके के तौर पर, संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026, शुक्रवार को लोकसभा में गिर गया. इस विधेयक में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण को, परिसीमन के बाद सदन की सदस्य संख्या 543 से बढ़कर 816 होने से जोड़ा गया था. विधेयक के पक्ष में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े, जो कि आवश्यक दो-तिहाई बहुमत से कम थे.
संसद में महिलाओं के प्रतिनिधित्व के संबंध में, प्रियंका गांधी वाड्रा ने मांग की कि सरकार लोकसभा की मौजूदा सदस्य संख्या के आधार पर महिला आरक्षण अधिनियम, 2023 को लागू करे.
उन्होंने कहा, "अगर आप महिला आरक्षण को लेकर वाकई गंभीर हैं, तो 2023 के कानून को लोकसभा की मौजूदा सदस्य संख्या के आधार पर लागू करें; हम इसका पूरा समर्थन करेंगे."
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इस बिल का सदन के भीतर जो हस्र हुआ है. उसने सरकार की नीयत और उसकी कमजोर रणनीति, दोनों को उजागर कर दिया है. दरअसल सरकार महिला आरक्षण संशोधन बिल की आड़ में लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों में प्रस्तावित परिसीमन को लागू करवाना चाहती थी. जिसे विपक्ष ने एकजुट होकर खारिज कर दिया.
2014 में सत्ता में आने के बाद पिछले 12 सालों में यह पहला मौका है. जब मोदी सरकार को सदन के भीतर अपनी कमजोरी का एहसास हुआ होगा. वरना 2023 में जब महिलाओं को विधायिका में 33 फीसदी आरक्षण देने से संबंधित बिल लगाया गया था. तो सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने पूरी सहमति से उसे पारित कर दिया था.
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी, समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव, तृणमूल कांग्रेस के नेता कल्याण बनर्जी और द्रमुक सांसद लगातार जोर दे रहे थे कि सरकार 2023 के बिल को तुरंत लागू कर दे. लेकिन सरकार इसे परिसीमन के साथ जोड़कर ही लागू करना चाहती थी. मगर उसकी यह बाजीगरी काम नहीं आई.
दरअसल मुश्किल यह है कि मोदी सरकार ने 2021 में प्रस्तावित जनगणना को टाल रखा था और अब जबकि 2026 में जनगणना होनी है. तो पूरी तस्वीर साफ नहीं है. सरकार ने जाति जनगणना की घोषणा कर रखी है. लेकिन अंतिम आंकड़े 2027 में ही आएंगे. मगर सरकार जनगणना से पहले ही राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में सीटों में बढ़ोतरी करना चाहती थी. जिसका द्रमुक सहित तमाम विपक्षी दल विरोध कर रहे हैं.
मोदी सरकार इन तीनों बिलों को बकायदा पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में होने वाले विधानसभा चुनाव से ठीक ऐन पहले संसद का विशेष सत्र बुलाकर पारित करवाना चाहती थी. जिसके राजनीतिक निहितार्थ स्पष्ट हैं. सरकार की मंशा पर सवाल इसलिए भी उठते हैं. क्योंकि उसने महिला आरक्षण संशोधन विधेयक को सदन के भीतर दो तिहाई बहुमत नहीं मिलने पर बाकी के दो विधेयकों पर मतदान के लिए रखा ही नहीं. क्या इसकी वजह यह भी है कि परिसीमन विधेयक पर मोदी सरकार में शामिल तेलुगू देशम पार्टी के कुछ सांसद टूट सकते थे? आखिर इस विधेयक के खिलाफ दक्षिण भारत से ही ज्यादा आवाजें उठ रही हैं.
लोकसभा में आज जो कुछ हुआ, उसके दो संदेश साफ हैं. पहला यह कि 2024 के लोकसभा चुनाव में 240 सीटों पर सिमट जाने वाली भाजपा तेलुगू देशम पार्टी और जनता दल (यू) के सहयोग से सरकार में है. लेकिन प्रधानमंत्री मोदी की छवि कमजोर पड़ चुकी है और उनकी अंतरात्मा की अपील भी सरकार के काम नहीं आई है. दूसरा यह कि अपने तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद सदन के भीतर विपक्ष एकजुट है. इसका यह भी मतलब है कि मोदी सरकार के लिए संसद में आगे आने वाले दिनों में मुश्किलें बढ़ेंगी, कम नहीं होंगी.
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