बुजुर्ग को जानवर की तरह लेटाकर झोलाछाप डॉक्टर ने लगाया इंजेक्शन, एक मरीज को चढ़ाई स्लाइन, स्वास्थ्य विभाग से मिलीभगत का लगा आरोप
A quack administered an injection to an elderly person after making them lie down like an animal and also administered an IV drip to a patient; allegations of collusion with the Health Department have been raised.
गरियाबंद : गरियाबंद जिला के देवभोग ब्लॉक के डोगरीगुड़ा से स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल खड़े करने वाली तस्वीरें सामने आई हैं. तस्वीरों में एक बुजुर्ग को जानवर की तरह लेटाकर झोलाछाप डॉक्टर टेकराम साहू द्वारा इंजेक्शन लगाया जा रहा है. जबकि एक मरीज को स्लाइन चढ़ाई जा रही है.
।स्थानीय लोगों के मुताबिक तस्वीरों में दिखाई दे रहे लोगों की पहचान टेकराम साहू, सुरेंद्र यादव निवासी दरलीपारा और प्रेम नागेश निवासी करलाकोट के रूप में बताई जा रही है. स्थानीय लोगों का आरोप है कि टेकराम साहू, सुरेंद्र यादव और प्रेम नागेश झोलाछाप डॉक्टर हैं. हालांकि, इनकी चिकित्सकीय योग्यता और पंजीयन की पुष्टि स्वास्थ्य विभाग से होना बाकी है.
स्थानीय लोगों का आरोप है कि स्वास्थ्य विभाग से कथित मिलीभगत की वजह से ऐसे लोगों पर कार्रवाई नहीं हो रही है. अब सवाल है- क्या स्वास्थ्य विभाग पूरे मामले की जांच करेगा? क्या मरीजों का इलाज करने वालों के पास वैध चिकित्सकीय योग्यता और अनुमति है? और अगर नियमों का उल्लंघन मिला तो क्या कार्रवाई होगी.
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11 दिन में डिगेन यादव और अभिलाष नेताम की मौत के बाद स्वास्थ्य विभाग की कार्रवाई पर उठे सवाल, मेडिकल स्टोर पर सैंपल जब्त कर नोटिस क्लिनिक पर कार्रवाई कब?
गरियाबंद/अमलीपदर : सरईपानी के डिगेन यादव और सरनाबहाल के अभिलाष नेताम की मौत के मामले ने अमलीपदर क्षेत्र की स्वास्थ्य व्यवस्था और स्वास्थ्य विभाग की कार्रवाई पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. उपलब्ध घटनाक्रम के मुताबिक डिगेन यादव की मौत 4 सितंबर 2026 को हुई. जबकि अभिलाष नेताम की मौत 15 सितंबर 2026 को हुई. यानी दोनों मौतों के बीच महज 11 दिन का अंतर रहा. इसके बाद स्वास्थ्य विभाग एवं खाद्य एवं औषधि प्रशासन की संयुक्त टीम 23 सितंबर 2026 को मौके पर पहुंची. यानी डिगेन अभिलाष नेताम की मौत के 19 दिन बाद जांच टीम पहुंची.
सवाल यह है कि जब दो अलग-अलग गांवों में उपचार के बाद युवकों की मौत का मामला सामने आया, तो तत्काल जांच क्यों नहीं की गई? क्या इलाज में इस्तेमाल दवाओं, इंजेक्शन, प्रिस्क्रिप्शन, मरीजों के उपचार रिकॉर्ड और संबंधित क्लिनिक की गतिविधियों को तत्काल सुरक्षित कर जांचना जरूरी नहीं था?
4 सितंबर डिगेन यादव, 15 सितंबर अभिलाष नेताम… फिर 23 सितंबर को टीम
डिगेन यादव की मौत 4 सितंबर को सरईपानी क्षेत्र में इलाज के बाद हुई। इसके कुछ ही दिनों बाद 15 सितंबर को सरनाबहाल के अभिलाष नेताम की मौत की घटना सामने आई. दोनों मामलों में ग्रामीण स्तर पर इलाज और दवा/इंजेक्शन को लेकर सवाल उठाए हैं. इन घटनाओं के बाद स्वास्थ्य विभाग की कार्रवाई को लेकर परिजनों और ग्रामीणों में सवाल होना स्वाभाविक है.
23 सितंबर को संयुक्त टीम के पहुंचने के बाद विभाग ने परिजनों से जानकारी ली और संबंधित मेडिकल स्टोर का निरीक्षण किया। विभाग की तरफ से की गई कार्रवाई को लेकर अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या यह जांच सिर्फ मेडिकल स्टोर तक सीमित रहेगी या दोनों मौतों के पूरे उपचार-क्रम की भी जांच होगी?
मेडिकल स्टोर पर छापा, दवा का नमूना जब्त
खाद्य एवं औषधि प्रशासन की टीम ने औषधि निरीक्षक धर्मवीर ध्रुव के नेतृत्व में संबंधित मेडिकल स्टोर का निरीक्षण किया. निरीक्षण के दौरान दवाओं के रखरखाव, एक्सपायरी डेट, स्टॉक, खरीद-बिक्री से जुड़े दस्तावेज और अन्य अभिलेखों की जांच किए जाने की जानकारी है.
टीम द्वारा एक दवा का नमूना सील कर जांच के लिए जब्त किए जाने तथा मेडिकल स्टोर संचालक मनीष सिन्हा को दस्तावेज प्रस्तुत करने के लिए नोटिस दिए जाने की जानकारी सामने आई है.
Drugs and Cosmetics Act, 1940 के तहत औषधि निरीक्षकों को दवा की बिक्री/भंडारण वाली जगह का निरीक्षण करने और निर्धारित प्रक्रिया के तहत नमूने लेने जैसी शक्तियां प्राप्त हैं. नमूने की सरकारी प्रयोगशाला जांच के बाद रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई का प्रश्न तय होता है.
लेकिन बड़ा सवाल क्लिनिक की जांच कब?
मेडिकल स्टोर की जांच और दवा का नमूना जब्त करना जांच की एक कड़ी हो सकती है. लेकिन पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण सवाल संबंधित क्लिनिक और वहां किए गए उपचार को लेकर है.
अगर मृतकों को किसी व्यक्ति द्वारा उपचार, इंजेक्शन अथवा एलोपैथिक दवाएं दी गई थीं, तो जांच में यह साफ होना चाहिए कि इलाज किसने किया, उसकी चिकित्सा योग्यता क्या है, उसका पंजीकरण किस चिकित्सा पद्धति में है, कौन-सी दवा या इंजेक्शन दिया गया और उसका रिकॉर्ड कहां है.
अगर किसी व्यक्ति के पास सिर्फ किसी अन्य चिकित्सा पद्धति की योग्यता है. तो यह भी जांच का विषय है कि आधुनिक एलोपैथिक चिकित्सा का अभ्यास किस वैधानिक अधिकार के तहत किया जा रहा था. National Medical Commission Act, 2019 में आधुनिक चिकित्सा के अभ्यास और मेडिकल रजिस्टर से संबंधित प्रावधान हैं.
स्थानीय स्तर पर जिस व्यक्ति को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं. उसके बारे में “झोलाछाप डॉक्टर” कहने का अंतिम निष्कर्ष संबंधित पंजीकरण, योग्यता और जांच के रिकॉर्ड के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए. लेकिन अगर उसके द्वारा एलोपैथिक इलाज या इंजेक्शन देने की शिकायतें सामने आई हैं. तो स्वास्थ्य विभाग को इन शिकायतों की वैधानिक जांच जरुर करनी चाहिए.
सबसे बड़ा सवाल यही है कि दो मौतों के बाद संबंधित उपचार केंद्र/क्लिनिक की जांच हुई या नहीं? अगर हुई तो उसका निरीक्षण प्रतिवेदन क्या है? अगर नहीं हुई तो क्यों नहीं हुई?
19 दिन बाद कार्रवाई क्या इतने समय में महत्वपूर्ण सबूत प्रभावित हो सकते हैं?
डिगेन 4 सितंबर अभिलाष नेताम की मौत 15 सितंबर को हुई और संयुक्त टीम 23 सितंबर को पहुंची. इस अंतराल को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं. किसी भी गंभीर चिकित्सकीय घटना में इस्तेमाल हुई दवाएं, इंजेक्शन की शीशियां, प्रिस्क्रिप्शन, बिल, मरीज के इलाज पर्ची और अन्य रिकॉर्ड जांच के महत्वपूर्ण हिस्से हो सकते हैं.
इसलिए यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि 4 सितंम्बर से 15 के बिच मे हुई अंतराल हुई जांच टीम 23 सितंबर के बीच संबंधित उपचार और दवाओं से जुड़े कौन-कौन से रिकॉर्ड सुरक्षित किए गए.
परिजनों के बयान दर्ज, लेकिन जांच का दायरा कितना?
जांच दल द्वारा केवल मृतक अभिलाष नेताम के घर जाकर परिजनों से बातचीत और घटनाक्रम से संबंधित जानकारी लेने की बात सामने आई है. परिजनों से इलाज, दवा और स्वास्थ्य बिगड़ने के घटनाक्रम के संबंध में जानकारी ली गई.
अब सवाल यह है कि क्या इसी तरह डिगेन यादव के परिजनों के बयान भी आधिकारिक रूप से दर्ज किए गए हैं? क्या दोनों मामलों के उपचार रिकॉर्ड को एक साथ रखकर कोई तुलनात्मक जांच की जा रही है? अगर दोनों मामलों में उपचार की प्रकृति समान थी. तो क्या विभाग ने इस समानता को जांच का हिस्सा क्यों नहीं बनाया है?
विभाग के अधिकारियों के बयानों पर भी सवाल
स्थानीय स्तर पर यह भी आरोप लगाए जा रहे हैं कि जांच टीम मौके पर पहुंचने के बाद स्पष्ट जानकारी देने के बजाय जांच प्रतिवेदन तैयार नहीं होने का हवाला देती रही. अगर जांच अभी जारी है तो विभाग को यह बताना चाहिए कि जांच की वर्तमान स्थिति क्या है और अंतिम प्रतिवेदन कब तक तैयार होगा.
“जांच जारी है” कहना अपने आप में गलत नहीं है. लेकिन दो मौतों से जुड़े मामले में जांच की समयसीमा, जांच के बिंदु और आगे की कार्रवाई को लेकर पारदर्शिता जरूरी रहेगी या फिर लीपापोती होगी.
डॉक्टरों और अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में हो
मामले में स्थानीय स्तर पर स्वास्थ्य विभाग से जुड़े अधिकारियों एवं चिकित्सकों की भूमिका को लेकर भी आरोप लगाए जा रहे हैं. कुछ नामों को लेकर मिलीभगत और संरक्षण के आरोप लगाए गए हैं. इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि इस समय नहीं हुई है. इसलिए इनका निष्कर्ष जांच के बिना नहीं निकाला जा सकता. जांच मे ऐसे व्यक्ति है कई वर्षों से पदस्थ होने के कारण जांच में भी प्रभावित कर रहे हैं.
यह भी महत्वपूर्ण सवाल है. अगर मेडिकल स्टोर से जब्त दवा की लैब रिपोर्ट सही आती है. तो इसका मतलब अपने आप यह नहीं होगा कि दोनों मौतों से संबंधित सभी सवाल खत्म हो गए. दवा की गुणवत्ता एक अलग सवाल है. जबकि उपचार की प्रक्रिया, दवा की मात्रा, इंजेक्शन देने की वैधता, मरीज की स्थिति, समय पर रेफरल और चिकित्सकीय निर्णय अलग-अलग जांच के विषय हैं.
इसीलिए मौत की वजह को निर्धारित करने के लिए उपलब्ध मेडिकल रिकॉर्ड, उपचार विवरण, रेफरल रिकॉर्ड, चिकित्सकीय राय और अन्य सबूतों को भी जांच में शामिल करना जरुरी होगा.
लापरवाही साबित होने पर कानूनी कार्रवाई का सवाल
अगर जांच से यह स्थापित होता है कि किसी व्यक्ति के rash या negligent act के कारण मौत हुई और कानूनी आवश्यक तत्व पूरे होते हैं. तो Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023 की धारा 106(1) के तहत “causing death by negligence” का प्रावधान लागू हो सकता है. लेकिन किसी व्यक्ति पर यह धारा लगाने का फैसला सिर्फ तथ्यात्मक और कानूनी जांच के आधार पर संबंधित जांच एजेंसी/प्राधिकारी द्वारा किया जाना चाहिए.
इसी तरह दवा से संबंधित अनियमितता पाए जाने पर Drugs and Cosmetics Act, 1940 तथा उसके अधीन लागू नियमों के मुताबिक कार्रवाई का सवाल उठ सकता है. सरकारी विश्लेषक की रिपोर्ट आने के बाद उसके आधार पर आगे की प्रक्रिया का प्रावधान भी कानून में है.
स्वास्थ्य विभाग से 10 सीधे सवाल
डिगेन यादव की मौत 4 सितंबर के बाद तत्काल जांच क्यों नहीं की गई?
अभिलाष नेताम की 15 सितंबर की मौत के बाद टीम 23 सितंबर को ही क्यों पहुंची?
क्या दोनों मृतकों के उपचार करने वाले व्यक्ति की चिकित्सा योग्यता और पंजीकरण की जांच हुई?
क्या संबंधित क्लिनिक का निरीक्षण किया गया? यदि किया गया तो निरीक्षण प्रतिवेदन कहां है?
क्या एलोपैथिक इंजेक्शन अथवा दवाएं देने के आरोप की जांच हुई?
क्या दोनों मृतकों के उपचार की पर्ची, दवा, इंजेक्शन और खरीद-बिक्री के रिकॉर्ड जब्त किए गए?
मेडिकल स्टोर से जब्त दवा की लैब रिपोर्ट कब तक आएगी?
क्या डिगेन यादव और अभिलाष नेताम के मामलों को एक साथ रखकर जांच की जा रही है?
अगर इलाज में अनियमितता मिलती है तो संबंधित व्यक्ति और जिम्मेदार अधिकारियों पर क्या कार्रवाई होगी?
क्या पूरी जांच की रिपोर्ट सार्वजनिक की जाएगी?
“दिखावा या निर्णायक कार्रवाई?”—अब रिपोर्ट का इंतजार
दो मौतों के बीच महज 11 दिन का अंतर, पहली, दूसरी मौत के 19 दिन बाद संयुक्त टीम का पहुंचना, 23 सितंबर को मेडिकल स्टोर से दवा का नमूना जब्त होना और नोटिस जारी किया जाना ये सभी घटनाक्रम अब जांच के केंद्र में हैं.
मेडिकल स्टोर पर कार्रवाई को विभाग की जांच की शुरुआत माना जा सकता है. लेकिन मौत की असल वजह और इलाज की जिम्मेदारी तय करने के लिए जांच का दायरा क्लिनिक, उपचारकर्ता, चिकित्सा योग्यता, दवा/इंजेक्शन, उपचार रिकॉर्ड और रेफरल प्रक्रिया तक जाना होगा.
अब देखना यह है कि लैब रिपोर्ट आने के बाद मामला आगे बढ़ता है या सिर्फ नोटिस और सैंपल तक सीमित रह जाता है.
होम्योपैथिक डॉक्टर एलोपैथिक इलाज डिग्री दिखावा कब होगी जांच कब होगी कार्यवाही
सवाल सीधा है दो परिवारों ने अपने लोगों को खोया है, अब जांच सिर्फ कागजों तक रहेगी या जिम्मेदारी भी तय होगी? स्वास्थ्य विभाग की कार्यवाही कब तक होगी?
स्वास्थ्य विभाग, खाद्य एवं औषधि प्रशासन तथा संबंधित व्यक्ति का आधिकारिक पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी समाचार में प्रकाशित किया जाएगा.
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