दलित परिवार पर जातिगत गाली-गलौज और जान से मारने की धमकी देकर किया हमला, सरपंच पति के खिलाफ कार्रवाई की मांग
Dalit family attacked with caste based abuse and death threats, demand for action against Sarpanch's husband
जांजगीर चांपा : जांजगीर चांपा जिला में सरपंच पति परमानंद राठौर ने नवगांवा के एक दलित परिवार के ऊपर जातिगत गाली-गलौज और जान से मारने की धमकी देने का आरोप लगा है. आरोप है कि सरपंच पति ने अपने समाज के 50-60 लोगों को लेकर उनके घर पर हमला किया और जातिगत गालियां दी. पीड़ित ने पुलिस प्रशासन पर निष्क्रियता का आरोप लगाया है.
मिली जानकारी के मुताबिक बलौदा थाना क्षेत्र के ग्राम नवागांव (अकलतरा विधानसभा) में एक अनुसूचित जाति परिवार पर सरपंच प्रतिनिधि और उसके समर्थकों द्वारा हमला, गाली-गलौज, तोड़फोड़ और जान से मारने की धमकी की शिकायत के बाद भी 10 दिन बीतने पर FIR दर्ज न होना प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है. पीड़ित सतीश कुमार घोसले द्वारा यह शिकायत SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 के तहत अजाक थाना में दर्ज कराई गई थी.
13 जून और 15 जून की शाम को गांव के सरपंच प्रतिनिधि परमानन्द राठौर ने 50–60 लोगों के साथ मिलकर कथित रुप से पीड़ित के घर पर हमला किया. परिवार के मुताबिक जातिगत गालियाँ, सामाजिक बहिष्कार और जान से मारने की धमकियाँ दी गईं. डर की वजह से परिवार ने घर में खुद को बंद कर लिया. पीड़ित का कहना है कि पुलिस मे बार-बार शिकायत के बावजूद अब तक FIR दर्ज नहीं हुई.
सतीश घोसले उनका कहना है कि उन्होंने 16 तारीख को बलौदा थाने में शिकायत दर्ज कराने की कोशिश की. लेकिन उन्हें अजाक थाना जाने को कहा गया. अजाक थाने में शिकायत दर्ज कराने के बाद भी अभी तक एफआईआर दर्ज नहीं की गई. सतीश घोसले पीडि़त ने आरोप लगाया कि पुलिस प्रशासन उन्हें और उनके परिवार को बार-बार थाने बुलाकर बयान दर्ज करने के लिए कह रहा है. लेकिन अभी तक एफआईआर दर्ज नहीं की गई है. इससे पीड़ित और उनके परिवार को मानसिक रुप से प्रताडि़त किया जा रहा है. जिससे पुलिस प्रशासन पर कई सारे सवाल उठ रहे हैं.
सरपंच पति के खिलाफ गुंडागर्दी का माहौल खड़ा किया गया है. जिससे पीडि़त और उनके परिवार में डर का माहौल है.
पीड़ित ने आरोप लगाया है कि सरपंच पति परमानंद राठौर के दबंगई की वजह से उन्हें और उनके परिवार को जान से मारने की धमकी दी जा रही है. यह मामला और भी गंभीर होता जा रहा है. जब हमें पता चलता है कि पीड़ित एक पत्रकार का भाई है. इससे यह सवाल उठता है कि क्या पत्रकार भाई के साथ भी ऐसा हो सकता है. तो भविष्य में किसी और के साथ क्या नहीं हो सकता है. यह मामला पत्रकार समुदाय के लिए भी एक बड़ा सवाल है.
पीडि़त ने पुलिस प्रशासन से मांग की है कि मामले में फौरन FIR दर्ज की जाए. और सरपंच पति के खिलाफ कार्रवाई की जाए. पीड़ित का कहना है कि वह इंसाफ की उम्मीद में बैठे हैं. लेकिन पुलिस प्रशासन की निष्क्रियता से उन्हें इंसाफ मिलने में देर हो रही है.
क्या यह पुलिस प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है कि वे पीड़ित की शिकायत पर फौरन कार्रवाई करें और एफआईआर दर्ज करें. आखिर क्यों पुलिस प्रशासन इस मामले में निष्क्रियता दिखा रहा है. यह सवाल पीड़ित और उनके परिवार के मन में उठ रहा है. और वे इसके जवाब की मांग कर रहे हैं.
जिला उपाध्यक्ष सुरेंद्र लहरे के नेतृत्व में भीम आर्मी भारत एकता मिशन (छ:ग) ने जिला जांजगीर-चांपा के ग्राम पंचायत नवागांव में एक दलित परिवार के साथ सरपंच पति द्वारा की जा रही ज्यादती के खिलाफ आवाज उठाएगी. पीडि़त परिवार को गाली-गलौज, जान से मारने की धमकी और घर में तोडफ़ोड़ की जा रही है. भीम आर्मी ने पुलिस प्रशासन से मांग की है कि आरोपियों के खिलाफ फौरन मामला दर्ज किया जाए और कार्रवाई की जाए. वरना चरणबद्ध आंदोलन किया जाएगा.
इस मामले मे मूलनिवासी मुक्ति मोर्चा ने भी विरोध दर्ज करवाते हुए राष्ट्रीय संयुक्त मोर्चा के राष्ट्रीय संयोजक ऋषिकर भारतीय ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुये कहा कि SC/ST एक्ट के तहत FIR 24 घंटे में दर्ज होनी चाहिए. लेकिन 10 दिन बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई. यह सरकार की संवैधानिक प्रतिबद्धता की कसौटी पर प्रश्नचिन्ह है. अगर प्रशासन कोताही बरतता है तो मूलनिवासी मुक्ति मोर्चा आंदोलन के रास्ते पर उतरेगा.
इस मामले में पुलिस कप्तान विजय पांडे ने कहा “हम पहले पीड़ित पक्ष के बयान ले रहे हैं. ताकि केस के हर पहलु की जांच हो सके. आरोपी को उचित समय पर बुलाकर कार्रवाई की जाएगी.
SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 के मुताबिक
जातिसूचक गाली, धमकी, बहिष्कार, हमला आदि पर सीधी FIR और गिरफ्तारी अनिवार्य है. FIR दर्ज करने में देरी स्वयं एक दंडनीय लापरवाही मानी जाती है.
कही ना कही यह मुद्दा पुलिस की कार्यवाही की धीमी गति के कारण जिले के शांत माहौल को गर्म करने का कारण बनने जा रहा है. एक तरफ दलित परिवार लगातार उत्पीड़न और असुरक्षा से जूझ रहा है. वहीं प्रशासन की धीमी कार्यवाही से आक्रोशित सामाजिक संगठन अब आंदोलन की चेतावनी दे रहे हैं. यह मामला सिर्फ एक गांव नहीं. पूरे जिले की संवैधानिक संवेदनशीलता की परीक्षा बन चुका है.
देखने वाली बात होगी कि प्रशासन अपनी वही कछुए वाली चाल पर चलती है या मुद्दे की गंभीरता आकलन कर समस्या विकराल रुप लेने से पहले कोई समाधान निकाल पाती.
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