परीक्षा में फेल होने से निराश 10वीं के छात्र ने लगाई फांसी, सदमे में परिजन और मोहल्लेवासी, डिप्रेशन की इन इशारों से करें पहचान

Disappointed at failing in the exam, a 10th class student committed suicide by hanging himself, family and neighborhood in shock, identify depression from these signs

परीक्षा में फेल होने से निराश 10वीं के छात्र ने लगाई फांसी, सदमे में परिजन और मोहल्लेवासी, डिप्रेशन की इन इशारों से करें पहचान

बिलासपुर/तिफरा : छत्तीसगढ़ के तिफरा क्षेत्र से दर्दनाक खबर सामने आई है. यहां 17 साल के लड़के ने अपने घर के कमरे में फांसी लगाकर खुदकुशी कर ली. मृतक कक्षा 10वीं का छात्र था. घटना के बाद इलाके में सनसनी फैल गई है. पुलिस ने मर्ग कायम कर जांच शुरू कर दी है.
मिली जानकारी के मुताबिक तिफरा निवासी रुद्र यादव कक्षा 10वीं का छात्र था. वार्षिक परीक्षा में वह पास नहीं हो सका और उसकी सप्लीमेंट्री आ गई थी. इसके बाद से वह काफी गुमसुम रहने लगा था. बुधवार को रुद्र के माता-पिता रोजी-मजदूरी पर गए हुए थे और घर में सिर्फ उसकी बहन मौजूद थी. इसी दौरान दोपहर करीब 12 बजे उसने कमरे में जाकर फांसी लगाकर खुदकुशी कर ली.
मृतक रुद्र यादव उम्र 17 साल कमला ज्ञान ज्योति विद्यालय का छात्र था और कक्षा दसवीं में पढ़ाई कर रहा था. वह दो भाइयों में छोटा था और उसके पिता मजदूरी कर परिवार का पालन-पोषण करते हैं.
खुदकुशी की वजह अभी साफ नहीं हो पाई है. सिरगिट्टी पुलिस ने मामले में मर्ग कायम कर लिया है और जांच जारी है. मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस हर पहलु को खंगाल रही है. परिजन और मोहल्लेवाले इस दर्दनाक घटना से सदमे में हैं.
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कहीं आपका बच्चा डिप्रेशन में तो नहीं?

किताबों का जो बोझ आज है. वो पहले नहीं हुआ करता था. पहले जहां दो- चार किताबों से बच्चे ज्ञान की यात्रा तय कर लेते थे. वहीं अब किताबों का बोझ बच्चों में तनाव का विषय बन गया है. इसके अलावा बढ़ता मोबाइल का प्रयोग भी डिप्रेशन की वजह बन रहा है. बच्चे कई घंटे तक मोबाइल से ही चिपके रहते हैं. मोबाइल पर परोसी जा रही सामग्री भी बच्चों को मानसिक तौर पर बीमार बना रही हैं. आसपास का माहौल और घर में लगने वाली डांट फटकार को भी  बच्चे सहन नहीं कर पाते हैं. बच्चे इस सब हालत से किसी तरह के डिप्रेशन में न आये, इसका ख्याल रखना बेहद जरूरी है.
बच्चा चिड़चिड़ा तो नहीं हो गया
बच्चा हर बात पर झगड़ा कर रहा है. चिड़चिड़ा हो रहा है. मारपीट पर उतारु हो जाता है तो माता-पिता को सीरियस होने की जरुरत है. बच्चे में ये डिप्रेशन की हालत हो सकती है. माता पिता को फौरन बच्चे की काउंसलिंग करनी चाहिए. जरुरत है तो मनोचिकित्सक से इलाज कराना चाहिए. 
बच्चा चुप तो नहीं है
बच्चा अगर बहुत ज्यादा चुप रहता है. किसी से बात करना पसंद नहीं करता. अगर कोई बात करने लगे तो उससे बात करने से मना कर दे. माता-पिता को इस कंडीशन में सावधान रहने की जरुरत है. 
अकेला रहने लगे तब भी
गुपचुप रहने के साथ ही वो अकेला रहने लगे. किसी से बात करना पसंद न करें. कमरे में अकेले अकेले खुद से बात करने लगे तो यह हालत ठीक नहीं है. बच्चा मानसिक तौर पर ज्यादा बीमार हो गया है. उसका कॉउंसलिंग कराकर फौरन इलाज शुरु करा देना चाहिए.
इस आर्टिकल में बताई विधि, तरीक़ों और सुझाव पर अमल करने से पहले डॉक्टर या संबंधित एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें.
दूसरी छात्रा को क्लास मॉनिटर बनाए जाने से आया व्यवहार में बदलाव
एक स्कूल में आठवीं कक्षा की छात्रा को क्लास मॉनिटर नहीं बनाया गया. उसकी जगह दूसरी छात्रा को शिक्षक ने चुन लिया. इससे नाखुश छात्रा ने खुद को ही दूसरों से कमतर मान लिया. इसकी वजह से वह गुमशुम रहने लगी. हमेशा शांत रहने वाली छात्रा अचानक से गुस्सैल व्यवहार करने लगी. कुछ समय बाद जब छात्रा का व्यवहार परिजनों को असामान्य लगा तो उसे मनोचिकित्सक के पास ले गए. काउंसलिंग के बाद उसका व्यवहार बेहतर हुआ. खुद को दूसरों से बेहतर और मशहूर दिखाने के चक्कर में स्कूली बच्चे अवसाद में जा रहे हैं.
सोशल मीडिया पर कम लाइक्स आने का गम
एक छात्र अपने दोस्तों के साथ सोशल मीडिया पर रील और वीडियो पोस्ट करता था. उसके पोस्ट पर दोस्तों की मुकाबले काफी कम लाइक्स आ रहे थे. ऐसे में वह तनाव में रहने लगा. कई कोशिशों के बाद भी लाइक्स की तादाद नहीं बढ़ी. इस बीच उसका तनाव इतना बढ़ गया कि खुदकुशी तक का प्रयास उसने किया. तबियत काफी बिगड़ने के बाद अब उसकी काउंसलिंग और जरूरी ट्रीटमेंट चल रहा है.
दूसरी छात्रा को हेड गर्ल बनाने से हुई परेशानी
एक नामी स्कूल में एक छात्रा को हेड गर्ल बनाने की जगह दूसरी छात्रा को शिक्षक ने चुन लिया. इससे छात्रा परेशान रहने लगी. छात्रा की परेशानी देखकर उसके परिजन भी स्कूल में विवाद करने पहुंच गए। उनका कहना था कि उनकी बेटी को हेड गर्ल बनने का मौका मिलना चाहिए था. जिस लड़की को हेड गर्ल बनाया गया. उसके सिर्फ.3 फीसदी मार्क्स ही कम थे. इस मामले में विवाद के अलावा छात्रा को भी तनाव बढ़ा हुआ था. ऐसे में उसको नींद नहीं आने की भी शिकायत बढ़ गई.
बातचीत से बच्चों को बना सकते हैं स्वस्थ
इस तरह के मामलों से निबट रहे मनोचिकित्सक डॉ. पुनीत गर्ग का कहना है कि स्कूली बच्चों में तनाव और अवसाद के मामलों में बातचीत जरुरी है. ज्यादातर मामलों में बच्चे के अलावा शिक्षक और परिजनों की भी काउंसलिंग करनी होती है. कोई भी अपने बच्चे को कमतर नहीं देखना चाहता है. कई परिजनों को लगता है कि वे मोटी फीस खर्च कर रहे हैं. ऐसे में उनके बच्चे को प्राथमिकता देते हुए स्कूल बेहतर बनाए. इससे हालात और बिगड़ जाएंगे। परिजनों को भी अपने बच्चों को यह सिखाना चाहिए कि उन्हें बेहतर करने के लिए कठिन प्रयास भी करने जरुरी है. हर कोई विजेता नहीं हो सकता. यह भी समझना होगा.
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