पिता की गोद में मासूम ने तोड़ा दम, मुक्तांजलि सेवा ने ठुकराया शव, टूटा बाप बस में लाया बेटी की लाश, शासन-प्रशासन की संवेदनहीनता बेनकाब

An innocent child died in the father's lap, Muktanjali Seva rejected the body, a broken father brought his daughter's body in a bus, the insensitivity of the government and administration exposed

पिता की गोद में मासूम ने तोड़ा दम, मुक्तांजलि सेवा ने ठुकराया शव, टूटा बाप बस में लाया बेटी की लाश, शासन-प्रशासन की संवेदनहीनता बेनकाब

राजनांदगांव/खैरागढ़ : खैरागढ़ से निकली यह घटना शासन-प्रशासन की संवेदनहीनता और समाज की बेरुखी की पोल खोलती है. ग्राम मोगरा निवासी मजदूर दंपत्ति गौतम डोंगरे और कृति डोंगरे अपनी रोज़ी-रोटी के लिए हैदराबाद में काम करते थे. किस्मत का सितम देखिए उनकी दो साल की बेटी बीमार पड़ी और पिता की गोद में ही ट्रेन में दम तोड़ दिया.
राजनांदगांव स्टेशन पहुंचकर ग़म से टूटा पिता सरकार की “मुक्तांजलि शव वाहन सेवा” के पास गया ताकि बच्ची का शव गांव तक पहुंच सके. लेकिन दिल दहला देने वाला जवाब मिला- “यह सुविधा सिर्फ तब मिलेगी जब मौत सरकारी अस्पताल में दर्ज हो.” यानी सरकार की योजनाओं की चमक-दमक कागज़ों पर है, जमीन पर नहीं
बेबस पिता ने अपनी नन्हीं बच्ची के शव को सीने से चिपकाया और साधारण बस में खैरागढ़ तक सफर किया. यह सफर महज दूरी का नहीं था. बल्कि टूटी उम्मीदों और बेबसी का था.
प्रेम विवाह करने वाले इस दंपत्ति का गांव पहले से बहिष्कार कर चुका था. बेटी की मौत के बाद भी कोई रिश्तेदार या गांव वाला शोक साझा करने नहीं आया. दुख में पूरा परिवार अकेला खड़ा रहा.
खैरागढ़ बस स्टैंड पर परिवार बिल्कुल अकेला था. उसी वक्त समाजसेवी हरजीत सिंह आगे आए. उन्होंने न सिर्फ परिवार को गांव तक पहुंचाया. बल्कि अंतिम संस्कार तक हर कदम पर साथ खड़े रहे.
हरजीत ने कहा. “उस पल मैंने सिर्फ इतना सोचा कि यह बच्ची मेरी भी बेटी हो सकती थी. दुख में साथ देना ही असली समाज और असली धर्म है.”
यह घटना शासन और प्रशासन दोनों की संवेदनहीनता को उजागर करती है. आखिर क्यों एक गरीब पिता को अपनी बेटी की लाश बस में ढोनी पड़ी? क्यों सरकारी योजनाएं सिर्फ कागज़ों तक सीमित हैं? सरकार द्वारा चलाए जा रहे शव वाहन सेवा के बड़े-बड़े वादे और विज्ञापन इस परिवार के आंसुओं में बह गए.
सरकारी सहायता के अभाव में गौतम और कृति ने अपनी बेटी की लाश को सीने से लगाकर आम बस से खैरागढ़ तक का सफर किया. यह सिर्फ एक सफर नहीं था- यह बेबसी, लाचारी और टूटी उम्मीदों की यात्रा थी.
क्या यही है हमारी सभ्यता? क्या यही है वह नवभारत जिसकी हम बात करते हैं? सरकार का दावा है कि ‘मुक्तांजलि’ योजना अंतिम यात्रा में सरकार की सहभागिता का प्रतीक है. पर क्या ऐसी योजना का कोई अर्थ है. जो सिर्फ कागज़ी मौत मानती है? इसके अलावा 21वीं सदी में भी अगर प्रेम विवाह को सामाजिक बहिष्कार का कारण बनाया जाता है. अगर एक परिवार के दुःख में गांववालों की मौजूदगी नहीं. बल्कि दूरी हो. तो ये न सिर्फ उस समाज की हार है. बल्कि हमारी सोच की हार है.
गौतम डोंगरे की मासूम बेटी अब इस दुनिया में नहीं रही. लेकिन उसकी मौत ने सरकार के नियमों, और समाज की सोच पर एक स्थायी सवाल खड़ा कर दिया है- क्या मरने के बाद भी इंसान को सम्मान नहीं मिलेगा. अगर वो गरीब है या प्रेम करने वाला है?
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