एल्डरमैन नियुक्ति पर घमासान: भाजपा कार्यकर्ताओं में बढ़ा असंतोष, इस्तीफे की चेतावनी से गरमाई सियासत, उपसरपंच को ही बना दिया एल्डरमैन

Uproar over Alderman appointment: Dissatisfaction grows among BJP workers; politics heats up with threats of resignation; Deputy Sarpanch himself appointed as Alderman.

एल्डरमैन नियुक्ति पर घमासान: भाजपा कार्यकर्ताओं में बढ़ा असंतोष, इस्तीफे की चेतावनी से गरमाई सियासत, उपसरपंच को ही बना दिया एल्डरमैन

नगर पालिका परिषद में 5 नए एल्डरमैन की हुई नियुक्ति
गोबरा नवापारा : नगर पालिका परिषद गोबरा नवापारा में शासन द्वारा पांच नए एल्डरमैन की नियुक्ति की गई है. नियुक्ति के बाद सभी नवनियुक्त एल्डरमैन ने प्रदेश के शीर्ष नेतृत्व एवं शासन का आभार व्यक्त करते हुए जनसेवा के प्रति पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ कार्य करने का संकल्प लिया.
नवनियुक्त एल्डरमैन में कन्हैया (फेकनू ) साहू, नवल किशोर साहू, अन्नपूर्णा देवांगन, मुकुंद मेश्राम एवं गुलाब राव शामिल हैं. नवनियुक्त एल्डरमैन ने कहा कि संगठन एवं शासन ने उन पर जो विश्वास व्यक्त किया है, उस पर वे पूरी तरह खरा उतरने का प्रयास करेंगे। उन्होंने कहा कि नगर के विकास, नागरिक सुविधाओं के विस्तार तथा जनहित के कार्यों को प्राथमिकता देते हुए सभी के सहयोग से नगर के समग्र विकास के लिए कार्य किया जाएगा.
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उपसरपंच को ही बना दिया एल्डरमैन
बलरामपुर-सरगुजा : छत्तीसगढ़ के बलरामपुर-सरगुजा क्षेत्र से नगर निकाय नियुक्तियों में एक बड़ी लापरवाही और नियमों की अनदेखी का मामला सामने आया है. शासन द्वारा जारी की गई एल्डरमैन (मनोनीत पार्षद) की लिस्ट के बाद अब एक नया विवाद खड़ा हो गया है. राजपुर नगर पंचायत में की गई एक नियुक्ति को लेकर स्थानीय राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में सवाल उठने लगे हैं.
ग्राम पंचायत के उपसरपंच को नगर पंचायत में मिली जगह
मिली जानकारी के मुताबिक राजपुर नगर पंचायत के लिए अनिल तिवारी को एल्डरमैन मनोनीत किया गया है. गड़बड़ी की बात यह है कि अनिल तिवारी वर्तमान में कोटा गहना ग्राम पंचायत के निर्वाचित उपसरपंच हैं.
क्यों उठ रहे हैं नियम और प्रक्रिया पर सवाल?
पंचायती राज और नगरीय निकाय नियमों के जानकारों के मुताबिक कोई भी व्यक्ति एक साथ दो संवैधानिक या जनप्रतिनिधि के पदों पर नहीं रह सकता. अनिल तिवारी पहले से ही कोटा गहना पंचायत के उपसरपंच के रूप में ग्रामीण निकाय का हिस्सा हैं. इसके बावजूद उन्हें नियमों को ताक पर रखकर राजपुर नगर पंचायत में एल्डरमैन (नगरीय निकाय) नियुक्त कर दिया गया.
स्थानीय स्तर पर विरोध और चर्चाएं तेज
इस बड़ी गड़बड़ी को लेकर क्षेत्र में तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं. स्थानीय लोगों और राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि लिस्ट जारी करने से पहले नामों की ठीक से स्क्रूटनी (जांच) नहीं की गई. जिसके कारण यह गंभीर प्रशासनिक त्रुटि हुई है. अब देखना यह होगा कि इस मामले के उजागर होने के बाद प्रशासन इस नियुक्ति को निरस्त करता है या संबंधित व्यक्ति को अपने एक पद से इस्तीफा देना पड़ता है.

बिलासपुर में गुटबाजी और खींचतान के बीच अटकी लिस्ट
बिलासपुर में सूची जारी होने से पहले ही आंतरिक मतभेद चरम पर पहुंच गए हैं. सूत्रों के मुताबिक, बिलासपुर नगर निगम के लिए तय किए जा रहे नामों पर किसी एक राय का न बन पाना ही सबसे बड़ा रोड़ा साबित हो रहा है.
कई धड़ों से आ रहे नाम
खबर है कि महापौर पूजा विधानी और उनके पति अशोक विधानी की तरफ से कुछ नामों की पैरवी की जा रही है. जबकि स्थानीय भाजपा संगठन और क्षेत्रीय विधायक समर्थकों की अपनी अलग पसंद है.
वरिष्ठ नेताओं का हस्तक्षेप भी बेअसर
नगर निगम के भाजपा पार्षद दल और संगठन स्तर पर मतभेद इतने गहरे हैं कि प्रदेश संगठन के कुछ वरिष्ठ नेताओं द्वारा आपसी सहमति बनाने के निर्देशों के बावजूद अब तक इस लिस्ट को अंतिम रूप नहीं दिया जा सका है.

कांग्रेस महापौर रहे एजाज ढेबर के करीबी को बनाया एल्डरमैन, BJP एमएलए की सिफारिश
रायपुर : छत्तीसगढ़ में नगरीय निकायों के एल्डरमैनों (मनोनीत पार्षदों) की नियुक्ति की लिस्ट जैसे ही राज्य शासन द्वारा जारी की गई. वैसे ही इसे लेकर पार्टी संगठन और कार्यकर्ताओं में असंतोष की लहर दौड़ गई है. राजधानी रायपुर में जहां कुछ चुनिंदा नामों को लेकर पुराने और निष्ठावान कार्यकर्ताओं ने सोशल मीडिया पर मोर्चा खोल दिया है.
रायपुर नगर निगम में बीजेपी ने 11 एल्डरमैन नियुक्त किए. लेकिन जब सूची जारी हुई तो बवाल मच गया. बीजेपी ने कांग्रेस के महापौर रहे एजाज ढेबर के करीबी विनय ओझा को भी एल्डरमैन बना दिया.
लिस्ट में विनय ओझा का नाम दूसरे नंबर पर आया. बीजेपी कार्यकर्ता सोशल मीडिया पर अपनी नाराजगी जता रहे हैं. उनका  कहना है कि बीजेपी कार्यकर्ता दरी बिछा रहे हैं और पार्टी कांग्रेस के लोगों को पद दे रही है. उनका कहना है कि एक विधायक की सिफारिश से विनय ओझा की नियुक्ति की गई है.
लिस्ट सामने आते ही राजनीतिक और संगठनात्मक स्तर पर असंतोष खुलकर सामने आने लगा. सोशल मीडिया पर भी नियुक्तियों को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं. सबसे ज्यादा चर्चा रायपुर नगर निगम की लिस्ट को लेकर हो रही है.
बीजेपी सरकार ने की कांग्रेस नेता की नियुक्ति
विवाद का केंद्र सूची में शामिल विनय ओझा का नाम है. बीजेपी के कुछ पुराने कार्यकर्ता सोशल मीडिया पर सवाल उठा रहे हैं कि पूर्व महापौर एजाज ढेबर के करीबी माने जाने वाले व्यक्ति को एल्डरमैन कैसे बना दिया गया. इसे लेकर पार्टी के भीतर ही तंज कसते हुए कई तरह की टिप्पणियां की जा रही हैं.
पार्टी नेताओं का कहना है कि विनय ओझा पहले भी बीजेपी से जुड़े रहे हैं और वरिष्ठ नेता बृजमोहन अग्रवाल के साथ लंबे समय तक काम कर चुके हैं. बाद में वे कांग्रेस में शामिल हुए और एजाज ढेबर के महापौर कार्यकाल के दौरान सक्रिय रहे. विधानसभा और नगरीय निकाय चुनाव से पहले उन्होंने फिर बीजेपी का दामन थाम लिया था. 
बीजेपी कार्यकर्ता नाराज
विनय ओझा की नियुक्ति को लेकर पार्टी के भीतर ही अवसरवाद बनाम निष्ठा की बहस तेज हो गई है. बीजेपी के कई पुराने कार्यकर्ताओं का कहना है कि वर्षों से पार्टी के लिए लगातार काम करने वाले समर्पित कार्यकर्ताओं की उपेक्षा की गई है. जबकि दूसरे दलों से आए नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिल रही है. कुछ नियुक्तियों को लेकर यह भी सवाल उठाए जा रहे हैं कि ठेकेदारी से जुड़े लोगों और पूर्व पार्षदों को प्राथमिकता क्यों दी गई.
जबकि जमीनी स्तर पर सक्रिय कार्यकर्ताओं को अवसर नहीं मिला। सूत्रों का दावा है कि एल्डरमैन नियुक्ति के लिए संगठन से ही नाम मांगे गए थे और सूची तैयार करने से पहले वरिष्ठ नेताओं की सहमति भी ली गई थी. इसके बावजूद कार्यकर्ताओं के बीच असंतोष कम होता नजर नहीं आ रहा है. कुछ कार्यकर्ताओं ने तंज कसते हुए लिखा है कि विनय ओझा की नियुक्ति के लिए विधायक सुनील सोनी का आभार...
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गरियाबंद की नगर पंचायतों में मनोनीत पार्षदों में महिलाओं को नहीं मिला स्थान, उठे सवाल
गरियाबंद : गरियाबंद जिले की नगर पंचायत छुरा, कोपरा और देवभोग में जारी मनोनीत पार्षदों की सूची में एक भी महिला को स्थान नहीं मिलने पर महिला संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विपक्षी दलों ने सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं. उनका कहना है कि सरकार एक ओर महिला सशक्तिकरण, नारी सम्मान और महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने की बात करती है. वहीं दूसरी तरफ स्थानीय निकायों में महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने के मौके पर पूरी तरह उपेक्षित कर दिया गया है.
तीनों नगर पंचायतों में सिर्फ पुरुष कार्यकर्ताओं को मनोनीत पार्षद बनाया गया है. इससे लंबे समय से संगठन और सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय महिला कार्यकर्ताओं में नाराजगी देखी जा रही है. कई महिला नेताओं का कहना है कि सालों से पार्टी और समाज के लिए काम करने के बावजूद उन्हें मौका नहीं दिया गया. जबकि मनोनयन जैसी व्यवस्था का मकसद ही समाज के कई वर्गों को प्रतिनिधित्व देना होता है.
महिला संगठनों का कहना है कि केंद्र और राज्य सरकारें “बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ”, “महिला सशक्तिकरण”, “लखपति दीदी”, “महिला स्व-सहायता समूह” और महिलाओं की आर्थिक एवं सामाजिक भागीदारी बढ़ाने जैसी योजनाओं का प्रचार-प्रसार करती हैं. लेकिन जब राजनीतिक भागीदारी सुनिश्चित करने का मौका आता है तो महिलाओं को पीछे कर दिया जाता है. उनका कहना है कि अगर महिलाओं को मनोनीत पार्षद बनाया जाता तो वे स्थानीय समस्याओं को अधिक प्रभावी ढंग से सामने रख सकती थीं.
स्थानीय महिला नेताओं का कहना है कि पंचायत से लेकर संसद तक महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की जरुरत लंबे समय से महसूस की जा रही है. देश में महिलाओं के लिए आरक्षण और नेतृत्व क्षमता विकसित करने की दिशा में लगातार प्रयास किए जा रहे हैं. इसके बावजूद नगर पंचायतों के मनोनयन में महिलाओं को पूरी तरह बाहर रखना कई सवाल खड़े करता है. उनका कहना है कि मनोनीत पार्षदों की व्यवस्था केवल राजनीतिक संतुलन के लिए नहीं, बल्कि समाज के उन वर्गों को प्रतिनिधित्व देने के लिए भी होती है. जिनकी आवाज निर्वाचित व्यवस्था में पर्याप्त रूप से नहीं पहुंच पाती.
राजनीतिक विश्लेषकों का भी मानना है कि स्थानीय निकायों में महिलाओं की भागीदारी विकास योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन में अहम भूमिका निभाती है. महिलाओं के जुड़ने से शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, स्वच्छता, पेयजल, महिला सुरक्षा, बाल विकास और सामाजिक कल्याण जैसे विषयों को प्राथमिकता मिलने की संभावना बढ़ जाती है. ऐसे में तीनों नगर पंचायतों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व पूरी तरह खत्म होना राजनीतिक दृष्टि से भी अहम माना जा रहा है.
विपक्षी दलों ने इस मुद्दे को लेकर भाजपा सरकार पर निशाना साधा है. उनका कहना है कि भाजपा सिर्फ चुनावी मंचों पर महिला सम्मान और नारी शक्ति की बात करती है, लेकिन जब फैसला लेने वाले पदों पर नियुक्ति की बात आती है तो महिलाओं को पर्याप्त अवसर नहीं दिए जाते. विपक्ष ने इसे महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी की अनदेखी बताते हुए भविष्य में मनोनयन प्रक्रिया में महिलाओं को प्राथमिकता देने की मांग की है.
जिले में यह मुद्दा अब राजनीतिक चर्चाओं का प्रमुख विषय बन चुका है. आने वाले दिनों में इस पर सत्ता और विपक्ष के बीच बयानबाजी और तेज होने की संभावना जताई जा रही है. वहीं महिलाओं को प्रतिनिधित्व नहीं मिलने के सवाल पर सामाजिक संगठनों की निगाहें अब सरकार और संबंधित विभागों की आगामी पहल पर टिकी हुई हैं.
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कुरूद में एल्डरमैन सूची ने बदले समीकरण, भानु चंद्राकर की एंट्री बनी सबसे बड़ी चर्चा
कुरुद : कुरुद नगर पालिका के एल्डरमैन मनोनयन की लिस्ट सामने आते ही महीनों से चल रही चर्चाओं, अटकलों और संभावित नामों पर विराम लग गया. लिस्ट ने स्थानीय राजनीति में नई हलचल जरूर पैदा की है और नगर पालिका की आगामी कार्यप्रणाली को लेकर नई चर्चाओं को जन्म दिया है.
सबसे ज्यादा चर्चा विधायक प्रतिनिधि भानु चंद्राकर के नाम को लेकर रही. जिनकी एल्डरमैन के रूप में नियुक्ति ने राजनीतिक गलियारों का ध्यान अपनी ओर खींचा. वहीं चंद्रकुमार चंद्राकर (नंदू) को लगातार दूसरी बार जिम्मेदारी देकर संगठन ने अनुभव और निरंतरता पर भरोसा दोहराया है. अब यह नई टीम नगर पालिका की कार्यशैली और विकास योजनाओं में क्या भूमिका निभाएगी, इस पर सभी की निगाहें टिकी हैं.
जिन चेहरों को लेकर सबसे ज्यादा चर्चाएं थीं. उनमें से कई लिस्ट में जगह नहीं बना सके. जबकि कुछ ऐसे नाम सामने आए जिनकी चर्चा अपेक्षाकृत कम थी. यही कारण है कि लिस्ट जारी होने के बाद स्थानीय राजनीति का सबसे चर्चित विषय बन गई.
भानु चंद्राकर की नियुक्ति क्यों बनी चर्चा का केंद्र?
लेकिन असली जिज्ञासा तो विधायक प्रतिनिधि भानु चंद्राकर की एंट्री को लेकर है. भानु चंद्राकर पहले से ही विधायक प्रतिनिधि के रूप में कुरुद की जमीनी समस्याओं को दूर करने में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं. लेकिन अब उन्हें एल्डरमैन की यह दोहरी और नई जिम्मेदारी क्यों सौंपी गई? क्या इसके पीछे कुरुद नगर पालिका को सीधे प्रशासनिक पावरहाउस से जोड़ने की कोई बड़ी और सकारात्मक योजना है? आखिर इस रणनीतिक नियुक्ति के पीछे क्या छुपा है नया एजेंडा? 
अनुभव और नई जिम्मेदारियों का संतुलन
चंद्रकुमार चंद्राकर (नंदू) को लगातार दूसरी बार अवसर देकर संगठन ने यह संदेश दिया है कि स्थानीय निकाय के अनुभव और कार्यशैली को महत्व दिया गया है. नगर पालिका की कार्यप्रणाली की उनकी समझ आने वाले समय में उपयोगी साबित हो सकती है.
एल्डरमैनों की सूची में खिलेश्वर देवांगन, खिलावन यादव और महावीर साहू को भी जिम्मेदारी सौंपी गई है. नई टीम के गठन को संगठनात्मक संतुलन और समन्वय की दृष्टि से भी देखा जा रहा है.
H3: 9 बनाम 6 के समीकरण के बीच नई भूमिका
नगर पालिका में कांग्रेस के 9 पार्षद हैं. जबकि भाजपा के 6 पार्षद होने के बावजूद अध्यक्ष पद भाजपा के पास है. ऐसे में एल्डरमैनों की यह नई टीम सदन में समन्वय, विचार-विमर्श और विकास संबंधी मुद्दों पर क्या भूमिका निभाएगी. इस पर राजनीतिक हलकों और आम जनता की नजरें बनी हुई हैं.
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नगर पंचायत छुरा को मिले तीन नए एल्डरमैन, नगरवासियों में खुशी की लहर
छुरा : राज्य शासन द्वारा नगर पंचायत छुरा में तीन एल्डरमैन की नियुक्ति किए जाने पर नगरवासियों एवं भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं में हर्ष का माहौल है. शासन द्वारा  तुलाराम साहू, धर्मेन्द्र चंद्राकर एवं सफर सचदेव को नगर पंचायत छुरा का एल्डरमैन मनोनीत किया गया है.

फिंगेश्वर में एल्डरमैन नियुक्ति पर घमासान: भाजपा कार्यकर्ताओं में बढ़ा असंतोष, इस्तीफे की चेतावनी से गरमाई सियासत
फिंगेश्वर : नगर पंचायत फिंगेश्वर में एल्डरमैन नियुक्ति को लेकर राजनीतिक विवाद गहराता जा रहा है. सीमा ठाकुर को एल्डरमैन बनाए जाने के बाद भारतीय जनता पार्टी के स्थानीय कार्यकर्ताओं के एक वर्ग में भारी नाराजगी देखने को मिल रही है. कार्यकर्ताओं ने नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए इसे संगठन के समर्पित कार्यकर्ताओं की उपेक्षा बताया है. विरोध कर रहे कार्यकर्ताओं का कहना है कि अगर इस फैसले पर जल्द पुनर्विचार नहीं किया गया तो संगठन के भीतर असंतोष और बढ़ सकता है और कई कार्यकर्ता इस्तीफा देने जैसे कठोर कदम उठाने के लिए भी मजबूर हो सकते हैं.
विरोध कर रहे कार्यकर्ताओं का आरोप है कि सीमा ठाकुर फिंगेश्वर नगर पंचायत की मतदाता नहीं हैं. बल्कि उनका नाम राजिम नगर पंचायत की मतदाता सूची में दर्ज है. उनका कहना है कि अगर यह तथ्य सही है तो फिंगेश्वर नगर पंचायत में एल्डरमैन नियुक्ति की पात्रता को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं. कार्यकर्ताओं ने मांग किया कि संबंधित अभिलेखों की जांच कर पूरे मामले में स्थिति स्पष्ट की जाए. ताकि किसी तरह की भ्रम की स्थिति खत्म हो सके.
भाजपा कार्यकर्ताओं का कहना है कि सीमा ठाकुर को संगठन की तरफ से पहले ही कई महत्वपूर्ण दायित्व दिए जा चुके हैं. इसके बावजूद पार्टी के कार्यक्रमों, जनसंपर्क अभियानों और संगठनात्मक गतिविधियों में उनकी सक्रियता अपेक्षित स्तर पर दिखाई नहीं देती. कार्यकर्ताओं का आरोप है कि सालों से पार्टी की विचारधारा के लिए गांव-गांव और वार्ड-वार्ड में मेहनत करने वाले कई समर्पित और निष्ठावान कार्यकर्ताओं की अनदेखी की गई है. इससे जमीनी स्तर पर कार्य करने वाले कार्यकर्ताओं में निराशा और असंतोष का माहौल बन गया है.
कई कार्यकर्ताओं ने यह भी कहा कि पार्टी संगठन को ऐसे फैसले लेने से पहले स्थानीय कार्यकर्ताओं की राय को महत्व देना चाहिए था. उनका मानना है कि अगर नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता रहती और स्थानीय स्तर पर सक्रिय कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता दी जाती तो इस तरह का विवाद उत्पन्न नहीं होता. कार्यकर्ताओं का कहना है कि संगठन की मजबूती जमीनी कार्यकर्ताओं के परिश्रम से होती है और उनकी उपेक्षा लंबे समय में संगठन के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है.
इस नियुक्ति को लेकर सांसद रूपकुमारी चौधरी, राजिम विधायक रोहित साहू और भाजपा जिला अध्यक्ष अनिल चंद्राकर के प्रति भी नाराजगी व्यक्त की जा रही है. कार्यकर्ताओं का कहना है कि जनप्रतिनिधियों और संगठन के जिम्मेदार पदाधिकारियों को स्थानीय कार्यकर्ताओं की भावनाओं को समझते हुए इस फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए. उनका कहना है कि अगर जल्द समाधान नहीं निकाला गया तो संगठन के भीतर मतभेद और ज्यादा गहरा सकते हैं.
सूत्रों के मुताबिक इस फैसले से कई महिला कार्यकर्ता भी नाराज हैं. उनका कहना है कि पार्टी के लिए लंबे समय से सक्रिय रूप से कार्य करने वाली महिला कार्यकर्ताओं को मौका देने के बजाय ऐसे नामों को प्राथमिकता दी गई है. जिनकी संगठनात्मक सक्रियता पर ही सवाल उठ रहे हैं. कुछ महिला कार्यकर्ताओं ने नाराजगी जताते हुए संगठन से इस्तीफा देने की चेतावनी भी दी है. उनका कहना है कि अगर निष्ठावान कार्यकर्ताओं की लगातार अनदेखी होती रही तो भविष्य में संगठनात्मक गतिविधियों पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है.
नगर में इस नियुक्ति को लेकर लगातार चर्चाओं का दौर जारी है। राजनीतिक गलियारों में भी यह मुद्दा चर्चा का विषय बना हुआ है. स्थानीय लोगों का मानना है कि अगर समय रहते संगठन द्वारा स्थिति स्पष्ट नहीं की गई तो यह विवाद और अधिक तूल पकड़ सकता है. कार्यकर्ता चाहते हैं कि संगठन पूरे मामले की निष्पक्ष समीक्षा कर पात्रता और नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े सभी तथ्यों को सार्वजनिक करे. जिससे कार्यकर्ताओं के बीच व्याप्त असंतोष दूर हो सके.
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