स्वास्थ्य विभाग के दावों की खुली पोल, एक साथ चार इंजेक्शन लगने से दो माह के मासूम की मौत, परिजनों ने किया जमकर हंगामा, कार्यवाही की मांग
Health department's claims exposed, two-month-old child dies after getting four injections at once, family members create ruckus, demand action
बिलासपुर/मंगला : बिलासपुर जिले के मंगला बस्ती स्थित धुरीपारा में स्वास्थ्य विभाग की गंभीर लापरवाही ने एक मासूम दो माह के बच्चे की जान ले ली. यह घटना न सिर्फ प्रशासन की नाकामी को उजागर करती है. बल्कि आदिवासी समाज के साथ हो रहे अन्याय की सबसे शर्मनाक मिसाल बन गई है.
मिली जानकारी के मुताबिक धुरीपारा निवासी पंडा गौड़ के घर मन्नतों के बाद दो महीने पहले स्वस्थ पुत्र का जन्म हुआ. शासन की योजनाओं के तहत मितानिनों के जरिए बच्चे को जरुरी स्वास्थ्य सेवाएँ और टीकाकरण दिया जाना था. लेकिन पिछले कुछ दिनों से स्वास्थ्य मितानिनें छुट्टी पर थीं. इसके बावजूद मंगलवार दोपहर को करीब 1 बजे के आस-पास पंडा गौड अपने मासूम बच्चे को लेकर धुरीपारा स्थित आंगनवाड़ी केंद्र चेकअप करवाने गया. केंद्र में किसी स्वास्थ्यकर्मी ने दो महीने के मासूम को चार इंजेक्शन लगाया.
इंजेक्शन लगने के बाद बच्चे की हालत लगातार बिगड़ती गई और बुधवार दोपहर करीब 2 बजे मासूम की मौत हो गई. परिवार में मातम छा गया. रोते-बिलखते परिजन आंगनबाड़ी केंद्र पहुँचे. लेकिन वहां न तो इंजेक्शन लगाने वाली मितानिन मौजूद थी और न ही कोई जिम्मेदार अधिकारी.
पंडा गौड़ ने बताया कि उन्होंने जिला प्रशासन से इंसाफ की गुहार लगाई और कलेक्टर कार्यालय में लिखित शिकायत देकर अपनी पीड़ा को साझा किया. बावजूद इसके अब तक किसी दोषी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई. परिवार ने मदद के लिए जगह-जगह दुहाई दी. लेकिन कोई मदद नहीं मिली. परिजनों का कहना है कि इस घटना की उच्चस्तरीय जांच हो और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाए.
इस मामले में मिडिया ने घटना की जानकारी को लेकर मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमओ) शुभ्रा ग्रीवाल से संपर्क करने का प्रयास किया. लेकिन शुभ्रा ग्रेवाल ने फोन नहीं उठाया. यह लापरवाही और टालमटोल सवालों के घेरे में है.
सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक जब जिला प्रशासन ने धुरीपारा स्थित आंगनबाड़ी केंद्र में इंजेक्शन लगाने वाली मितानीन या अन्य ज़िम्मेदार को तलब किया कोई नहीं आया. ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब स्वास्थ्य मितानिनें हड़ताल पर थीं तो आंगनवाड़ी केंद्र में इंजेक्शन किसने लगाया?
यह घटना स्वास्थ्य विभाग की घोर लापरवाही और प्रशासन की संवेदनहीनता का क्रूरतम रुप है. वही आदिवासी समाज, जिसे संरक्षण और विकास का भरोसा दिया जाता है. उसकी आंखों के सामने एक मासूम बच्चे की जान चुकी है.
स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले भी इस तरह की घटनाएँ सामने आई हैं. लेकिन प्रशासन ने दोषियों को बचाने का काम किया है. यह शर्मनाक है कि दो महीने के मासूम की जान चली गई. लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई.
प्रशासन से सवाल
आखिर दो महीने के मासूम की मौत के लिए कौन जिम्मेदार है? क्या आदिवासी समाज के जीवन की कोई कीमत नहीं है? क्या योजनाएँ सिर्फ कागजों में हैं और ज़मीनी स्तर पर लापरवाही का बोलबाला है?
यह घटना सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं है. बल्कि पूरी व्यवस्था की विफलता का प्रतीक बन चुकी है. अगर समय रहते दोषियों पर कठोर कार्रवाई नहीं हुई तो यह आदिवासी समाज के साथ हो रहे अन्याय की और बड़ी मिसाल बन जाएगी. प्रशासन को अब जवाब देना ही होगा.
सिविल लाइन सीएसपी निमितेश सिंह ने बताया कि मामला संज्ञान में लिया गया है. बच्ची के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है. रिपोर्ट आने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी.
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