मदरसों में धार्मिक शिक्षा पर आपत्ति तो मठ और पाठशाला पर क्यों नहीं?, CJI चंद्रचूड़ ने भरी अदालत में NCPCR से पूछे सवाल

If there is objection on religious education in Madrasas then why not on Maths and schools CJI Chandrachud asked questions to NCPCR in the court

मदरसों में धार्मिक शिक्षा पर आपत्ति तो मठ और पाठशाला पर क्यों नहीं?, CJI चंद्रचूड़ ने भरी अदालत में NCPCR से पूछे सवाल

एक बार फिर मदरसे चर्चा के केंद्र में हैं. राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने मदरसा शिक्षा प्रणाली के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी, जिसमें उसने मदरसों में पढ़ रहे बच्चों को सरकारी स्कूलों में स्थानांतरित करने की सिफारिश की थी. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस सिफारिश पर रोक लगा दी है और कहा कि मदरसों को बंद नहीं किया जाएगा.
उन मदरसों की मान्यता रद्द नहीं होगी जो शिक्षा के अधिकार अधिनियम (RTE) 2009 का पालन नहीं कर रहे. न ही गैर मान्यता प्राप्त मदरसों से गैर मुस्लिम छात्रों को सरकारी स्कूलों में ट्रांसफर किया जाएगा. इस बारे में राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) के निर्देशों पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है.
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई डी.वाई. चंद्रचूड़, जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने यह अंतरिम आदेश एक रिट याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया. NCPCR के निर्देशों को चुनौती देते हुए जमीयत उलमा-ए-हिंद ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी. जिसमें कहा गया कि यह अल्पसंख्यकों के अनुच्छेद 30 के तहत शिक्षा के अधिकार का उल्लंघन है.
सुप्रीम कोर्ट ने मदरसा शिक्षा प्रणाली पर राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) के रुख पर सवाल उठाते हुए पूछा कि क्या अन्य धर्मों के समकक्ष संस्थानों पर भी इसी तरह के मानक लागू किए गए हैं. भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ के नेतृत्व में न्यायालय ने ऐसे तुलनीय संस्थानों के अस्तित्व पर ध्यान दिया जहां कई धार्मिक पृष्ठभूमि के बच्चे धार्मिक अध्ययन और पुरोहिती का प्रशिक्षण हासिल करते हैं. पीठ ने सवाल किया कि एनसीपीसीआर की आपत्तियां सिर्फ मदरसों पर ही क्यों केंद्रित हैं? और क्या इसने सभी धार्मिक समुदायों के प्रति "समान" दृष्टिकोण बनाए रखा है.
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस फैसले को चुनौती देने वाली अपीलों पर सुनवाई के दौरान ये टिप्पणियां की गई. जिसमें उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा बोर्ड अधिनियम, 2004 को असंवैधानिक घोषित किया गया था. कार्यवाही के बाद पीठ ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया.
एनसीपीसीआर ने मदरसा शिक्षा प्रणाली की आलोचना करते हुए एक रिपोर्ट प्रस्तुत कर मामले में हस्तक्षेप किया. जिसमें कथित तौर पर शिक्षा के अधिकार अधिनियम के मानकों का पालन नहीं किया गया. हालांकि, न्यायमूर्ति पारदीवाला ने सवाल किया कि क्या एनसीपीसीआर ने मदरसा पाठ्यक्रम की गहन समीक्षा की है. उन्होंने टिप्पणी की. "क्या एनसीपीसीआर ने पूरे पाठ्यक्रम का अध्ययन किया है? पाठ्यक्रम धार्मिक शिक्षा के बारे में वास्तव में क्या बताता है? ऐसा प्रतीत होता है कि 'धार्मिक निर्देश' शब्द का इस्तेमाल स्पष्ट समझ के बिना किया जा रहा है. जिससे प्रस्तुत तर्कों का आधार दोषपूर्ण हो जाता है."
न्यायमूर्ति पारदीवाला ने संविधान के अनुच्छेद 28 में उल्लिखित 'धार्मिक निर्देशों' और धार्मिक शिक्षा की सामान्य अवधारणा के बीच अंतर करने में स्पष्टता की जरुरत पर प्रकाश डाला. इस बात पर जोर देते हुए कि जिस जरिए शिक्षा प्रदान की जाती है. वह अहम भूमिका निभाता है. अरुणा रॉय मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि धर्म की शिक्षा संवैधानिक रुप से प्रतिबंधित नहीं है. यह दर्शाता है कि मुद्दा यह है कि धार्मिक सामग्री को शैक्षिक ढांचे में कैसे एकीकृत किया जाता है.
अदालत की टिप्पणी कई आस्था-आधारित संस्थानों में धार्मिक शिक्षा को किस तरह विनियमित किया जाता है. इसका व्यापक मूल्यांकन करने का सुझाव देती है. जिससे एनसीपीसीआर को मदरसों से संबंधित चिंताओं को दूर करने में अपने फोकस और कार्यप्रणाली को उचित ठहराने के लिए प्रेरित किया जाता है.
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अदालत ने मदरसों और वैदिक पाठशालाओं की मिसाल देते हुए यह भी कहा कि भारत में धार्मिक शिक्षा के कई रुप हैं. दुर्भाग्य से कुछ लोग ऐसे हैं. जो अरबी मदारिस को शक की निगाह से देखते हैं. अरबी मदारिस ने देश की आजादी और मुल्क की तरक्की में अहम योगदान दिया है. 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में मदरसों का योगदान महत्वपूर्ण था.
1857 के गदर से लेकर आजादी मिलने तक अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह के दौरान, मदरसों ने न सिर्फ धार्मिक शिक्षा दी, बल्कि राष्ट्रीयता और स्वतंत्रता की भावना को भी बढ़ावा दिया. मौलवी अहमदुल्लाह शाह, मौलाना महमूद हसन, मौलाना हुसैन अहमद मदनी, हाजी इमदादुल्लाह मुहाजिर मक्की, मौलाना कासिम नानौतवी, इमाम बख्श सहबाई, मुफ्ती सदरुद्दीन, मौलाना अबुल कलाम आजाद, मौलाना हसरत मोहानी, जाकिर हुसैन जैसे कई विद्वानों ने विद्रोह में सक्रिय भूमिका निभाई और लोगों को संगठित किया.
मदरसों ने क्रांतिकारी विचारों का प्रसार किया, जिससे कई समुदायों में एकजुटता बढ़ी. इसके अलावा, कई मदरसे स्वतंत्रता संग्राम के नेताओं को तैयार करने में महत्वपूर्ण रहे. जिन्होंने देश की आजादी के लिए बलिदान दिया. प्रसिद्ध ‘रेशमी रुमाल आंदोलन’ भी मदरसों की ही देन था. ‘इंकलाब जिंदाबाद’ का नारा हसरत मोहानी ने ही दिया था. जो क्रांति का प्रतीक बना. हालांकि 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेजों ने मदरसों से राज्य का संरक्षण हटा लिया और उनकी शिक्षा प्रणाली में बदलाव किया. इससे मदरसों का मकसद धार्मिक शिक्षा तक सीमित हो गया. जिससे उनकी सामाजिक भूमिका कमजोर हुई. हालांकि, वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट की सकारात्मक टिप्पणियों के बावजूद मदरसों को आधुनिक बनाने पर जोर दिया जाना चाहिए. ताकि बच्चों को दीनी तालीम के साथ-साथ दुनियावी तालीम भी मिले.
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