रायपुर में नाबालिग से मजदूरी, पाव डोज कैफे संचालक अविनाश गंगवानी के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई, बाल श्रम अधिनियम के तहत दर्ज केस दर्ज
Labor from minor in Raipur police action against Pav Doze Cafe operator Avinash Gangwani case registered under Child Labor Act
रायपुर : पुलिस ने एक कैफे संचालक के खिलाफ बाल श्रम अधिनियम के तहत कार्रवाई की है. तेलीबांधा स्थित में पाव डोज कैफे रेस्टोरेंट के संचालक के खिलाफ बालक श्रम अधिनियम की धारा 79, 3, 14 और बीएनएस 216 का मामला दर्ज किया है.
पुलिस के मुताबिक बचपन बचाओं आंदोलन के राज्य समन्यवयक विपिन सिंह ठाकुर की शिकायत पर कार्रवाई की गई. बताया जा रहा है कि पाव डोज कैफे के संचालक के द्वारा अपने रेस्टोरेंट में चार नाबालिग लड़कों से काम कराया जा रहा था. जिसकी शिकायत पर राज्य बाल संरक्षण के समन्वयक पिपिन ठाकुर ने रेस्टोरेंट में जाकर छानबीन की. जांच में पाया गया कि रेस्टोरेंट के संचालक द्वारा अवैध तरीके से 4 बालकों को काम पर रखा था. इसकी खबर विपिन ठाकुर ने तेलीबांधा पुलिस को दी. शिकायत पर पुलिस ने संचालक अविनाश गंगवानी के खिलाफ बालश्रम अधिनियम की धारा 79, 3, 14 के साथ बीएनएस 216 के तहत जुर्म दर्ज किया गया.
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बाल श्रम क्या है
बाल श्रम का मतलब है किसी बच्चे को भुगतान सहित या बिना भुगतान के किसी ऐसे काम में नियोजित करना जो बच्चे से उसका बचपन और शिक्षा छीन लेता है और शारीरिक, मानसिक, नैतिक और सामाजिक रुप से हानिकारक होता है.
भारत में बाल श्रम एक लंबे समय से आम प्रथा रही है. जहां बच्चे अपने माता-पिता के साथ खेतों में और दुसरे काम में मदद करते हैं.
एक अन्य अवधारणा बंधुआ मजदूरी और शहरी बाल श्रम है.
बंधुआ मजदूरी एक शोषण है जिसमें बच्चे को उसके माता-पिता द्वारा लिए गए कर्ज के भुगतान के लिए काम करने के लिए मजबूर किया जाता है.
शहरी बाल श्रम वह है जहां सड़क पर रहने वाले बच्चे मजदूर के रुप में काम करते हैं. जो अपनी तकरीबन पूरी जिंदगी सड़क पर बिताते हैं.
यूनिसेफ ने बाल श्रम को तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया है:
परिवार के भीतर - बच्चों को बिना वेतन के घरेलू काम में लगाया जाता है.
परिवार के भीतर लेकिन घर के बाहर - उदाहरण- घरेलू नौकरानियां, कृषि मजदूर, प्रवासी मजदूर, आदि.
परिवार के बाहर - उदाहरण- खुदरा दुकानें, रेस्तरां और नौकरियां, वेश्यावृत्ति आदि.
भारत में बाल श्रम के विरुद्ध संवैधानिक प्रावधान क्या हैं?
बाल श्रम को नियंत्रित करने वाला अधिनियम " बाल श्रम (निषेध और विनियमन) अधिनियम, 1986" है जो बालक को ऐसे किसी भी व्यक्ति के रुप में परिभाषित करता है जिसने अपनी आयु चौदह साल पूरी नहीं की है.
अधिनियम बच्चों को किसी भी व्यवसाय में काम करने से रोकता है. जिसमें ढाबा, घरेलू श्रम, होटल, खानपान या रेलवे पर या पटरियों के पास कहीं भी निर्माण कार्य, ऑटोमोबाइल गैरेज और प्लास्टिक कारखाने, साबुन निर्माण, बीड़ी बनाने, ईंट भट्टे, चर्मशोधन और छत टाइल इकाइयां शामिल हैं.
संविधान में कई प्रावधान किये गये हैं:
अनुच्छेद 21(ए) और अनुच्छेद 45 के अनुसार-
बच्चे को शिक्षा का हक्क है यानी राज्य छह से 14 साल की उम्र के बच्चों को अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा प्रदान करेगा.
अनुच्छेद 24 के मुताबिक –
एक प्रावधान है जिसके तहत 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चे को किसी भी खदान, कारखाने या खतरनाक कार्यस्थल पर नियोजित नहीं किया जा सकता.
अनुच्छेद 39(एफ) के मुताबिक –
बच्चे के युवावस्था और बचपन को नैतिक और भौतिक परित्याग और शोषण से बचाया जाना चाहिए.
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन बाल श्रम से संबंधित पांच प्रमुख मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करता है:
बाल श्रम का निषेध
कार्यस्थल पर बच्चों की सुरक्षा
बाल श्रम के मूल कारणों से निपटना
बच्चों को भविष्य के काम के लिए समायोजित करने में मदद करना
कामकाजी माता-पिता के बच्चों की सुरक्षा
बाल श्रम के बच्चे के जीवन पर क्या परिणाम/प्रतिकूल प्रभाव होते हैं?
बाल श्रम:
शिक्षा में बाधा उत्पन्न होती है - जो उनके भविष्य को प्रभावित करती है क्योंकि शिक्षा की कमी से बेरोजगारी होती है, और इस प्रकार परिणाम गरीबी होता है
बच्चे के स्वास्थ्य और विकास प्रक्रिया को प्रभावित करता है
न्यूनतम वेतन, शोषणकारी और खतरनाक है
रोजगार की लागत कम हो जाती है
आईएलओ के मुताबिक:
बच्चों को कार्यस्थल पर दुर्घटनावश तथा अन्य चोटों जैसे जलने, कटने, चक्कर आने, थकान, फ्रैक्चर, घाव, बुरे सपने तथा अकारण भय का खतरा बना रहता है.
उन्हें आर्थिक, शारीरिक और सामाजिक स्तर पर नुकसान पहुंचाया जाता है जिसका असर जीवन भर रहता है.
जैसे: यौन उत्पीड़न, विशेष रूप से वयस्कों द्वारा लड़कियों का यौन शोषण, वेश्यावृत्ति, बलात्कार जिसके परिणामस्वरूप गर्भपात होता है, अवांछित गर्भावस्था, एचआईवी/एड्स, यौन संचारित रोग (एसटीडी), शराब और नशीले पदार्थों का सेवन
शारीरिक दुर्व्यवहार में दंड शामिल होता है. जैसे बेंत से मारना या कोड़े मारना जिसे शारीरिक दंड कहा जाता है. भावनात्मक दुर्व्यवहार जैसे दोष देना, बुरी टिप्पणी करना, अपमानित करना, मौखिक रूप से हमला करना और अस्वीकार करना
भावनात्मक उपेक्षा अर्थात बच्चे को परिवार के प्यार और स्नेह से वंचित करना जिसके परिणामस्वरूप निराशा और अकेलापन होता है.
शारीरिक उपेक्षा जैसे पर्याप्त भोजन, आश्रय, चिकित्सा उपचार और कपड़े न देना
बाल श्रम उन्मूलन के लिए उठाए गए कदम:
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के तहत एक कार्यक्रम शुरू किया गया - अंतर्राष्ट्रीय बाल श्रम उन्मूलन कार्यक्रम (आईपीईसीएल)। यह लोगों में जागरूकता पैदा करके बाल श्रम को खत्म करने का काम करता है.
बाल श्रम की समस्या से निपटने में मदद के लिए भारत IPECL का एक हिस्सा है.
भारत में क्रियान्वित प्रमुख कार्यक्रमों में से एक राष्ट्रीय श्रम परियोजना (एनसीएलपी) है जिसके अंतर्गत सात बाल श्रम परियोजनाएं स्थापित की गई हैं.
बाल श्रम को कम करने के लिए भारत सरकार ने पुनर्वास नामक नीति अपनाई है।
क्राई (चाइल्ड राइट्स एंड यू), केयर इंडिया, चाइल्ड फंड आदि जैसे गैर सरकारी संगठन भी देश में बाल श्रम से निपटने के लिए सरकार के प्रयास में योगदान दे रहे हैं.
बाल श्रम एक दीमक की तरह है जो एक व्यक्ति और एक नागरिक के रुप में बच्चों की ताकत और विकास तथा देश के भविष्य को प्रभावित कर रहा है. इसे जड़ से खत्म करना होगा. ताकि देश के बच्चों का भविष्य बेहतर हो सके और वे देश के विकास में मदद कर सकें.
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