महिला की मौत, बिना पोस्टमार्टम अंतिम संस्कार पर सवाल पर उठे सवाल, पिता को पहले ही खो चुके दो मासूम बच्चों पर जिदंगी का संकट, प्रशासन से मदद की अपील
A woman has died, and questions have been raised about the funeral without a postmortem. Two innocent children, who have already lost their father, are facing a life-threatening situation. They appeal for help from the administration.
बिलासपुर/कोटा : बिलासपुर जिले के आदिवासी बहुल कोटा क्षेत्र में के खोंगसरा गांव में उल्टी-दस्त (डायरिया) से पीड़ित एक बैगा महिला की समय पर इलाज न मिलने से मौत हो गई. घटना के बाद स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए. इस घटना के बाद उनके दो छोटे बच्चे कनिका उम्र 1 साल और रामप्रसाद उम्र 8 साल अब माता-पिता के साये से वंचित होकर जीवन के कठिन दौर में खड़े हैं.
मिली जानकारी के मुताबिक खोंगसरा के तुमा डबरा वार्ड-10 निवासी धनमती बैगा पत्नी सुखसिंह बैगा उम्र 35 साल पेट दर्द, उल्टी और दस्त से पीड़ित थी. उनका घर सरगोड़ नदी के दूसरे छोर पर स्थित है. सोमवार रात उनकी हालत नाजुक हो गई. मंगलवार सुबह करीब 5 बजे उन्होंने दम तोड़ दिया.
ग्रामीणों के मुताबिक बच्चों के पिता की मौत कुछ साल पहले झी हो चुकी थी. अब मां की मौत के बाद दोनों बच्चों के सामने पालन-पोषण, सुरक्षा और शिक्षा की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है. मौत के बाद प्रशासनिक अमला गांव पहुंचा और औपचारिकताएं पूरी की गईं. घटना का पंचनामा, स्टाफ के साथ कार्यवाही की सेल्फी फ़ोटो और कार्यवाही की गई.
सबसे गंभीर सवाल यह है कि महिला का अंतिम संस्कार बिना पोस्टमार्टम के कर दिया गया. इससे मौत के वास्तविक कारणों की पुष्टि नहीं हो सकी. जिससे जांच की पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं. इससे ग्रामीणों में आक्रोश और निराशा का माहौल है.
स्थानीय लोगों का कहना है कि: क्षेत्र में डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ की भारी कमी है.जो लोग पदस्थ है वह भी नियमित सेवाएं नही देते हैं. स्वास्थ्य केंद्रों में पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं हैं. समय पर इलाज नहीं मिलने से ऐसी घटनाएं हो रही हैं.
ग्रामीणों ने मांग की है कि दोनों बच्चों के पालन-पोषण और शिक्षा की जिम्मेदारी सुनिश्चित की जाए. परिवार को आर्थिक सहायता दी जाए. क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाओं को तत्काल मजबूत किया जाए.
खबर के बावजूद नहीं पहुंची स्वास्थ्य टीम
ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि घटना की जानकारी आमागोहन प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र को दी गई थी. इसके बावजूद कोई स्वास्थ्यकर्मी गांव नहीं पहुंचा. सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र कोटा को भी खबर दी गई. लेकिन वहां से भी कोई राहत टीम नहीं पहुंची.
इलाके में डॉक्टरों की कमी, झाड़फूंक पर निर्भरता
जनपद सदस्य कांति बलराम सिंह मरावी के मुताबिक क्षेत्र में डॉक्टरों की भारी कमी है और ग्रामीण अब भी झाड़फूंक पर भरोसा करते हैं. जिससे ऐसी घटनाएं बढ़ रही हैं. उन्होंने बताया कि गर्मी के मौसम में पीने के स्वच्छ पानी की कमी की वजह से लोग नदी और झिरिया का पानी पीने को मजबूर हैं. जिससे डायरिया फैल रहा है.
जनप्रतिनिधियों ने उठाए सवाल
स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने स्वास्थ्य विभाग पर लापरवाही का आरोप लगाया है. भाजपा मंडल अध्यक्ष राजू सिंह राजपूत ने कहा कि डॉक्टर और स्वास्थ्य कर्मचारी फील्ड में नहीं जाते. जिससे हालात बिगड़ते जा रहे हैं.
बीएमओ से संपर्क नहीं हो सका
नर्स और कंपाउंडर के भरोसे चल रहा पीएचसी
स्थानीय निवासी प्रदीप शर्मा के मुताबिक आमागोहन प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में एक भी एमबीबीएस डॉक्टर पदस्थ नहीं है. आसपास के गांवों के लोग नर्स और कंपाउंडर के भरोसे इलाज कराने को मजबूर हैं.
यह घटना न सिर्फ स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाल स्थिति को उजागर करती है. बल्कि दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों में जागरूकता और बुनियादी सुविधाओं के अभाव की गंभीर समस्या को भी सामने लाती है. साथ ही यह घटना सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की परीक्षा है जो जरूरत के समय कमजोर पड़ जाती है. अब देखना होगा कि प्रशासन इन बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए क्या ठोस कदम उठाता है.
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