सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला रद्द दिया फैसला, क्रिमिनल केस के पेंडिंग होने का हवाला देकर पासपोर्ट रिन्यूअल से इंकार नहीं किया जा सकता

The Supreme Court overturned the High Court's decision, ruling that a passport renewal cannot be denied simply because a criminal case is pending.

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला रद्द दिया फैसला, क्रिमिनल केस के पेंडिंग होने का हवाला देकर पासपोर्ट रिन्यूअल से इंकार नहीं किया जा सकता

दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आपराधिक कार्यवाही के पेंडिंग होने का इस्तेमाल पासपोर्ट के रिन्यूअल पर अनिश्चितकालीन रोक लगाने के लिए नहीं किया जा सकता. खासकर जब सक्षम आपराधिक अदालतों ने विदेश यात्रा पर नियंत्रण रखते हुए ऐसे रिन्यूअल की इजाज़त दी हो.
सुप्रीम कोर्ट ने महेश कुमार अग्रवाल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य के मामले में अहम फैसला देते हुए कहा कि आपराधिक कार्यवाही के पेंडिंग होने का इस्तेमाल पासपोर्ट के रिन्यूअल पर अनिश्चितकालीन रोक लगाने के लिए नहीं किया जा सकता. खासकर जब सक्षम आपराधिक अदालतों ने विदेश यात्रा पर नियंत्रण रखते हुए ऐसे रिन्यूअल की इजाज़त दी हो. जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने बिजनेसमैन महेश कुमार अग्रवाल द्वारा दायर अपील मंज़ूर करते हुए विदेश मंत्रालय और क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय, कोलकाता को उनका सामान्य पासपोर्ट दस साल की सामान्य अवधि के लिए फिर से जारी करने का निर्देश दिया.
सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाईकोर्ट का फैसला रद्द करते हुए कहा कि इस कोर्ट ने कई फैसलों में बार-बार कहा है कि विदेश यात्रा का अधिकार और पासपोर्ट रखने का अधिकार भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के पहलू हैं. उस अधिकार पर कोई भी प्रतिबंध निष्पक्ष, न्यायसंगत और उचित होना चाहिए. इसका एक वैध मकसद के साथ एक तर्कसंगत संबंध होना चाहिए. हाईकोर्ट ने सिर्फ़ NIA एक्ट और UAPA के तहत उनके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही पेंडिंग होने के कारण अपीलकर्ता के पासपोर्ट के रिन्यूअल से इंकार कर दिया था.
स्वतंत्रता नियम है. प्रतिबंध अपवाद बेंच के लिए लिखते हुए जस्टिस विक्रम नाथ ने इस बात पर जोर दिया कि अनुच्छेद 21 के तहत स्वतंत्रता राज्य का कोई उपहार नहीं है. बल्कि यह उसका पहला दायित्व है. कोर्ट ने कहा किसी नागरिक की घूमने, यात्रा करने, आजीविका और अवसर पाने की स्वतंत्रता अनुच्छेद 21 का एक जरुरी हिस्सा है. कोई भी प्रतिबंध सीमित, आनुपातिक और स्पष्ट रुप से कानून में निहित होना चाहिए. कोर्ट ने चेतावनी दी कि प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों को कठोर बाधाओं में नहीं बदला जाना चाहिए. या अस्थायी अक्षमताओं को अनिश्चितकालीन बहिष्कार में बदलने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए.
हमारे संवैधानिक ढांचे में स्वतंत्रता राज्य का कोई उपहार नहीं है. बल्कि यह उसका पहला दायित्व है. कानून के अधीन, किसी नागरिक की घूमने, यात्रा करने, आजीविका और अवसर पाने की स्वतंत्रता भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटी का एक जरुरी हिस्सा है. राज्य, जहां कानून ऐसा प्रावधान करता है, न्याय, सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था के हित में उस स्वतंत्रता को विनियमित या प्रतिबंधित कर सकता है. हालांकि ऐसा प्रतिबंध सीमित होना चाहिए. जो जरुरी हो. प्राप्त किए जाने वाले मकसद के आनुपातिक हो और स्पष्ट रुप से कानून में निहित हो. जब प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों को कठोर बाधाओं में बदल दिया जाता है. या अस्थायी अक्षमताओं को अनिश्चितकालीन बहिष्कार में बदलने दिया जाता है तो राज्य की शक्ति और व्यक्ति की गरिमा के बीच संतुलन बिगड़ जाता है और संविधान का वादा खतरे में पड़ जाता है.
असंगत और अनुचित पाबंदी होगी. कोर्ट ने आगे कहा कि इस अंदाज़े के डर से रिन्यूअल से मना करना कि अपीलकर्ता पासपोर्ट का गलत इस्तेमाल कर सकता है. असल में क्रिमिनल कोर्ट के जोखिम के आकलन पर सवाल उठाना है और पासपोर्ट अथॉरिटी के लिए एक सुपरवाइज़री भूमिका मान लेना है जो कानून में नहीं है.
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