पूर्व सीएम शिबू सोरेन का 81 साल की उम्र में निधन, तीन दिन का राजकीय शोक, कल दी जाएगी मुखाग्नि, राजनीतिक गलियारों में शोक की लहर
Former CM Shibu Soren dies at the age of 81, three days of state mourning, funeral will be held tomorrow, wave of mourning in political corridors
झारखंड के पूर्व सीएम शिबू सोरेन का 81 साल की उम्र में निधन हो गया है. वे लंबे समय से बीमार चल रहे थे. दिल्ली के गंगाराम अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था. डॉक्टरों की एक पूरी टीम उनको मॉनिटर कर रही थी. लेकिन सोमवार सुबह उन्होंने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया. पिछड़ों के इतने बड़े नेता के निधन से राजनीतिक गलियारों में शोक की लहर है. झारखंड के लिए भी इसे एक बड़ी क्षति माना जा रहा है.
शिबू सोरेन का पार्थिव शरीर आज शाम छह बजे रांची के मोरहाबादी स्थित आवास पर लाया गया.मंगलवार सुबह झामुमो के पार्टी कार्यालय में अंतिम दर्शन के लिए रखा जाएगा. इसके बाद पार्थिव शरीर को झारखंड विधानसभा ले जाया जाएगा, जहां जनप्रतिनिधि और अधिकारी उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे. उनका अंतिम संस्कार मंगलवार झारखंड के पैतृक गांव रामगढ़ जिले के नेमरा में कल दोपहर किया जाएगा. दोपहर करीब तीन बजे उन्हें मुखाग्नि दी जाएगी.
झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन को लंबी बीमारी के बाद सुबह 8:56 बजे मृत घोषित कर दिया गया. वे किडनी की बीमारी से पीड़ित थे और डेढ़ महीने पहले उन्हें स्ट्रोक भी हुआ था. पिछले एक महीने से वे लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर थे. झारखंड सरकार ने झामुमो के संस्थापक संरक्षक और पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन के निधन पर तीन दिन के राजकीय शोक की घोषणा की है.
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने गहरा शोक व्यक्त किया है. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एक्स पर शिबू सोरेन ने लिखा कि आदरणीय दिशोम गुरुजी हम सभी को छोड़कर चले गए हैं. आज मैं शून्य हो गया हूं. उनके अलावा कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी ने झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन के निधन पर कहा कि “शिबू सोरेन जी केवल झारखंड ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर आदिवासियों की सबसे बड़ी आवाज, पहचान और सम्मान के प्रतीक थे… मैं उन्हें अपनी विनम्र श्रद्धांजलि देता हूं.
बता दें, शिबू सोरेन ने 38 साल तक झारखंड मुक्ति मोर्चा का नेतृत्व किया और उन्हें पार्टी के संस्थापक संरक्षक के रुप में जाना जाता है. इस बीच पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार, झारखंड के शिक्षा मंत्री रामदास सोरेन को ब्रेन स्ट्रोक के बाद दिल्ली के अपोलो अस्पताल ले जाया गया.
शिबू सोरेन ने 18 साल की उम्र में संथाल नवयुवक संघ का गठन किया था. 1972 में, सोरेन ने बंगाली मार्क्सवादी ट्रेड यूनियन नेता एके रॉय और कुर्मी-महतो नेता बिनोद बिहारी महतो के साथ मिलकर झामुमो का गठन किया और इसके महासचिव बने.
सोरेन 1977 में अपना पहला लोकसभा चुनाव हार गये थे. लेकिन बाद में 1980 में दुमका से पहली बार लोकसभा के लिए चुने गये. इसके बाद वे 1989, 1991 और 1996 में भी लोकसभा के लिए चुने गए. वह 2002 में राज्यसभा के लिए चुने गए. लेकिन उसी साल लोकसभा उपचुनाव में ड्यूमा सीट जीतने के बाद उन्होंने अपनी सीट से इस्तीफा दे दिया. 2004 में फिर निर्वाचित होने के बाद सोरेन मनमोहन सिंह सरकार में केंद्रीय कोयला मंत्री थे. लेकिन 30 साल पुराने चिरुडीह मामले में उनके नाम गिरफ्तारी वारंट जारी होने के बाद उन्हें इस्तीफा देने का निर्देश दिया गया.
गिरफ्तारी वारंट के बाद वह भूमिगत हो गए. क्योंकि 23 जनवरी 1975 को 10 लोगों की हत्या के आरोप में 69 अन्य लोगों के साथ उन्हें भी मुख्य आरोपी पाया गया. सोरेन ने जुलाई 2004 में इस्तीफा दे दिया था और न्यायिक हिरासत के दौरान जेल में रहने के बाद उन्हें जमानत मिल गई थी.
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बता दें कि 11 जनवरी 1944 को जन्में शिबू सोरेन की लड़ाई तब शुरु हुई जब अविभाजित बिहार यानी आज के झारखंड में महाजनी प्रथा अपने चरम पर थी और साल 1957 में उनके पिता की हत्या कर दी गई थी. इसके बाद उन्होंने महजनों और सूदखोरों के खिलाफ आंदोलन शुरु कर दिया. वह नेमरा गांव के रहने वाले थे. लेकिन उनकी मुहिम की गूंज ओडिशा, पश्चिम बंगाल और बिहार तक पहुंचने लगी. इस आंदोलन के शिबू सोरेन ने आदिवासी समाज की मुख्य परेशानी को समझा और उनका हल निकालने में जुट गए. इसी दौरान झारखंड मुक्ति मोर्चा का गठन हुआ.
इसी दौरान शिबू सोरेन ने अपने साथियों के साथ टुंडी, पलमा, तोपचांची, डुमरी, बेरमो, पीरांड में आंदोलन चलाया. इस दौरान महिलाएं हसिया लेकर आती और जमींदारों के खेतों से फसल काटकर ले जाती और खेतों से दूर आदिवासी पुरुष तीर कमान लेकर आते और रखवाली करते. इसके चलते इलाके में कानून व्यवस्था की स्थिति पैदा हो जाने के बाद शिबू सोरेन पारसनाथ के घने जंगल चले गए. यहीं से उन्होंने आंदोलन भी चलाया. उनके आंदोलन का मकसद यही था कि किसी भी तरह आदिवासियों के शोषण को रोका जा सके. वह पढ़ें लिखें और इतने काबिल बने कि खुद अपने हक की आवाज उठा सकें. इसके लिए उन्होंने रात में शिक्षा की व्यवस्था की। उन्होंने गांव पर आधारित अर्थव्यवस्था का मॉडल समझाया. इसी दौरान शिभू सोरेन को दिशोम गुरु की उपाधि से संबोधित किया जाने लगा.
शिबू सोरेन ने झारखंड, आदिवासियों के लिए हक और उनके पिछ़ड़ेपन को दूर करने के लिए जो आवाज उठाई. उससे उनका कद इतना बड़ा हो गया कि हर घर में उन्हें गुरु जी कहने लगे. इसके लिए उन्होंने तीन मुख्यबातों पर ध्यान दिया. पहला आदिवासियों की शिक्षा, शराब से दूरी और किसी भी सूदखोर के चक्कर में ना फंसना. उन्होंने इन तीनों बिंदुओं पर आदिवासियों को जागरुक करना शुरु किया. उन्होंने लोगों में ये डर भी बढ़ा दिया कि अगर किसी ने भी शराब पी तो उसे सजा दी जाएगी।.ऐसा ही कुछ डर सूदखोरों से बचने के लिए भी दिखाया जाता था. हालांकि इसका मकसद आदिवासियों का विकास था.
राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद ने सामाजिक न्याय और वंचित वर्गों के सशक्तिकरण के लिए हमारे संयुक्त संघर्षों की स्मृतियों का जिक्र किया। लालू ने 'X' पर एक पोस्ट में कहा, 'हमारे संघर्षों के साथी झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री दिशोम गुरु शिबू सोरेन के निधन से मुझे गहरा दुख हुआ है. उनके साथ किए गए संघर्षों से मेरी कई यादें जुड़ी हैं। उन्होंने सामाजिक न्याय और हाशिए पर पड़े समुदायों के उत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस दुख की घड़ी में पूरा राष्ट्रीय जनता दल परिवार गुरु जी के परिवार और समर्थकों के प्रति अपनी हार्दिक संवेदना व्यक्त करता है. मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें और परिवार एवं शुभचिंतकों को यह दुःख सहन करने की शक्ति प्रदान करें.'
बिहार विधानसभा में वर्तमान में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने सोरेन को अभिभावक कहा. उन्होंने कहा, 'झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री, एक प्रखर नेता, गरीब, वंचित, उपेक्षित और मेहनतकश वर्ग की आवाज व आदिवासी अधिकारों के प्रबल समर्थक, अभिभावक दिशोम गुरु शिबू सोरेन के निधन पर मैं गहरी संवेदना व्यक्त करता हूं. ईश्वर से प्रार्थना है कि उनकी आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान प्रदान करें। सामाजिक न्याय और आदिवासी कल्याण के लिए उनके ऐतिहासिक योगदान को सदैव याद रखा जाएगा.
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